Union Budget 2024 : पिछले कई सालों से सरकार के रेवेन्यू में विनिवेश (Disinvestment) और रणनीतिक बिक्री (Strategic Sale) की बड़ी हिस्सेदारी रही है। सरकार का मानना है कि कंपनी चलाना उसका कमा नहीं है। वह कंपनियों के रोजाना के कामकाज से खुद को दूर रखना चाहती है। यही वजह है उसने कुछ कंपनियों में अपनी पूरी हिस्सेदारी तो कुछ में आशंक हिस्सेदारी बचने की रणनीति अपनाई है। उसने सरकारी कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बेचने के लिए कई तरीके अपनाए हैं। इससे सरकार को काफी पैसे मिले हैं। बीते सालों में सरकार ने LIC का आईपीओ पेश किया है। एयर इंडिया को टाटा समूह को बेचा है। रेलवे से जुड़ी कई कंपनियों की लिस्टिंग कराई है। कई सरकारी कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी घटाई है। इससे इन कंपनियों पर सरकार के नियंत्रण में कमी आई है। इसके बावजूद विनिवेश से पैसे जुटाने के लक्ष्य और विनिवेश से सरकार मिले पैसे के बीच बड़ा अंतर रहा है।
टारगेट पूरा नहीं होने की वजह
सरकार ज्यादातर विनिवेश के अपने लक्ष्य को पूरा नहीं कर सकी है। इसकी एक वजह यह हो सकती है कि सरकार का विनिवेश का लक्ष्य व्यावहारिक नहीं रहा है। कई बार कंपनियों में हिस्सेदारी बेचने की उसकी योजना सफल नहीं रही। एचपीसीएल इसका उदाहरण है। एचपीसीएल का खरीदार नहीं मिलने से सरकार को ONGC पर इसे खरीदने का दबाव बनाना पड़ा। संभावित ग्राहकों की तरफ से दिलचस्पी नहीं दिखाने की वजह से भी सरकार को रणनीतिक बिक्री का फैसला टालना पड़ा है। कई बार तकनीकी दिक्कतों की वजह से रणनीतिक बिक्री की सरकार की कोशिश कामयाब नहीं हो पाई है। BPCL इसका उदाहरण है। इस कंपनी में हिस्सेदारी बेचने की योजना इसलिए सफल नहीं हुई, क्योंकि इस कंपनी ने कई कंपनियों में रणनीतिक निवेश किया है, जिनकी निजीकरण नहीं किया जा सका है।
इस वित्त वर्ष में 51,000 करोड़ रुपये का लक्ष्य
वजह जो भी रही हो, विनिवेश के मोर्चे पर सरकार का प्रदर्शन अच्छा नहीं है। इस वित्त वर्ष में सरकार ने विनिवेश से 51,000 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा था। लेकिन अब तक सिर्फ 10,051 करोड़ रुपये मिले हैं। डिसइनवेस्टमेंट टारगेट का पूरा नहीं होना इकोनॉमी के लिए अच्छा नहीं है। सरकार हर साल यूनियन बजट में विनिवेश का लक्ष्य रखती है। इसके पूरा नहीं होने पर उसे बाजार से कर्ज लेना पड़ता है या दूसरे स्रोतों से पैसे जुटाने को मजबूर होना पड़ता है। सरकार के ज्यादा कर्ज लेने से इंटरेस्ट रेट्स बढ़ जाते हैं जिसका खराब असर इकोनॉमी और मार्केट दोनों पर पड़ता है।
अगले वित्त वर्ष के टारगेट पर नजर
इस वित्त वर्ष में विनिवेश का लक्ष्य बहुत ज्यादा नहीं था। इसलिए इसके पूरा नहीं होने पर सरकार को बाजार से ज्यादा कर्ज लेने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ेगा। इस बार यूनियन बजट में सरकार विनिवेश का टारगेट तय करने से बच सकती है। इसकी वजह यह है कि यह अंतरिम बजट है। लोकसभा चुनावों के बाद जो नई सरकार बनेगी वह जुलाई में पूर्ण बजट पेश करेगी। इसमें वह विनिवेश का लक्ष्य तय कर सकती है।