राजन महान

राजन महान
अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) का पांच साल का यह कार्यकाल खत्म होने जा रहा है। यह बहुत उतार-चढ़ाव वाला रहा। इस दौरान उनका दूसरा ही रूप देखने को मिला। आम तौर पर विनम्र और शांत माने जाने वाले गहलोत का उग्र रूप इस बार कई बार देखने को मिला। इस कार्यकाल के ज्यादातर हिस्से में उन्हें कांग्रेस के अंदर और कांग्रेस के बाहर अपने विरोधियों से निपटना पड़ा। चौथी बार मुख्यमंत्री की कुर्सी तक रास्ता बनाने के लिए गहलोत हर मुमकिन कोशिश करते नजर आ रहे हैं। हालांकि, इस बार सीएम की कुर्सी का रास्ता गहलोत के लिए मुश्किल हो सकता है। इस रास्ते में खुद कांग्रेस नेतृत्व बाधक बन सकती है। दशकों तक गहलोत की छवि ऐसे नेता की रही है, जो गांधी परिवार के बताए रास्ते पर चलता है। गहलोत भी खुद को गांधी परिवार का सबसे बड़ा वफादार मानते रहे हैं। लेकिन, पिछले पांच साल के कार्यकाल ने गहलोत में बड़ा बदलाव ला दिया है। अब वे आक्रामक हो गए हैं। विरोधियों के लिए चुभने वाली भाषा और शब्द इस्तेमाल करते हैं। आखिर में वह अपनी राजनीतिक जमीन को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार दिखते हैं।
गहलोत का मिशन-156
इस बार के विधानसभा चुनावों के लिए गहलोत ने खुद के लिए एक मिशन तय किया है, जिसका नाम है-Mission-156। इसके तहत वह कांग्रेस के लिए इस बार सबसे ज्यादा सीटे जीतना चाहते हैं। उनकी उम्मीदें समाज के कई वर्गों के लिए शुरू की गई स्कीमों पर कायम हैं। वह इसे 'गुड गवर्नेंस का राजस्थान मॉडल' बताते हैं। उन्होंने चिरंजीवी हेल्थ इंश्योरेंस स्कीम की सौगात लोगों को दी है। महिलाओं को फ्री स्मार्टफोन से लेकर ओल्ड पेंशन स्कीम को फिर से लागू करने का वादा किया है। आबादी के एक बड़े हिस्से के लिए मिनिमम गारंटीज स्कीम ऐसी स्कीमों की बदौलत उन्हें चुनावी नैया पार कर लेने की उम्मीद है।
पांच साल तक सरकार गिरने नहीं दी
गहलोत के समर्थकों और कांग्रेस को लगता है कि ये स्कीमें चुनाव जीतने में मददगार साबित हो सकती हैं। उनके समर्थकों का यह भी मानना है कि 2020 में गहलोत ने जिस तरह से सचिन पायलट की बगावत का सामना किया, उससे यह साबित हो गया कि भारतीय राजनीति का आज का चाणक्य गहलोत के सिवाय कोई दूसरा नहीं है। गहलोत का आरोप है कि भाजपा नेता अमित शाह ने कई बार उनकी सरकार गिराने की कोशिशें की हैं। अगर ऐसा है तो हर बार गहलोत ने ऐसी कोशिश को नाकाम किया है।
पायलट की बगावत नाकाम की
यह जग जाहिर है कि बगावत से निपटने के लिए कैसे गहलोत नेवफादार विधायकों को अपने साथ बनाए रखा, भाजपा नेताओं और कांग्रेस के विद्रोहियों के खिलाफ एफआईआर किया और पायलट और केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत के बीच के संबंधों को उजागर किया। गहलोत ने राज्य के गवर्नर को नियंत्रण में रखने के लिए अपने नेताओं को गांधीगिरी तक का इस्तेमाल करने को प्रेरित किया। उन्होंने ऐसे समय में अपनी सरकार बचाई रखी, जब भाजपा मध्य प्रदेश और कर्नाटक की कांग्रेस सरकार को गिराने में सफल साबित हुई।
गांधी परिवार का प्रस्ताव ठुकराया
गहलोत के बढ़ते असर को देखते हुए गांधी परिवार ने उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभालने का न्योता दिया। इससे गहलोत को दिल्ली में रहना पड़ता, जिससे जयपुर की कुर्सी सचिन पायलट के लिए खाली हो जाती। गहलोत ने यह प्रस्ताव दिया कि वे दोनों जिम्मेदारियां संभाल सकते हैं, जिसका पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पुरजोर विरोध किया। उसके बाद पिछले साल 25 सितंबर को गहलोत के उत्तराधिकारी की नियुक्ति का अधिकार सोनिया गांधी को देने के लिए प्रस्ताव पारित कराने के वास्ते आयोजित बैठक में कांग्रेस के 80 से ज्यादा विधायकों ने हिस्सा नहीं लिया। इसकी जगह गहलोत के वफादार विधायकों ने उनके करीब शांति धारीवाल के जयपुर स्थित आवास पर एक समानांतर बैठक की।
कांग्रेस नेतृत्व पर भारी पड़े
पायलट को मुख्यमंत्री बनाने के कांग्रेस नेतृत्व के इरादों पर पानी फेरकर गहलोत ने एक तरह से कांग्रेस नेतृत्व की लाचारी सबसे सामने ला दी है। हालांकि, उन्होंने सार्वजनिक रूप से सोनिया गांधी से माफी मांग ली। अब कांग्रेस में अंदर की जानकारी रखने वालों का कहना है कि आने वाले दिनों में गहलोत एक बार फिर कांग्रेस नेतृत्व की मुसीबत बढ़ा सकते हैं। अब तक कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित नहीं किया है। लेकिन, गहलोत ने यह संकेत देना शुरू कर दिया है कि अगर कांग्रेस राज्य में चुनाव जीतती है तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर वही बैठेंगे। कई लोगों का कहना है कि इसका मकसद उनकी जगह किसी और को मुख्यमंत्री बनाने की कांग्रेस की कोशिश को नाकाम करना है।
(राजन महान एक सीनियर जर्नलिस्ट हैं, जो राजस्थान में NDTV और स्टार न्यूज के प्रमुख रह चुके हैं। वह जयपुर स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ राजस्थान में जर्नलिज्म के प्रोफेसर भी हैं। यहां व्यक्त विचार उनके निजी विचार हैं। इनका इस पब्लिकेशन से किसी तरह का संबंध नहीं है।)
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