कांग्रेस-उद्धव से भी ज्यादा शरद के लिए अहम है महाराष्ट्र चुनाव! इसमें फेल मतलब 'पवार युग' का अंत?

यह चुनाव सबके लिए अहम है। उद्धव ठाकरे, एकनाथ शिंदे, अजित पवार, बीजेपी कांग्रेस सबके लिए। लेकिन अगर सबसे ज्यादा अहम है तो वह शरद पवार के लिए। 1978 में महज 38 वर्ष की उम्र में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनने वाले शरद पवार अब 84 वर्ष के हो चुके हैं। उनकी रैली में अब उनकी उम्र को लेकर पोस्टर भी लहराए जा रहे हैं

अपडेटेड Oct 18, 2024 पर 9:11 PM
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Maharashtra Chunav: कांग्रेस-उद्धव से भी ज्यादा शरद पवार के लिए अहम है महाराष्ट्र चुनाव!

महाराष्ट्र में इस बार का विधानसभा चुनाव बेहद रोचक है। पक्ष और विपक्ष दोनों तरफ से तीन प्रमुख धड़े हैं, जो गठबंधन के रूप में एक-दूसरे के आमने-सामने हैं। सत्ताधारी गठबंधन में शामिल तीन पार्टियों में से दो ऐसी हैं, जो विपक्ष खेमे से टूटकर निकली हैं। यानी शरद पवार की एनसीपी से अजित पवार निकले, तो उद्धव ठाकरे की शिवसेना से एकनाथ शिंदे। 2019 के विधानसभा चुनाव से लेकर अगर अब तक के वक्त को देखें तो महाराष्ट्र की राजनीति में सबसे बड़ा राजनीतिक झटका खाने वाले दो नेता शरद पवार और उद्धव ठाकरे हैं।

यह चुनाव सबके लिए अहम है। उद्धव ठाकरे, एकनाथ शिंदे, अजित पवार, बीजेपी कांग्रेस सबके लिए। लेकिन अगर सबसे ज्यादा अहम है तो वह शरद पवार के लिए। 1978 में महज 38 वर्ष की उम्र में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनने वाले शरद पवार अब 84 वर्ष के हो चुके हैं। उनकी रैली में अब उनकी उम्र को लेकर पोस्टर भी लहराए जा रहे हैं। इसका जवाब भी शरद पवार ने दिया है- उन्होंने अपने विरोधियों को संदेश देते हुए कहा है कि 84 हो या 90, ये बूढ़ा आदमी रुकेगा नहीं। तब तक नहीं रुकेगा जब तक महाराष्ट्र को 'सही रास्ते' पर नहीं लाते। शरद पवार का इशारा राज्य में सत्ता परिवर्तन की तरफ था।

अजित पवार भी कर चुके हैं तंज


शरद की उम्र को लेकर इससे पहले भतीजे अजित पवार भी तंज कस चुके हैं। 2024 लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान बारामती में अजित पवार ने कहा था-'पता नहीं कुछ लोग कब रुकेंगे। हो सकता है कोई भावुक अपील करें कि ये उनका आखिरी चुनाव है। पता नहीं कौन सा चुनाव आखिरी चुनाव होगा?' बारामती लोकसभा सीट पर शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले और अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार के बीच मुकाबला हुआ था। इस सीट को देश की सबसे हाईप्रोफाइल सीटों में माना जा रहा था।

बारामती में शरद पवार ने दिखाई ताकत

चुनाव से ठीक पहले शरद पवार ने अपनी पार्टी लॉन्च की थी। एनसीपी का नाम और चुनाव चिन्ह अजित पवार खेमे के पास था। नए पार्टी सिंबल और नेम के साथ चुनाव प्रचार कर रहे शरद पवार ने बारामती को अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया था। इस चुनावी लड़ाई में जीत भी सुप्रिया सुले की हुई। यहां तक कि अगर सीटों के हिसाब से प्रदर्शन को देखें तो शरद पवार की अगुवाई वाली एनसीपी ने राज्य में सबसे बेहतर प्रदर्शन किया था। उत्तर प्रदेश के बाद महाराष्ट्र भी उन प्रमुख राज्यों में था जहां बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए को जबरदस्त झटका लगा।

लोकसभा चुनाव के बाद विपक्ष के लिए बने माहौल को झटका

अपनी उम्र को लेकर मिल रहे तानों के बीच शरद पवार ने साबित कर दिया था कि महाराष्ट्र की राजनीति की अब भी उनसे बेहतर समझ शायद ही किसी को हो। लेकिन लोकसभा चुनाव की सफलता के बाद जो माहौल इंडिया गठबंधन के पक्ष में बना था, उसे हरियाणा में हुई अप्रत्याशित कांग्रेसी हार के बाद बड़ा झटका लगा है। अब इसी माहौल में महाराष्ट्र का चुनाव होने जा रहा है। एक तरफ भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाला एनडीए जोश में आ गया है तो वहीं दूसरी तरफ विपक्षी इंडिया गठबंधन को ये साबित करना पड़ेगा कि लोकसभा चुनाव में उसे मिली सफलता कोई तुक्का नहीं थी।

विपक्ष के असली रणनीतिकार शरद पवार

महाराष्ट्र में इंडिया गठबंधन यानी महाविकास अघाड़ी के शरद पवार एक रूप से संरक्षक हैं। 2019 के विधानसभा चुनाव के बाद भी शरद पवार ही कांग्रेस और उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली शिवसेना को साथ लाने के असली मास्टरमाइंड थे। अजित पवार उस वक्त भी बीजेपी के साथ चले गए थे और शरद पवार उन्हें वापस लेकर आ गए थे। इसके बाद से ही महाविकास अघाड़ी को साथ रखने में शरद पवार का बेहद अहम योगदान रहा है।

एक चुनाव, कई चुनौतियां

शरद पवार की आत्मकथा का नाम 'ऑन माई टर्म्स है' लेकिन इस बार का विधानसभा चुनाव उन्हें सिर्फ अपनी टर्म्स पर नहीं लड़ना है। इसमें कई पेंच है। एक तरफ हरियाणा चुनाव की हार से पैदा हुई नकारात्मकता से लड़ना है। महाविकास अघाड़ी के भीतर मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर चल रही रस्साकशी से पार पाना है। दूसरी तरफ महायुति यानी सत्ताधारी गठबंधन की तरफ से बनाई जा रही रणनीतियों का भी जवाब देना होगा।

लोकसभा चुनाव से बने माहौल पर पानी फिरा

लोकसभा चुनाव अभी हाल में बीता है जिसमें बेहतर प्रदर्शन के बावजूद शरद पवार के हिस्से कुछ खास नहीं आया और अब महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव में 'करो या मरो' की स्थिति बन चुकी है। अगर इस चुनाव में शरद पवार यह नहीं साबित कर पाते हैं कि महाराष्ट्र के लोगों की नब्ज अब भी उनके हाथ में है तो अगला मौका पांच साल बाद आएगा। तब तक शरद पवार 89 वर्ष के हो चुके होंगे।

ऐसे में अगर महाराष्ट्र चुनाव की बात करें तो जीत सभी पार्टियों के लिए अहम है लेकिन शरद पवार के लिए सबसे ज्यादा अहम है। इस चुनाव में मिली हार महाराष्ट्र की राजनीति में 'पावर यानी पवार' के राजनीतिक मुहावरे को भी खत्म कर देगी। क्या यह विधानसभा चुनाव 'पवार युग' का अंत करेगा या फिर एक नए 'पवार युग' की शुरुआत होगी। 23 नवंबर को चुनावी नतीजों के दिन इसका जवाब मिल जाएगा।

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