Budget 2023: एक महिला ही दूसरी महिला का दर्द समझती है, तो क्या निर्मला सीतारमण महिलाओं की ये उम्मीदें पूरी करेंगी?

Budget 2023: महिलाओं की दलील है कि कई ऐसे खर्च हैं, जो सिर्फ उन्हें करने पड़ते हैं। सैनिटरी नैपकिन इसका एक उदाहरण है। इसकी कीमतें लगातार बढ़ती रही हैं। कोर्ट में कई याचिकाएं डालने के बाद सरकार ने इस पर जीएसटी खत्म कर दिया है। लेकिन इसके रॉ मैटेरियल पर जीएसटी लगा दिया है

अपडेटेड Jan 20, 2023 पर 11:57 AM
RBI के सर्वे के मुताबिक, देश की आबादी में महिलाओं की हिस्सेदारी 48 फीसदी है। लेकिन, सिर्फ ऐसे 14 फीसदी माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज (MSME) हैं, जिनकी मालिक महिलाएं हैं।

यूनियन बजट 2023 : महंगाई की मार महिलाओं पर सबसे ज्यादा पड़ी है। उनके लिए किचेन से लेकर रोजमर्रा के खर्चों को संभालना मुश्किल हो गया है। ऐसे में उन्हें वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) से बहुत उम्मीदें हैं। उनका मानना है कि वित्तमंत्री खुद एक महिला हैं। ऐसे में वह महिलाओं का दर्द ज्यादा समझ सकती हैं। पिछले बजटों में निर्मला सीतारमण ने महिलाओं के लिए बड़े ऐलान नहीं किए हैं। इससे भी इस बार महिलाओं की उम्मीद बढ़ गई है। उनका कहना है कि कोरोना की महामारी से वे उबरने की कोशिश कर रही थीं। लेकिन, महंगाई की मार ने उनकी कोशिशों पर पानी फेर दिया। फाइनेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण 1 फरवरी को यूनियन बजट पेश करेंगी।

लगातार बढ़ रही सैनिटरी नैपकिन की कीमतें

चंडीगढ़ की 43 साल की जसकिरण कपूर का कहना है कि पिछले साल भी बजट से मुझे काफी उम्मीदें थीं। इस बार भी मुझे बहुत उम्मीदें हैं। अगर महिलाओं की बात करें तो आज भी उन्हें बराबरी का मौका हासिल नहीं है। हमारी जिदंगी के 30 साल मेंस्ट्रुअल साइकिल में निकल जाते हैं। लेकिन, सैनिटरी नैपकिंस की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। कपूर एक फ्रीलांस राइटर और मीडिया कंसल्टेंट हैं। उनकी यह शिकायत देश की करोड़ों महिलाओं का दर्द बयान करती है। सरकार को इस बारे में सोचने की जरूरत है।


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आंत्रप्रेन्योरशिप में पुरुषों के महिलाएं बहुत पीछे

RBI के सर्वे के मुताबिक, देश की आबादी में महिलाओं की हिस्सेदारी 48 फीसदी है। लेकिन, सिर्फ ऐसे 14 फीसदी माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज (MSME) हैं, जिनकी मालिक महिलाएं हैं। इंडिया में स्टार्टअप्स की संख्या तेजी से बढ़ रही है। हर साल कई दर्जन स्टार्टअप्स यूनिकॉर्न बन रहे हैं। लेकिन, ऐसे सिर्फ 5.9 फीसदी स्टार्ट्अप्स हैं, जिन्हें महिलाओं ने शुरू किए हैं।

कोर्ट में कई याचिकाओं पर सुनवाई के बाद सैनिटरी नैपकिंस पर GST खत्म कर दिया गया। लेकिन सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज (CBDT) की एक प्रेस रिलीज के मुताबिक, सैनिटरी नैपकिंस के सभी रॉ मैटेरियल पर जीएसटी अब भी 12-18 फीसदी लग रहा है। शैंपू, इंटिमेंट वॉश, बॉडी वॉश, शेविंग क्रीम आदि पर भी जीएसटी बना हुआ है।

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महिलाओं के प्रोडक्ट्स पुरुषों के मुकाबले महंगे

कपूर ने कहा, "जब आप महिलाओं के इस्तेमाल वाले रोजमर्रा के प्रोडक्ट्स पर टैक्स लगाते हैं और उसे महंगा कर देते हैं तो आप बड़ी संख्या में महिलाओं की पहुंच से उन प्रोडक्ट्स को दूकर कर देते हैं। आखिर महिलाओं को ऐसी चीजों पर हर महीने इतने ज्यादा पैसे क्यों खर्च करना चाहिए जो उन्हें फ्री में मिलनी चाहिए।" उन्होंने कहा कि कई ऐसे प्रोडक्ट्स हैं जो पुरुषों के लिए तो सस्ते हैं लेकिन महिलाओं के लिए महंगे हैं। रेजर (Razor) इसका एक उदाहरण है। पुरुष का रेजर महिला के रेजर से कम से कम 50 फीसदी सस्ता है।

महिलाओं को मिले निवेश के लिए प्रोत्साहन

अगर महिलाओं के इस्तेमाल वाले प्रोडक्ट्स पर टैक्स घटा दिया जाए तो उनके हाथ में ज्यादा पैसे बचेंगे। इसका इस्तेमाल वे ज्यादा सेविंग्स के लिए कर सकेंगी। बेंगुलुरु की एक फाइनेंशियल कंसल्टेंसी फर्म की आस्था गुप्ता ने कहा, "कुछ इनवेस्टमेंट ऐसे हैं, जिनमें टैक्स डिडक्शंस मिलता है, लेकिन उनमें लॉक-इन पीरियड है। पीपीएफ, एनपीएस और महिलाओं से जुड़ी सुकन्या समृद्धि योजना (SSY) में लॉक-इन पीरियड 3 साल से लेकर 15 साल तक है। कई बार हमारे खर्चें बढ़ जाते हैं और हम ऐसी स्कीमों में निवेश नहीं कर पाते।" इन स्कीमों में महिलाओं का निवेश बढ़ाने के लिए थोड़े बदलाव की जरूरत है।

बैंक डिपॉजिट पर इंटरेस्ट रेट्स घटने से भी महिलाओं की मुश्किल बढ़ी है। गुप्ता ने कहा कि बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट पर करीब 6 फीसदी इंट्रेस्ट मिल रहा है। यह पिछले साल की शुरुआत में 5 फीसदी था। कोरोना की महामारी से पहले यह 8 फीसदी होता था। कई महिलाएं अपने बचत के पैसे बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट में रखती हैं। उन्हें यह सबसे आसान विकल्प लगता है। ऐसे में सरकार को उनकी जरूरतो को समझते हुए राहत देने की कोशिश करनी चाहिए।

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