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Yashwant Varma Cash Case: कैश कांड में जस्टिस यशवंत वर्मा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका, संसदीय पैनल की जांच के खिलाफ याचिका खारिज

Yashwant Varma Cash Case: जस्टिस यशवंत वर्मा को बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने कैश कांड मे संसदीय पैनल की जांच के खिलाफ उनकी याचिका खारिज कर दी है। इस याचिका में उन्होंने लोकसभा स्पीकर के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें एक जांच समिति बनाने का फैसला किया गया था

Akhilesh Nath Tripathiअपडेटेड Jan 16, 2026 पर 2:08 PM
Yashwant Varma Cash Case: कैश कांड में जस्टिस यशवंत वर्मा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका, संसदीय पैनल की जांच के खिलाफ याचिका खारिज
Yashwant Varma Case: पिछले साल मार्च में नई दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास पर जले हुए नोट मिलने के बाद से ही वे विवादों के केंद्र में हैं

Yashwant Varma Cash Case: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (16 जनवरी) को इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा की संसदीय पैनल की जांच के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया। याचिका में उन्होंने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के उन्हें पद से हटाने की मांग वाले प्रस्ताव को स्वीकार करने के फैसले और उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कर रहे संसदीय पैनल की वैधता को चुनौती दी थी। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एससी शर्मा की पीठ ने वर्मा की याचिका पर आठ जनवरी को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। पीठ ने आज फैसला सुनाया।

इससे पहले आठ जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में राष्ट्रपति के कार्यों का निर्वहन कर सकते हैं, तो राज्यसभा के उपसभापति, सभापति की अनुपस्थिति में उनके कार्यों का निर्वहन क्यों नहीं कर सकते? नई दिल्ली स्थित जस्टिस वर्मा के आधिकारिक आवास पर 14 मार्च को जले हुए नोटों के बंडल मिलने के बाद उन्हें दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया था।

पीठ ने जस्टिस वर्मा के इस तर्क से असहमत होने से इनकार कर दिया कि राज्यसभा के उपसभापति के पास किसी प्रस्ताव को अस्वीकार करने का अधिकार नहीं है। वर्मा ने दावा किया था कि जज (जांच) अधिनियम 1968 के तहत केवल स्पीकर और सभापति के पास ही किसी जज के खिलाफ प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार है।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने जस्टिस वर्मा की इस दलील को खारिज कर दिया कि जजेस (इन्क्वायरी) एक्ट, 1968 के तहत एक जॉइंट कमेटी जरूरी थी। बेंच ने पिछले हफ्ते इस बात पर विस्तार से दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था कि क्या 1968 के कानून के तहत अपनाई गई प्रक्रिया कानूनी रूप से वैध थी। खासकर ऐसी स्थिति में जब संसद के दोनों सदनों में एक ही दिन हटाने के प्रस्ताव पेश किए गए थे।

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