डॉलर का घट रहा दबदबा? तीन दशक में पहली केंद्रीय बैंकों के पास अमेरिकी ट्रेजरी से ज्यादा सोना

Central banks gold reserves: दुनियाभर के सेंट्रल बैंक अब अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स से ज्यादा सोना अपने पास जमा कर रहे हैं। जानिए रणनीतिक बदलाव की क्या वजह है और इसका सोने की कीमतों में पर क्या असर होगा।

अपडेटेड Aug 31, 2025 पर 6:02 PM
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सेंट्रल बैंकों की बढ़ती खरीदारी से सोने की कीमतें ऊपर जाएंगी, जिससे भारत में ज्वेलरी महंगी हो सकती है।

दुनियाभर के सेंट्रल बैंक यानी देशों के 'बड़े बैंक' अब अमेरिकी सरकारी बॉन्ड्स (US Treasuries) से ज्यादा सोना अपने पास जमा कर रहे हैं। यह बदलाव 1990 के दशक के बाद पहली बार देखा गया है। इसे ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम में बड़े शिफ्ट का संकेत माना जा रहा है।

कैसे समझें यह बदलाव

हर देश के पास एक तरह का 'खजाने की तिजोरी' होती है, जिसमें वह अपनी करेंसी और इकोनॉमी की सुरक्षा के लिए रिजर्व रखता है। इसमें आमतौर पर अमेरिकी डॉलर, कुछ यूरो, सरकारी बॉन्ड्स और थोड़ा-सा सोना शामिल होता है। लेकिन अब इस बॉक्स में अमेरिकी बॉन्ड्स से ज्यादा सोना भरना शुरू हो गया है।


कितनी है सोने की होल्डिंग

यूरोपीय सेंट्रल बैंक की International Role of the Euro 2025 रिपोर्ट बताती है कि दुनियाभर के सेंट्रल बैंक मिलकर लगभग 36,000 टन सोना रखते हैं। मौजूदा कीमतों पर इसकी वैल्यू 3.6 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा है। यह अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स की होल्डिंग से आगे निकल गई है, जो US Treasury की जून 2024 सर्वे के अनुसार करीब 3.8 ट्रिलियन डॉलर है।

Reuters के मुताबिक, साल 2025 में सोने की कीमत 3,500 डॉलर प्रति औंस पार कर चुकी है। कीमतों की इस तेजी ने सोने की मार्केट वैल्यू को और बढ़ा दिया है और इसे ट्रेजरी बॉन्ड्स से आगे खड़ा कर दिया है।

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सेंट्रल बैंक का सोने पर भरोसा क्यों बढ़ रहा?

सोने को ब्लॉक या फ्रीज नहीं किया जा सकता। रूस के डॉलर और यूरो रिजर्व्स 2022 में फ्रीज कर दिए गए थे, जिससे कई देशों ने डॉलर और यूरो पर पूरी तरह निर्भर रहना रिस्की समझा। इसके बाद 'सैंक्शन-प्रूफ' एसेट के तौर पर सोना सबसे भरोसेमंद विकल्प बन गया।

इसके अलावा, अमेरिका के लगातार बढ़ते कर्ज को लेकर भी चिंता है। सेंट्रल बैंक नहीं चाहते कि उनका पूरा सेफ्टी नेट सिर्फ अमेरिकी डेट से जुड़ा हो। इसी के साथ, वे अपने रिजर्व को डायवर्सिफाइ करने बनाने यानी डॉलर, यूरो और सोने में संतुलन रखने की दिशा में बढ़ रहे हैं।

सोने की खरीदारी का ट्रेंड

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (WGC) की रिपोर्ट बताती है कि सेंट्रल बैंकों ने 2022 में 1,082 टन, 2023 में 1,037 टन और 2024 में 1,045 टन सोना खरीदा। यह एक दशक पहले की तुलना में दोगुना स्तर है।

साल 2025 में खरीदारी की रफ्तार थोड़ी धीमी रही, लेकिन अब भी मजबूत बनी हुई है। पहले तीन महीनों (Q1) में 244 टन और अगले तीन महीनों (Q2) में 166 टन सोना खरीदा गया। लंदन की कंसल्टेंसी Metals Focus का अनुमान है कि 2025 के अंत तक लगभग 1,000 टन सोना और रिजर्व्स में जुड़ सकता है।

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सेंट्रल बैंकरों का नजरिया

WGC की Central Bank Gold Reserves Survey 2025 बताती है कि 43% सेंट्रल बैंकर्स अगले साल और सोना खरीदने की योजना बना रहे हैं। वहीं 95% का मानना है कि आने वाले सालों में दुनिया भर में सोने की होल्डिंग और बढ़ेगी।

सोने की कीमतों पर क्या असर होगा?

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) भी लगातार सोना खरीद रहा है। मार्च 2025 तक RBI के पास करीब 880 टन सोना था, जो भारत के कुल रिज़र्व्स का लगभग 12% हिस्सा है। यह कदम रुपये को ग्लोबल करेंसी उतार-चढ़ाव से बचाने में मदद करता है। हालांकि, इसका दूसरा असर यह है कि घरेलू सोने की मांग और ऊंची अंतरराष्ट्रीय कीमतें आम उपभोक्ताओं के लिए ज्वेलरी महंगी बना देती हैं।

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क्या डॉलर की पकड़ ढीली हो रही है?

सीधा जवाब है, नहीं। IMF COFER डेटा (2024) दिखाता है कि डॉलर अब भी 58% ग्लोबल फॉरेक्स रिजर्व्स में मौजूद है। यूरोपीय सेंट्रल बैंक के आंकड़े (46%) तभी दिखते हैं जब इसमें सोने को भी शामिल किया जाता है। इसलिए डॉलर अब भी दुनिया की रिजर्व करेंसी नंबर-वन है। लेकिन, यह भी साफ है कि सोना मजबूती से दूसरे नंबर पर पहुंच चुका है।

आपके लिए क्यों मायने रखता है

सेंट्रल बैंकों की बढ़ती खरीदारी से सोने की कीमतें ऊपर जाएंगी, जिससे भारत में ज्वेलरी महंगी हो सकती है। साथ ही, ज्यादा सोना भारत जैसे देशों को ग्लोबल शॉक्स के समय मजबूत सुरक्षा देता है। यह ट्रेंड एक बड़े बदलाव का संकेत भी है कि दुनिया धीरे-धीरे डॉलर-प्रधान सिस्टम से हटकर संतुलन वाले सिस्टम की तरफ बढ़ रही है।

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