इस महीने पेश होने वाले बजट में सरकार के कर्ज लेने और खर्च करने के अपने टारगेट में बदलाव नहीं करने की उम्मीद है। रायटर्स के पोल के नतीजों से यह पता चला है। इसमें यह भी कहा गया है कि लोकसभा चुनावों में बीजेपी के अपने दम पर सरकार बनाने लायक सीटें नहीं मिलने के बावजूद बॉरोइंग और स्पेंडिंग टारगेट में बदलाव नहीं होगा। बीजेपी ने कुछ क्षेत्रीय दलों के सहयोग से सरकार बनाई है। लेकिन, उसने अपने ज्यादातर मंत्रियों में बदलाव नहीं किया है। इससे संकेत मिलता है कि सरकार की फिस्कल पॉलिसी जारी रहेगी। इसका फोकस इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च के जरिए इकोनॉमिक ग्रोथ बढ़ाने पर बना रहेगा। इस पोल में 45 इकोनॉमिस्ट्स ने हिस्सा लिया।
5 जुलाई से 16 जुलाई के बीच किया गया सर्वे
लेकिन, प्राइवेट एक्सपेंडिचर नहीं बढ़ने का असर रोजगार के नए मौके पर पड़ा है। बेरोजगारी की समस्या बढ़ी है। इसका असर लोकसभा चुनावों के नतीजों पर पड़ा है। पोल में शामिल 45 इकोनॉमिस्ट्स में से 27 ने कहा कि सरकार फुल बजट में अपने खर्च के टारगेट में ज्यादा बदलाव नहीं करेगी। यह 1 फरवरी को अंतरिम बजट के टारगेट जितना बना रहेगा। पोल में शामिल बाकी 18 इकोनॉमिस्ट्स ने कहा कि बॉरोइंग और स्पेंडिंग टारगेट में बदलाव हो सकता है। यह सर्वे 5 जुलाई से 16 जुलाई के बीच किया गया।
फिस्कल कंसॉलिडेशन पर बना रहेगा फोकस
Nomura में चीफ इकोनॉमिस्ट (इंडिया) सोनल वर्मा ने कहा, "हमें उम्मीद है कि बजट से सरकार की पॉलिसी जारी रहने का संकेत मिलेगा। राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव के बावजूद फिस्कल कंसॉलिडेशन पर सरकार का फोकस बना रहेगा। मोदी 3.0 का पहला बजट सरकार के लिए यह संकेत देने के लिए अहम है कि उसका फोकस फिस्कल कंसॉलिडेशन पर बना रहेगा। इससे यह भी पता चलेगा कि सरकार अगले पांच साल के दौरान अपने सहयोगी दल की मांग को किस तरह पूरा करेगी।"
सहयोगी दलों ने मांगी है अतिरिक्त 48,000 करोड़ की मदद
इस पोल में शामिल इकोनॉमिस्ट्स का आम तौर पर यह मानना था कि FY25 में फिस्कल डेफिसिट का टारगेट जीडीपी का 5.1 फीसदी और ग्रॉस बॉरोइंग 14.13 लाख करोड़ रुपये बनी रहेगी। इसका मतलब है कि ये दोनों अंतरिम बजट जितना रहेंगे। सरकार को समर्थन देने वाले दो मुख्य सहयोगी दलों ने अपने राज्यों के लिए अतिरिक्त 48,000 करोड़ रुपये की मदद मांगी है। Oxford Economics के इकोनॉमिस्ट ऐलेक्जेंडरा हर्मैन ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सहयोगी दलों का कुछ दबाव है। लेकिन हमें नहीं लगता है कि इसका असर सरकार की फिस्कल कंसॉलिडेशन की पॉलिसी पर पड़ेगा। इसकी वजह यह है कि RBI से मिले बंपर डिविडेंड की वजह से सरकार के हाथ खाली नहीं हैं।