अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय सामान के लिए रेसिप्रोकल टैरिफ की दर 26 से रिवाइज करके 25 प्रतिशत कर दी है। लेकिन साथ ही रूस से हथियार और कच्चा तेल खरीदने के लिए पेनल्टी भी लगा दी है। एनालिस्ट्स का कहना है कि अगर भारत एडिशनल टैरिफ और पेनल्टी की अमेरिकी धमकियों से बचने के लिए रूस से कच्चे तेल का इंपोर्ट बंद करता है, तो देश के ऑयल इंपोर्ट का सालाना बिल 9-11 अरब अमेरिकी डॉलर तक बढ़ सकता है।
ट्रंप ने इस साल दूसरी बार अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद से यूक्रेन में रूस के युद्ध को खत्म करना अपने प्रशासन की प्राथमिकता बना लिया है। उन्होंने धमकी दी है कि अगर रूस, यूक्रेन के साथ कोई बड़ा शांति समझौता नहीं करता, तो वे रूसी तेल खरीदने वाले देशों से अमेरिका में आने वाले सामान पर 100% टैरिफ लगा देंगे। अमेरिका ने भारत के लिए 25 प्रतिशत टैरिफ को तो नोटिफाई कर दिया है लेकिन पेनल्टी की राशि अभी तक घोषित नहीं की गई है।
भारत में रूसी क्रूड का कितना ट्रेड
रूस कच्चे तेल के मामले में भारत का प्रमुख सप्लायर है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऑयल इंपोर्टर और कंज्यूमर है। भारत को कच्चे तेल की कुल सप्लाई में लगभग 35-40% हिस्सेदारी रूस की है। यूक्रेन के साथ जंग से पहले यह हिस्सेदारी 0.2 प्रतिशत से भी कम थी। रॉयटर्स को मिले आंकड़ों के अनुसार, भारत ने इस साल जनवरी से जून तक हर रोज लगभग 1.75 मिलियन बैरल रूसी तेल का आयात किया। यह एक साल पहले की तुलना में 1% अधिक है।
रूस से सस्ते तेल से मुनाफा कमा रहा है भारत
फरवरी 2022 में रूस के यूक्रेन पर हमला करने के बाद पश्चिमी देशों ने उस पर प्रतिबंध लगाए थे। इसके बाद भारत ने रूस से सस्ता तेल खरीदकर बड़ा मुनाफा कमाया। ईरानी और वेनेज़ुएला के तेल के उलट, रूस के कच्चे तेल पर कोई डायरेक्ट प्रतिबंध नहीं हैं और भारत इसे यूरोपीय संघ की ओर से तय वर्तमान प्राइस लिमिट से कम पर खरीद रहा है। इसके चलते एनर्जी इंपोर्ट की ओवरऑल कॉस्ट को कम करने, रिटेल फ्यूल प्राइस को कंट्रोल में रखने और महंगाई को नियंत्रित करने में मदद मिली।
इतना ही नहीं रियायत पर रूसी कच्चे तेल की खरीद ने भारत को तेल को रिफाइन करने और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का निर्यात करने में भी सक्षम बनाया। निर्यात वाले देशेां में वे देश भी शामिल हैं, जिन्होंने रूस से सीधे आयात पर प्रतिबंध लगा रखे हैं। भारतीय तेल कंपनियों की दोहरी रणनीति रिकॉर्ड मुनाफा कमाकर दे रही है।
हाल ही में यूरोपीय संघ ने रूस में ओरिजिन वाले कच्चे तेल से बने रिफाइंड प्रोडक्ट्स के इंपोर्ट को बैन कर दिया है। यह बैन जनवरी 2026 से लागू होगा। पीटीआई के मुताबिक, रियल टाइम डेटा और एनालिस्टिक्स उपलब्ध कराने वाली केप्लर में लीड रिसर्च एनालिस्ट सुमित रितोलिया ने इसे दोतरफा दबाव करार दिया है। वह ऐसे कि एक ओर यूरोपीय संघ के प्रतिबंध भारतीय रिफाइनरियों को प्रभावित करेंगे, वहीं दूसरी ओर अमेरिकी टैरिफ का खतरा भारत और रूस के बीच क्रूड के ट्रेड के स्ट्रक्चर को प्रभावित करेगा। उन्होंने कहा, ''ये सभी चीजें मिलकर भारत के कच्चे तेल की खरीद की फ्लेक्सिबिलिटी को कम करती हैं, अनुपालन जोखिम बढ़ाती हैं और लागत में भारी अनिश्चितता पैदा करती हैं।''
रितोलिया ने आगे कहा कि रूसी कच्चे तेल को रिप्लेस करना आसान नहीं है। मिडिल ईस्ट एक तार्किक विकल्प है, लेकिन इसमें कुछ सीमाएं हैं जैसे कि कॉन्ट्रैक्ट संबंधी लॉक-इन, प्राइसिंग पर कड़ा रुख, और कच्चे तेल की क्वालिटी में मिसमैच। अगर रूस से तेल का इंपोर्ट रोका जाता है तो रिफाइनर्स को हाई फीडस्टॉक कॉस्ट का सामना करना पड़ेगा। रूसी तेल को रिप्लेस करना चुनौतीपूर्ण, आर्थिक रूप से भारी पड़ने वाला और भू-राजनीतिक रूप से कठिन कदम है।
रूसी तेल का रिप्लेसमेंट मतलब सरकारी खजाने पर दबाव और महंगाई बढ़ना
केप्लर की रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर रूसी तेल को रिप्लेस करते हैं और यह मानें कि 18 लाख बैरल प्रतिदिन पर 5 डॉलर प्रति बैरल की छूट का नुकसान होता है, तो भारत का क्रूड इंपोर्ट बिल सालाना 9-11 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है। अगर रूस से तेल की उपलब्धता कम हुई और तेल की वैश्विक कीमतें बढ़ीं, तो लागत और भी बढ़ सकती है। इससे राजकोषीय दबाव बढ़ेगा, खासकर अगर सरकार रिटेल फ्यूल की कीमतों को स्थिर करने के लिए कदम उठाती है। महंगाई, करेंसी और मौद्रिक नीति पर इसके व्यापक प्रभाव को नजरअंदाज करना मुश्किल होगा।