Budget 2022: जॉब्स पर होना चाहिए निर्मला सीतारमण का सबसे ज्यादा फोकस, जानिए क्यों

कोरोना की वजह से टोटल लॉकडाउन ने अपैल और मई में बेरोजगारी दर को आसमान पर पहुंचा दिया। हालांकि, पाबंदियां हटने के बाद इनमें से कई लोगों को फिर से काम मिल गया। लेकिन, अब भी बड़ी संख्या में लोग नौकरी की तलाश कर रहे हैं

अपडेटेड Jan 29, 2022 पर 2:48 PM
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निर्मला सीतामरण शहरी इलाकों में भी मनरेगा जैसी स्कीम शुरू करने का ऐलान कर सकती हैं। कंस्ट्रक्शन और इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च बढ़ाने से भी शहरी इलाकों में रोजगार के मौके पैदा करने में मदद मिलेगी। रोजगार के छोटे-बड़े मौके पैदा करने में रियल एस्टेट सेक्टर का बड़ा हाथ रहा है। इसलिए इस सेक्टर को बढ़ावा देने से कई तरह के फायदें हो सकते हैं।

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) को बजट (Union Budget 2022) में सबसे ज्यादा फोकस जॉब्स पर करना चाहिए। वह 1 फरवरी को अपना चौथा बजट पेश करने जा रही हैं। यह जॉब्स के प्रॉब्लम को एड्रेस करने का सही मौका है। हाल में बिहार और उत्तर प्रदेश में आरआरबी के नतीजों को लेकर विरोध से पता चलता है कि शिक्षित युवा रोजगार के मौकों के अभाव में किस तरह की लाचारी झेल रहे हैं। एक सरकारी नौकरी के लिए हजारों लोगों अप्लाई करते हैं। पिछले कई सालों से इंडियन इकोनॉमी रोजगार के पर्याप्त मौके पैदा करने में नाकाम रही है।

कोरोना की महामारी शुरू होने से पहले भी देश में बेरोजगारी (Unemployment) की दर बढ़ रही थी। वित्त वर्ष 2016-17 में यह करीब 5 फीसदी थी। वित्त वर्ष 2019-20 में यह बढ़़कर करीब 8 फीसदी पर पहुंच गई। इकोनॉमिक ग्रोथ (Economic Growth) की सुस्त रफ्तार के चलते युवाओं के लिए रोजगार के ज्यादा मौके पैदा करना मुश्किल हो गया है। इधर, कोरोना की महामारी ने लाखों लोगों को बेरोजगार कर दिया है। इससे यह प्रॉब्लम और बढ़ गई है।

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कोरोना की वजह से टोटल लॉकडाउन ने अपैल और मई में बेरोजगारी दर को आसमान पर पहुंचा दिया। हालांकि, पाबंदियां हटने के बाद इनमें से कई लोगों को फिर से काम मिल गया। लेकिन, अब भी बड़ी संख्या में लोग नौकरी की तलाश कर रहे हैं। कोरोना की तीसरी लहर के चलते भी कई राज्यों ने अलग-अलग तरीके से पाबंदियां लगाई हैं, जिससे हालात मुश्किल हो गए हैं। जिम, सिनेमा हॉल, मॉल, स्कूल और कॉलेज से जुड़ी गतिविधियां सामान्य नहीं हो पाई हैं।

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इंडिया में जॉब्स के मौकों के लिहाज से इनफॉर्मल सेक्टर की हिस्सेदारी बहुत ज्यादा रही है। इकोनॉमी में रिकवरी शुरू होने के बाद से बड़ी कंपनियों के लिए तो हालात सुधर रहे हैं, लेकिन छोटी कंपनियां अब भी मुश्किल में हैं। फॉर्मल सेक्टर की नौकरियों में पैसा ज्यादा मिलता है और सुरक्षा भी अधिक है। बीते दिसंबर में 95 लाख सैलरीड जॉब्स के मौके खत्म हो गए। फॉर्मल सेक्टर में नौकरियां खत्म होने का असर इनफॉर्मल सेक्टर पर भी पड़ता है। उदाहरण के लिए नौकरी खत्म होने पर लोग अपने घरों में काम वाली को हटा देते हैं।

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शहरी इलाकों में जॉब्स के मौके ज्यादा होते हैं। इसलिए कोरोना की ज्यादा मार भी शहरों में मौजूद नौकरियों पर पड़ी है। कोरोना की दूसरी और तीसरी लहर ने गांवों से ज्यादा शहरों में नौकरियों के मौकों को खत्म किया है। गांवों में महात्मा गांधी नेशनल रूरल इंप्लॉयमेंट गांरटी स्कीम (MGNREGA) काफी मददगार रही है। मुश्किल वक्त में इसने लोगों को आय कमाने का एक मौका दिया है। यही वजह है कि कोरोना की महामारी शुरू होने के बाद से ही मनरेगा के तहत रोजगार की मांग लगातार बढ़ी है।

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निर्मला सीतामरण शहरी इलाकों में भी मनरेगा जैसी स्कीम शुरू करने का ऐलान कर सकती हैं। कंस्ट्रक्शन और इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च बढ़ाने से भी शहरी इलाकों में रोजगार के मौके पैदा करने में मदद मिलेगी। रोजगार के छोटे-बड़े मौके पैदा करने में रियल एस्टेट सेक्टर का बड़ा हाथ रहा है। इसलिए इस सेक्टर को बढ़ावा देने से कई तरह के फायदें हो सकते हैं। बजट में निर्मला सीतारमण इस बारे में ऐलान कर सकती हैं।

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