Reliance Industries (RIL) अपने नए बिजनेस में 75,000 करोड़ रुपये इनवेस्ट कर रही है। इस बिजनेस का फोकस क्लीन एनर्जी (Clean Energy) पर है। इसके तहत सोलर और ग्रीन हाइड्रोजन आते हैं। कंपनी चार गीगा फैक्ट्रीज बनाएगी। इनमें सोलर, स्टोरेज बैटरी, ग्रीन हाइड्रोजन और एक फ्यूल सेल फैक्ट्री शामिल होंगी, जो हाइड्रोजन को मोबाइल और स्टेशनरी पावर में कनवर्ट कर सकेंगी।
सोलर एनर्जी के बारे में चर्चा पहले से होती रही है। लेकिन ग्रीन हाइड्रोजन हाल में फोकस में आया है। क्लाइमेट क्राइसिस के खिलाफ लड़ाई में इसकी बड़ी भूमिका मानी जा रही है। सरकार भी हाइड्रोजन एनर्जी के इस्तेमाल को बढ़ावा दे रही है। Reliance Industries और Chart Industries ने हाइड्रोजन टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल के लिए समझौता किया है। दोनों ने मिलकर H2 Alliance (IH2A) बनाया है।
सवाल है कि हाइड्रोजन टेक्नोलॉजी का महत्व इतना क्यों बढ़ गया है? कौन-कौन सी कंपनियां और सरकार इस फील्ड में काम कर रही हैं? आइए इन सवालों के जबाव जानने की कोशिश करते हैं।
हाइड्रोजन टेक्नोलॉजी का मतलब ऐसी टेक्नोलॉजी से है, जिसका इस्तेमाल ऐसी हाइड्रोजन के उत्पादन के लिए होता है, जिससे वातावरण को कोई खतरा नहीं होता है। अभी हाइड्रोजन का इस्तेमाल पेट्रोलियम रिफाइनिंग, एयरोस्पेस अप्लिकेशंस, केमिकल की मैन्युफैक्चरिंग, स्टील की मैन्युफैक्चरिंग और अमोमिया फर्टिलाइजर की मैन्युफैक्चरिंग में होता है। हालांकि, अभी हाइड्रोजन बनाने के लिए Fossil Fuel (पेट्रोलियम, कोयला, नेचुरल गैस आदि) का इस्तेमाल होता है।
Fossil Fuels और Biomass के इस्तेमाल से केमिकल प्रोसेस के जरिए हाइड्रोजन बनाई जाती है। दूसरा तरीका Electrolysis या Renewable Energy का इस्तेमाल है। रिन्यूएबल एनर्जी में Solar और Wind Energy शामिल है। इनके इस्तेमाल से वाटर (H2O) को हाइड्रोजन (H2) और ऑक्सीजन (O2) में विभाजित किया जाता है। दुनियाभर में कंपनियां और सरकार इस तरीके से हाइड्रोजन बनाने पर फोकस कर रही हैं।
ग्रीन हाइड्रोजन बनाना क्यों जरूरी है?
इसकी सबसे बड़ी वजह क्लाइमेट क्राइसिस है। पिछले कुछ सालों में इंडस्ट्रियल यूज के लिए हाइड्रोजन की मांग बढ़ी है। 1975 में इसकी डिमांड 20 टन से कम थी, जो 2018 में बढ़कर 70 टन से ज्यादा हो गई। ये डेटा International Energy Agency (IEA) के हैं।
IEA के डेटा के मुताबिक, हाइड्रोजन के उत्पादन से कार्बन डायआक्साइड (CO2) का उत्सर्जन होता है। इसके उत्पादन पर हर साल करीब 83 करोड़ टन Co2 पैदा होती है। यह इंग्लैंड और इंडोनेशिया के कुल Co2 उत्सर्जन के बराबर है। इसलिए क्लीन एनर्जी का इस्तेमाल बहुत जरूरी है।
ग्रीन हाइड्रोजन बनाने में इंडिया की क्या है स्थिति?
क्लीन एनर्जी के इस्तेमाल से हाइड्रोजन बनाने में इंडिया दूसरे देशों से आगे है। इसने क्लीन एनर्जी के इस्तेमाल से हाइड्रोजन के उत्पादन के लिए दुनिया की दूसरी कंपनियों और एजेंसियों से हाथ मिलाया है। रिलायंस इंडस्ट्रीज के सीईओ मुकेश अंबानी ने एनुअल जनरल मीटिंग में कहा था, "ग्रीन हाइड्रोजन एनर्जी का अनोखा स्रोत हो सकता है। ट्रांसपोर्टेशन और पावर इंडस्ट्री जैसे सेक्टर में इसके इस्तेमाल से Co2 के उत्सर्जन में कमी लाई जा सकती है।"
रिलायंस क्लीन एनर्जी पर फोकस कर रही है। कंपनी ने दो गीगा फैक्ट्रीज लगाने का प्लान बनाया है, जिनमें ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन होगा। दो गीगा फैक्ट्रीज सोलर एनर्जी और स्टोरेज के लिए बनाई जाएंगी।
सरकार भी ग्रीन हाइड्रोजन के इस्तेमाल को बढ़ावा दे रही है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने फरवरी 2021 में अपने बजट भाषण में हाइड्रोजन एनर्जी मिशन को लॉन्च करने का ऐलान किया था। इसका मकसद रिन्यूएबल स्रोतों से हाइड्रोजन का उत्पादन है। उसी महीने इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन ने Centre of Excellence on Hydrogen (CoE-H) की स्थापना के लिए Greenstat Norway से समझौता किया था। इसमें टेक्नोलॉजी का ट्रांसफर और शेयरिंग दोनों शामिल हैं।
इंडिया में दूसरी कंपनियां भी ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन की कोशिश कर रही हैं। मार्च 2021 में चेन्नई की BGR Energy Systems ने इंडिया में ग्रीन एनर्जी प्रोजेक्ट्स विकसित करने के लिए आयरलैंड की फ्यूजन फ्यूल ग्रीन से समझौता किया था। अप्रैल में इंडियन हाइड्रोजन अलायंस बनाया गया। इसका मकसद हाइड्रोजन टेक्नोलॉजी का कमर्शियलाइजेशन है।