'ममता दीदी से बैर नहीं, अभिषेक बनर्जी की खैर नहीं', TMC में बगावत का यही है सीधा सा मतलब!
TMC vs TMC बागी विधायकों ने पार्टी नेतृत्व के फैसलों पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि विपक्ष के नेता की नियुक्ति को लेकर जो प्रस्ताव भेजा गया, वह सही तरीके से पारित नहीं हुआ था और कुछ हस्ताक्षर भी कथित तौर पर फर्जी थे।
हालांकि हैरानी की बात यह है कि बागी नेताओं में से किसी ने भी अब तक ममता बनर्जी पर सीधा हमला नहीं बोला है।
TMC vs TMC: 'ममता दीदी से बैर नहीं, अभिषेक बनर्जी की खैर नहीं', TMC में बगावत का यही है सीधा सा मतलब!
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर चल रही बगावत अब और गहरी होती दिख रही है। पार्टी से निकाले गए विधायक रितब्रत बनर्जी को कई बागी विधायक विपक्ष का नेता (LoP) बनाने के समर्थन में आ गए हैं। इस पूरे घटनाक्रम की तुलना महाराष्ट्र में शिवसेना की टूट से भी की जा रही है। लेकिन अगर पूरे मामले को ध्यान से देखें तो यह लड़ाई ममता बनर्जी के खिलाफ नहीं, बल्कि उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव और अधिकार को लेकर ज्यादा नजर आती है।
बागी विधायकों ने पार्टी नेतृत्व के फैसलों पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि विपक्ष के नेता की नियुक्ति को लेकर जो प्रस्ताव भेजा गया, वह सही तरीके से पारित नहीं हुआ था और कुछ हस्ताक्षर भी कथित तौर पर फर्जी थे।
हालांकि हैरानी की बात यह है कि बागी नेताओं में से किसी ने भी अब तक ममता बनर्जी पर सीधा हमला नहीं बोला है।
रितब्रत बनर्जी ने पार्टी से निकाले जाने के बाद भी कहा कि वह अब भी ममता बनर्जी का सम्मान करते हैं और उन्हें अपना नेता मानते हैं। उन्होंने साफ कहा कि उनकी लड़ाई ममता से नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर फैसले लेने के तरीके से है।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब विपक्ष के नेता के नाम को लेकर TMC का फैसला विधानसभा अध्यक्ष को भेजा गया। यह जानकारी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने दी थी।
रितब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने दावा किया कि विधायक दल की बैठक में ऐसा कोई प्रस्ताव पास नहीं हुआ था और कई विधायकों के हस्ताक्षर गलत तरीके से इस्तेमाल किए गए। उन्होंने आरोप लगाया कि इस प्रस्ताव पर उनके फर्जी साइन किए गए हैं। इसके बाद पार्टी ने दोनों नेताओं को निष्कासित कर दिया।
यही वजह है कि विवाद सीधे-सीधे अभिषेक बनर्जी की भूमिका पर केंद्रित हो गया।
क्या यह उत्तराधिकारी की लड़ाई है?
राजनीतिक गलियारों में लंबे समय से अभिषेक बनर्जी को ममता बनर्जी का राजनीतिक उत्तराधिकारी माना जाता रहा है। पिछले कुछ सालों में पार्टी के भीतर उनकी ताकत काफी बढ़ी है। चुनावी रणनीति से लेकर संगठन तक, कई बड़े फैसलों में उनकी अहम भूमिका रही है।
लेकिन पार्टी के पुराने नेताओं का एक वर्ग मानता है कि अभिषेक के बढ़ते प्रभाव के कारण उनकी अहमियत कम हो गई है। अब चुनावी हार के बाद यही नाराजगी खुलकर सामने आती दिख रही है।
रितब्रत बोले- अभिषेक बनर्जी कोई नहीं
रितब्रत बनर्जी ने कहा, "पार्टी ने मुझे निकाला है, लेकिन मैं अब भी खुद को TMC का हिस्सा मानता हूं।"
अभिषेक बनर्जी पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा, "18वीं विधानसभा में अभिषेक बनर्जी कोई नहीं हैं।" लेकिन ममता बनर्जी के बारे में उनका रुख बिल्कुल अलग रहा।
उन्होंने कहा, "ममता बनर्जी बड़ी नेता हैं। पार्टी से निकाले जाने के बावजूद उनके प्रति मेरा सम्मान कम नहीं हुआ है। वह आज भी मेरी नेता हैं।"
पहले से चल रही थी नाराजगी
रितब्रत बनर्जी पिछले कुछ महीनों से अभिषेक बनर्जी के कामकाज की आलोचना कर रहे थे। उनका आरोप था कि पार्टी में कुछ सलाहकारों और रणनीतिकारों का प्रभाव बहुत ज्यादा बढ़ गया है और फैसले कुछ लोगों तक सीमित हो गए हैं।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया था कि क्या जमीनी कार्यकर्ताओं और पुराने नेताओं से ज्यादा ताकत अब सलाहकारों के पास पहुंच गई है।
ममता को चुनौती देना आसान नहीं
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ममता बनर्जी अभी भी TMC की सबसे बड़ी और लोकप्रिय नेता हैं। सीधे उनके खिलाफ जाना किसी भी नेता के लिए बड़ा जोखिम हो सकता है, क्योंकि इससे पार्टी कार्यकर्ता और समर्थक नाराज हो सकते हैं।
इसलिए असंतुष्ट नेता अपनी लड़ाई को ममता के खिलाफ विद्रोह की बजाय अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली और नेतृत्व मॉडल के खिलाफ लड़ाई के रूप में पेश कर रहे हैं।
TMC के सामने सबसे बड़ा सवाल
आज TMC में कोई भी ममता बनर्जी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल नहीं उठा रहा है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या अभिषेक बनर्जी को भी पार्टी के सभी नेता और विधायक उसी तरह स्वीकार करते हैं?
अगर इस सवाल का जवाब "नहीं" है, तो मौजूदा बगावत सिर्फ कुछ विधायकों तक सीमित नहीं रहेगी और भविष्य में पार्टी के भीतर और बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।
यानी फिलहाल TMC की असली लड़ाई ममता बनर्जी बनाम बागी विधायक नहीं, बल्कि अभिषेक बनर्जी की बढ़ती ताकत और उनके नेतृत्व को लेकर उठ रहे सवालों की लड़ाई बनती जा रही है।