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पश्चिम बंगाल: बीजेपी की जीत राजनीतिक परिवर्तन नहीं, सभ्यतागत पुनर्जागरण

मेरे दिवंगत पिताजी, श्री बलबीर पुंज ने 18 अप्रैल को अपने निधन से लगभग दस दिन पहले यह आकलन किया था कि पश्चिम बंगाल इस बार भारी बहुमत से भाजपा जीतेगी। एक पत्रकार होने के नाते और स्वभाव से तर्क करने वाली बेटी होने के कारण मैंने उनकी बात को सहजता से स्वीकार नहीं किया। तब मेरी जानकारी उन पत्रकारों के ‘जमीनी’ मीडिया रिपोर्टों पर आधारित थी, जो तब पश्चिम बंगाल में थे

Shweta Punjअपडेटेड May 12, 2026 पर 5:44 PM
पश्चिम बंगाल: बीजेपी की जीत राजनीतिक परिवर्तन नहीं, सभ्यतागत पुनर्जागरण
पश्चिम बंगाल: राजनीतिक परिवर्तन नहीं, सभ्यतागत पुनर्जागरण

पश्चिम बंगाल में भाजपा की ऐतिहासिक विजय का निहितार्थ क्या है? वास्तव में, यह कोई मात्र राजनीतिक घटना या सत्ता-विरोधी लहर से जनित परिणाम नहीं है। यह उस भूभाग में मूल राष्ट्रीय चेतना की पुनर्वापसी है, जिसने कभी भारत के सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी पुनर्जागरण को दिशा दी थी। स्वामी विवेकानंद, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, श्री अरबिंदो और रबींद्रनाथ टैगोर की भूमि ने अंततः अपनी मूल आत्मा की ओर लौटने का संकेत दिया है। यह वही पश्चिम बंगाल है, जिसने ‘वंदे मातरम्’ को जन्म दिया, जिसने राष्ट्रीय चेतना को शब्द, स्वर और विचार दिए। इसलिए इस नतीजे को केवल राजनीतिक चश्मे से देखना ठीक नहीं होगा।

मेरे दिवंगत पिताजी, श्री बलबीर पुंज ने 18 अप्रैल को अपने निधन से लगभग दस दिन पहले यह आकलन किया था कि पश्चिम बंगाल इस बार भारी बहुमत से भाजपा जीतेगी। एक पत्रकार होने के नाते और स्वभाव से तर्क करने वाली बेटी होने के कारण मैंने उनकी बात को सहजता से स्वीकार नहीं किया। तब मेरी जानकारी उन पत्रकारों के ‘जमीनी’ मीडिया रिपोर्टों पर आधारित थी, जो तब पश्चिम बंगाल में थे। किंतु मेरे पिताजी का मूल्यांकन पांच दशकों से अधिक के वैचारिक अध्ययन, हिंदुत्व पर गहन कार्य, भारतीय मतदाता के दृष्टिकोण और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पर उनकी गहरी समझ पर आधारित था। वे अक्सर कहा करते थे कि देश की मीडिया, विशेषकर उसका वामपंथी प्रभाव वाला वर्ग- मई 2014 के बाद से भारतीय मतदाताओं के मन को समझने में लगातार असफल हो रहा है।

यदि वे आज जीवित होते, तो निश्चय ही शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में बंगाल की धरती पर पहली भाजपा सरकार को शपथ लेते देखकर अत्यंत प्रसन्न होते। हरियाणा में भाजपा की विजय पर उन्होंने जलेबी खाकर जिस आत्मीय उत्साह से प्रसन्नता व्यक्त की थी, उसी तरह बंगाल की इस ऐतिहासिक जीत पर शायद वे मुस्कुराते हुए झालमुड़ी का स्वाद लेते। उनका मानना था कि 34 वर्षों के प्रत्यक्ष वामपंथी शासन और उसके बाद 15 वर्षों तक चली तुष्टीकरण आधारित तृणमूल कांग्रेस की राजनीति ने पश्चिम बंगाल में सभ्यतागत चेतना को दबा दिया था। वे कहते थे कि स्वतंत्रता के बाद, विशेषकर 1970 के दशक से बंगाल पर “मार्क्सवादी-मैकालेवादी-अल्पसंख्यक तुष्टीकरण” का ऐसा आयातित ढांचा थोप दिया गया, जिसने उस भूमि की मूल सांस्कृतिक आत्मा को ही क्षीण कर दिया।

मेरे पिताजी बार-बार लिखते थे कि विभाजन के बाद पश्चिम बंगाल स्वतंत्र भारत के हिंदू सभ्यता के एक वैचारिक केंद्र के रूप में विकसित होना चाहिए था, किंतु वह कालांतर में मार्क्सवादी चिंतन की सबसे बड़ा प्रयोगशाला बनता गया। उन्होंने मुझे “मार्क्स-ममता-मैकाले गठजोड़” शब्द का प्रयोग करते हुए बताया था कि कैसे बौद्धिक औपनिवेशवाद और मुस्लिम वोटबैंक की राजनीति ने बंगाल की सूरत को बदल दिया। पश्चिम बंगाल के मतदाताओं का हालिया निर्णय तुष्टीकरण की उसी राजनीति के विरुद्ध भी एक स्पष्ट जनादेश है। मेरे पिताजी ने अपने लेखों में पश्चिम बंगाल के जनसांख्यिकीय परिवर्तन को बार-बार गंभीर चेतावनी के रूप में उठाया था। उनका कहना था कि सीमावर्ती जिलों का क्रमशः मुस्लिम बहुल बन जाना केवल प्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि का परिणाम नहीं हो सकता। वे बांग्लादेशी घुसपैठ को इस परिवर्तन का प्रमुख संरचनात्मक कारण मानते थे।

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