Union Budget 2023: वेल्थबास्केट क्यूरेटर (WealthBasket Curator)और रुपीटिंग ( Rupeeting) के फाउंडर सागर लेले (Sagar Lele) को इस बात की उम्मीद नहीं है कि बजट 2023 बाजार की दिशा में कोई सिस्टेमेटिक बदलाव लाएगा। लेकिन उनका ये भी मनना है कि बजट प्रस्तावों के चलते बाजार के कुछ सेक्टर्स में तेजी देखने को मिल सकता है। सेबी में रजिस्टर्ड इनवेस्टमेंट एडवाइजर और इक्विटी मार्केट का एक दशक से ज्यादा का अनुभव रखने वाले सागर लेले का कहना है कि इस बजट में सरकार 9 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा के कैपेक्स की प्लानिंग कर सकती है। उन्होंने बजट पर बात करते हुए आगे कहा कि इस बजट में टैक्स दरों में कटौती की कोई उम्मीद नहीं नजर आ रही है। सागर की राय है कि सरकार के लिए टैक्स दरों में कटौती की गुंजाइश भी नहीं और इस समय इसकी कोई जरूरत भी नहीं है।
सीमेंट, कंस्ट्रक्शन, इंजीनियरिंग,इंफ्रा और रेलवे सेक्टर के लिए अच्छा रहेगा वित्त वर्ष 2024
बाजार पर बात करते हुए सागर लेले ने कहा कि वित्त वर्ष 2024 सीमेंट, कंस्ट्रक्शन, इंजीनियरिंग,इंफ्रा और रेलवे सेक्टर के लिए अच्छा रहेगा। मनीकंट्रोल से हुई बातचीत में उन्होंने आगे कहा कि सरकार आगे डिफेंस पर भारी खर्चा करती नजर आ सकती है। ऐसे में आगे हमें डिफेंस शेयरों में अच्छी तेजी देखने को मिल सकती है।
केंद्रीय बैंको की नीति में बदलाव की बात करना जल्दबाजी
क्या आपको लगता है कि आगामी नीतिगत बैठकों के बाद फेडरल रिजर्व और यूरोपीय सेंट्रल बैंक अब दरों में बढ़त पर लगाम लगाएंगे? इस सवाल का जवाब देते हुए सागर लेले ने कहा कि हालांकि दरों में बढ़त की मात्रा कम हो गई है, लेकिन केंद्रीय बैंको की नीति में बदलाव की बात करना जल्दबाजी होगी। बढ़ोतरी की मात्रा और गति में कमी हो सकती है। लेकिन हमें कम से कम 2023 के मध्य तक बढ़ोतरी के रुकने के कोई चांस नजर नहीं आ रहे हैं।
दूसरे उभरते बाजारों की तुलना में भारतीय बाजार का महंगा होना एक निगेटिव फैक्टर
क्या आपको वित्त वर्ष 23 के अंत तक भारतीय बाजारों में कंसोलीडेशन जारी रहने की उम्मीद है? क्या आपको मौजूदा कैलेंडर ईयर में 10-15 फीसदी रिटर्न की उम्मीद नजर आ रही है? इस सवाल के जवाब में सागर ने कहा कि इस साल के लिए 10-15 फीसदी के रिटर्न की उम्मीद करना बहुत ज्यादा है। बाजार में डबल डिजिट रिटर्न के बहुत कुछ अनुकूल होना चाहिए। मार्केट सेंटीमेंट में आने वाला कोई भी निगेटिव बदलाव और लिक्विडिटी के मोर्च पर आने वाली को दिक्कत बाजार की मूड बिगड़ सकती है। विकसित देशों में मंदी के भारतीय बाजारों पर पड़ने वाले असर को लेकर हम बहुत चिंतित नहीं हैं। आखिरकार हमारा एक्सपोर्ट जीडीपी का लगभग 13 फीसदी ही है।
इसके अलावा भारत के पक्ष में कई गुड फैक्टर भी हैं। जैसे महंगाई नियंत्रण में है, घरेलू मांग मजबूत है, पूंजीगत व्यय और विनिर्माण पर सरकार का ध्यान है और खपत दर में मजबूती कायम है। ये सब ऐसे कारण हैं जो बाजार और इकोनॉमी दोनों के लिए शुभ संकेत दे रहे हैं। लेकिन दूसरे उभरते बाजारों की तुलना में भारतीय बाजार का महंगा होना एक निगेटिव फैक्टर जरूर है।
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