लोकसभा के बजट सत्र के दौरान सदन का तापमान अपने चरम पर है। विपक्ष के नेता राहुल गांधी को सदन में बोलने का मौका न मिलने और पक्षपात के आरोपों के बीच कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव (No-Confidence Motion) का नोटिस दिया है। इस प्रस्ताव पर विपक्ष के 120 सांसदों के हस्ताक्षर हैं। हालांकि, ममता बनर्जी की पार्टी TMC के सांसदों ने इस पर साइन नहीं किए हैं।
लोकसभा में कांग्रेस के उपनेता गौरव गोगोई ने कहा कि अध्यक्ष को हटाने के प्रस्ताव के लिए नोटिस संविधान के अनुच्छेद 94C के तहत लोकसभा महासचिव को दिया गया है। बड़ी बात ये है कि नोटिस में वर्ष 2026 के बजाय 2025 लिखा गया है, जो तफैक्चुअल एरर के कारण इसे अस्वीकार करने का पर्याप्त आधार है।
सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस, DMK और समाजवादी पार्टी जैसी पार्टियों के लगभग 120 सांसदों ने बिरला को पद से हटाने के लिए प्रस्ताव लाने के नोटिस पर हस्ताक्षर किए हैं, जबकि तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने इसमें भाग नहीं लिया।
लेकिन क्या विपक्ष वाकई उन्हें पद से हटा पाएगा? आइए सदन के संख्या बल और संवैधानिक नियमों के आधार पर इसका पूरा विश्लेषण करते हैं।
क्या है अविश्वास प्रस्ताव की प्रक्रिया?
संसद में लोकसभा अध्यक्ष को हटाना कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं है। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 94(c) और लोकसभा की नियमावली का पालन करना होता है:
सदन का वर्तमान संख्या बल कितना है?
लोकसभा स्पीकर को हटाने या बनाए रखने का पूरा खेल 'नंबर गेम' पर टिका है। वर्तमान लोकसभा की तस्वीर कुछ इस प्रकार है:
सत्ता पक्ष NDA के लोकसभा में 293 सांसद है, जिसमें TDP के 16, JDU के 12 और आदि। विपक्ष INDIA गठबंधन के कुल 234 सांसद हैं, जिसमें कांग्रेस के 99, SP के 37, TMC के 28, DMK के 22 और आदि। वहीं अन्य और निर्दलीय 15 सांसद हैं, जिसमें YSRCP, SAD, AIMIM और बाकी दल शामिल हैं।
लोकसभा की कुल सीटें- 543, जीत के लिए जरूरी जादुई आंकड़ा: 543 सीटों वाले सदन में बहुमत के लिए 272 वोटों की जरूरत है।
क्या विपक्ष के पास पर्याप्त नंबर हैं?
अगर हम वर्तमान आंकड़ों को देखें, तो विपक्ष (234 सीटें) बहुमत के आंकड़े (272) से काफी दूर है।
भारत के संसदीय इतिहास में आज तक किसी भी लोकसभा अध्यक्ष को अविश्वास प्रस्ताव के जरिए पद से नहीं हटाया जा सका है।
1954 में पहले अध्यक्ष जी.वी. मावलंकर के खिलाफ नोटिस दिया गया था, लेकिन वह गिर गया।
इसके बाद 1967 में हुकम सिंह और 1987 में बलराम जाखड़ के खिलाफ भी ऐसी कोशिशें हुईं, लेकिन संख्या बल की कमी के कारण वे भी विफल रहीं।
नियमों और नंबरों के गणित को देखें, तो ओम बिरला को हटाना विपक्ष के लिए वर्तमान में नामुमकिन सा लगता है। विपक्ष के पास न तो जरूरी 272 वोट हैं और न ही NDA के भीतर कोई बड़ी दरार दिख रही है। हालांकि, यह कदम सदन के भीतर विपक्ष के आक्रामक रुख को जरूर दिखाता है, जिससे आने वाले दिनों में संसद में और ज्यादा हंगामा देखने को मिल सकता है।