साकेत डालमिया

साकेत डालमिया
बजट 2023: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) ऐसे वक्त नया यूनियन बजट (Union Budget) पेश करने जा रही हैं, जब जियो-पॉलिटिकल टकराव, हाई इनफ्लेशन और ग्लोबल इकोनॉमी पर मंदी का खतरा मंडरा रहा है। इंडिया के टॉप 10 एक्सपोर्ट डेस्टिनेशंस और टॉप 10 इंपोर्ट वाले देशों की इकोनॉमिक ग्रोथ 2023 में घटने का अनुमान है। ऐसे में ग्रोथ के घरेलू स्रोतों को बढ़ावा देने और एक्सपोर्ट के नए मौके तलाशने के लिए नापतौल कर कदम उठाने होंगे। इंडियन इकोनॉमी की ग्रोथ की अच्छी रफ्तार बनाए रखने के लिए यह जरूरी है। पिछले तीन साल में सरकार की तरफ से उठाए गए आर्थिक सुधार के कदमों से इकोनॉमिक ग्रोथ को बढ़ावा देने वाले फैक्टर्स को मजबूती मिली है। फिर भी, हमें कंजम्प्शन बढ़ाने और इनवेस्टमेंट के लिए अनुकूल माहौल बनाने पर फोकस करना होगा।
मेरा मानना है कि देश में कंजम्प्शन से संबंधिति गतिविधियां बढ़ने से फैक्ट्रियों की क्षमता का ज्यादा इस्तेमाल हो सकेगा। इससे क्षमता बढ़ाने के लिए उत्पादकों के बीच सेंटिमेंट मजबूत होगा। ऐसे दो बड़े फैक्टर्स हैं, जो एक विकासशील देश को विकसित देश बनाते हैं। पहला है एक्सपोर्ट और दूसरा है प्रति व्यक्ति इनकम में इजाफा। इन दोनों पर फोकस करने से कंजम्प्शन को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही जीडीपी के फीसदी के रूप में एक्सपोर्ट की हिस्सेदारी बढ़ेगी।
बजट 2023 ऐसे वक्त पेश होने जा रहा है, जब भारत अमृत काल में प्रवेश कर गया है। सरकार ने 2047 तक देश को विकसित भारत बनाने का लक्ष्य तय किया है। देश की आबादी में युवाओं की संख्या ज्यादा है और इनवेस्टमेंट के लिए अनुकूल माहौल है। इसका फायदा इंडिया को मिलना तय है। उद्योग चैंबर PHDCCI का मानना है कि सरकार तीन बातों को ध्यान में रख सकती है।
प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने पर करना होगा फोकस
पहला, कंजम्प्शन आधारित डिमांड बढ़ाने के लिए प्रति व्यक्ति आय बढ़ाना जरूरी है। कंजम्प्शन एक्सपेंडिचर और लॉन्ग टर्म कंज्यूमर ड्यूरेबल्स के लिए टैक्स रिबेट जैसे बेनेफिट बढ़ाए जा सकते हैं। इनमें शॉप और दूसरा घर शामिल हो सकता है। इनवेस्टमेंट और प्रोडक्शन पर इसका कई तरह से असर पड़ेगा। दूसरा, एक्सपोर्ट बढ़ाने के लिए इंडिया को अपनी ताकत का इस्तेमाल करना होगा। MSME सेक्टर सबसे ज्यादा नौकरियों के मौके पैदा करने में दूसरे नंबर पर है। इस क्षेत्र में करीब 11 करोड़ लोगों को रोजगार मिला हुआ है। GDP में MSME सेक्टर की करीब 30 फीसदी हिस्सेदारी है। एक्सपोर्ट में इसकी करीब 48 फीसदी हिस्सेदारी है।
PLI का दायरा बढ़ाया जाए
अभी PLI स्कीम के लाभ खास सेक्टर की बड़ी कंपनियों तक सीमित हैं। अगर सरकार मैन्युफैक्चरिंग में आत्मनिर्भरता हासिल करना चाहती है तो उसे PLI स्कीम के दायरे में MSME को भी लाना होगा। अभी आयात पर देश का काफी पैसा खर्च होता है। पीएलआई स्कीम का दायरा बढ़ाने से इस खर्च में कमी आएगी, क्योंकि आयात में कमी आएगी। साथ ही रोजगार के मौके भी बढ़ेंगे।
अभी जीडीपी का 30 फीसदी हिस्सा इनवेस्टमेंट के लिए इस्तेमाल हो रहा है। 2011 में यह 34 फीसदी था। इसे बढ़ाने की जरूरत है। कुल इनवेस्टमेंट में प्राइवेट सेक्टर की हिस्सेदारी बढ़ाने की जरूरत है। हालांकि, सरकार ने मेक इन इंडिया के जरिए इनवेस्टमेंट को बढ़ावा देने पर फोकस किया है। इस फोकस को और बढ़ाने की जरूरत है। इसे प्राइवेट इनवेस्टमेंट को बढ़ावा मिलेगा।
कानूनों को अपराधों की श्रेणी से बाहर करने की जरूरत
PHDCCI का मानना है कि कंपनियों से जुड़े कई कानूनों और नियमों को अपराध की श्रेणी से बाहर लाने की जरूरत है। आज इंडिया में बिजनेस से जुड़े 1,536 कानून हैं। इनमें से आधे से ज्यादा में जेल का प्रावधान है। इसके अलावा 60,000 से ज्यादा कंप्लायंसेज हैं। हम ऐसे माहौल में प्राइवेट इनवेस्टमेंट तेजी से बढ़ने की उम्मीद नहीं कर सकते, जिसमें उद्यमियों और निवेशकों को कानून का डर सताता हो। हमारा मानना है कि डूइंग बिजनेस की कॉस्ट में भी कमी लाने की जरूरत है। खासकर एमएसएमई के मामले में ऐसा करना होगा। इसकी वजह यह है कि छोटी कंपनियों के पास अपनी शर्तों को लागू करने की ताकत नहीं होती है। अभी छोटे उद्यमों को भी 5,000-50,000 कंप्लायंसेज, लाइसेंसेज और रेगुलेशंस का पालन करना पड़ता है। कॉस्ट ऑफ कंप्लायंसेज चीन, अमेरिका और जापान जैसे टॉप तीन मैन्युफैक्चरिंग देशों से ज्यादा नहीं होनी चाहिए।
बजट 2023 में प्रधानमंत्री के अगले 25 साल के अमृतकाल का विजन होगा। इसलिए इसमें सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास के मंत्र को शामिल किया जाना चाहिए।
(साकेत डालमिया PHDCCI के प्रेसिडेंट हैं)
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