वेस्ट एशिया में फार्मा शिपमेंट पूरी तरह बंद होने से सिर्फ इस महीने में ही एक्सपोर्ट वैल्यू में 2,500-5,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि US-इजराइल और ईरान के बीच तेज होते युद्ध के बीच फ्रेट रेट दोगुना हो गया है। ऐसी चेतावनी फार्मास्यूटिकल्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया (फार्मेक्सिल) ने दी है। एक्सपोर्टर्स को हर शिपमेंट पर 4,000-8,000 डॉलर का भारी सरचार्ज देना पड़ रहा है। इससे खाड़ी देशों और वेस्ट एशिया मार्केट पर बहुत ज्यादा निर्भर दवा बनाने वालों के लिए लॉजिस्टिक्स कॉस्ट बढ़ गई है। ज्यादा इंश्योरेंस प्रीमियम, फ्यूल की कीमतें बढ़ना और लंबे रूट से ऑपरेशनल देरी इस बढ़ोतरी के मुख्य कारण हैं।
फार्मेक्सिल के चेयरमैन नमित जोशी का कहना है, कच्चे तेल की ज्यादा कीमतें और अनप्रेडिक्टेबल (अंदाजा न लगाए जा सकने वाले) ट्रांजिट टाइम भी एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रेडिएंट (API) खरीदने की कॉस्ट और इन्वेंट्री की दिक्कतों को बढ़ा रहे हैं। इससे बड़े और मीडियम साइज के फार्मा एक्सपोर्टर्स के वर्किंग कैपिटल साइकिल पर दबाव पड़ रहा है। जोशी ने कहा कि लॉजिस्टिक्स का दबाव बेहद तेजी से बढ़ रहा है।
28 फरवरी 2026 को इजराइल और अमेरिका ने ईरान के खिलाफ खुली जंग का ऐलान करते हुए एयर स्ट्राइक की। इसके बाद से बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड लगभग 16 प्रतिशत उछला है। 6 मार्च की सुबह ब्रेंट 84 डॉलर प्रति बैरल के करीब ट्रेड कर रहा था। ईरान ने भी इजराइल और अमेरिका के हमलों का बराबर जवाब दिया है। उसने इजराइल के अलावा मध्यपूर्व के कई देशों पर भी हमले किए हैं।
महत्वपूर्ण जलमार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बाधित
इस युद्ध ने शिपमेंट के लिए एक महत्वपूर्ण जलमार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बाधित कर दिया है। यहां से भारत का 50 प्रतिशत तेल और लगभग 80 प्रतिशत नेचुरल गैस गुजरती है। दवाओं, एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (APIs) और टेंपरेचर-सेंसिटिव फॉर्मूलेशन की समय पर डिलीवरी के लिए जरूरी रेड सी और खाड़ी के बड़े चैनल भी प्रभावित हुए हैं। जोशी ने कहा कि इन रूट्स पर देरी या रूट बदलने से डिलीवरी शेड्यूल पर बुरा असर पड़ सकता है। कोल्ड-चेन की इंटीग्रिटी से समझौता हो सकता है, खासकर महंगी और ऐसी दवाओं के कार्गो के मामले में, जिन्हें तय समय के अंदर पहुंचाना बेहद जरूरी हो।
भारत की दवा इंडस्ट्री के लिए एक अहम डेस्टिनेशन है मिडिल ईस्ट
फार्मेक्सिल के डेटा से पता चलता है कि मिडिल ईस्ट- खासकर गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) और बड़ा वेस्ट एशिया और नॉर्थ अफ्रीका रीजन, भारत की दवा इंडस्ट्री के लिए एक अहम डेस्टिनेशन बनकर उभरा है। इस इलाके के लिए भारत का फार्मा एक्सपोर्ट वित्त वर्ष 2021 में 1.32 अरब डॉलर था। वित्त वर्ष 2025 में यह बढ़कर 1.75 अरब डॉलर हो गया। UAE, सऊदी अरब, ओमान और कुवैत जैसे बड़े मार्केट भारत की जेनेरिक और सस्ती दवाओं पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं, जिससे भारत इस पूरे रीजन में एक लाइफलाइन सप्लायर बन गया है।