भारतीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों (Micro, Small and Medium Enterprises) के लिए पिछले 5 साल में आसान नहीं रहे है। इस दौरान नोटबंदी, जीएसटी की व्यवस्था लागू होने से आए व्यवधान, बैंकरप्सी कोड के बाद MSME बकाये के भुगतान का प्राथमिकता सूची से हटना और फिर कोरोना महामारी और कमोडिटी की कीमतें बढ़ने जैसी कई चुनौतियां आईं। ऐसे में MSME इंडस्ट्री ने इस बार अपने मांगों की एक पूरी सूची तैयार की है, जिसे वह केंद्रीय बजट 2022 से पूरा होने की उम्मीद कर रहा है।
इस लिस्ट में सबसे पहली मांग इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी कोड (IBC) में संशोधन की है। इंडस्ट्री के लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था फेडरेशन ऑफ इंडियन माइक्रो एंड स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज (FISME) ने MSMEs कॉरपोरेट इन्सॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस (CIRP) के बकाए को सुरक्षित करने के लिए इसकी मांग की है।
FISME ने कहा कि, बड़ी कंपनियों/क्लाइंट के रिजॉल्यूशन या नीलामी के समय MSME सप्लायर्स को "ऑपरेशनल क्रेडिटर्स" के रूप में माना जाता है, और ऑपरेशनल क्रेडिटर्स की बकाया राशि की अधिकतर समय बहुत कम या कोई वसूली नहीं होती है।
FISME ने कहा, "एक बड़ी कॉरपोरेट यूनिट के पास कई MSME सप्लायर्स होते हैं। इनके दिवालिया होने से सभी MSME सप्लायर्स पर असर पड़ता है। यह सब MSME एक्ट के बावजूद है जो MSME के बकाया का समय पर भुगतान की बात करता है, लेकिन IBC के जरिे इस नियम को खारिज कर दिया जाता है।"
फेडरेशन चाहता है कि MSME को मौजूदा ऑपरेशनल क्रेडिटर्स की कैटेगरी में एक अलग उप-श्रेणी बनाकर उसेवर्गीकृत किया जाए और दूसरे ऑपरेशन क्रेडिटर्स के मुकाबले उसके बकाये को भुगतान को पहले प्राथमिकता दी जाए।
FISME ने पुरानी तारीख से ब्याज-सबवेंशन योजना को बहाल करने की भी मांग की है। इस योजना के तहत, बड़े मैन्युफैक्चरिंग और मर्चेंट एक्सपोर्टर्स को 416 तरह के उत्पादों के शिपमेंट के लिए प्री-शिपमेंट और पोस्ट-शिपमेंट रुपी क्रेडिट पर 3 प्रतिशत की ब्याज सब्सिडी मिलती थी। वहीं मैन्युफैक्चरिंग MSME को इस तरह के क्रेडिट पर 5 प्रतिशत की सब्सिडी मिलती थी। इस योजना को 21 सितंबर, 2021 को वापस ले लिया गया था।
कमोडिटी की बढ़ती कीमतों को देखते हुए, FISME चाहती है कि स्टील, कॉपर, एल्युमीनियम और पॉलिमर पर इंपोर्ट ड्यूटी को खत्म कर दिया जाए। इसके अलावा FISME जीएसटी रजिस्ट्रेश की प्रक्रिया में भी कुछ बदलाव चाहती है।