भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन का कहना है कि यह डर कि आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस (AI) अगले कुछ सालों में बड़ी संख्या में व्हाइट-कॉलर नौकरियों को खत्म कर सकता है, शायद बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया है। टेक्नोलॉजी को अपनाने की गति, प्रतिस्पर्धा और सार्वजनिक नीतियां ही तय करेंगी कि यह बदलाव किस तरह से सामने आता है। प्रोजेक्ट सिंडिकेट की ओर से हाल ही में पब्लिश एक कमेंट्री में राजन ने इक्विटी रिसर्च फर्म सिट्रिनी द्वारा जारी एक अनुमान पर चर्चा की। इस अनुमान में चेतावनी दी गई थी कि AI 2028 तक ज्यादातर व्हाइट-कॉलर नौकरियों को खत्म कर सकता है, जिसके अर्थव्यवस्था पर बड़े परिणाम होंगे।
हालांकि ऐसे परिणामों से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन राजन ने कहा कि यह भविष्यवाणी कुछ मायनों में निश्चित रूप से बहुत ज्यादा निराशावादी है। ऐतिहासिक रूप से, नई टेक्नोलॉजी को अलग-अलग उद्योगों में फैलने में उम्मीद से ज्यादा समय लगता है। राजन ने लिखा, "सॉफ्टवेयर जैसे कुछ क्षेत्रों को छोड़कर, टेक्नोलॉजी को अपनाने में आने वाली रुकावटें और स्वाभाविक जड़ता शायद बदलाव की गति को धीमा कर देंगी। उन्होंने इसके उदाहरण के तौर पर ऑटोमेटेड टेलीफोन एक्सचेंज का जिक्र किया, जिन्हें इंसानी ऑपरेटरों की जगह पूरी तरह लेने में दशकों लग गए थे।
राजन ने लिंक्डइन पर भी इसी बात को दोहराया है। कहा है कि AI से जुड़ी कई भविष्यवाणियां सार्वजनिक और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं की भूमिका को नजरअंदाज कर देती हैं। उन्होंने लिखा, "मुझे लगता है कि बहुत से लोग इस संभावना पर विचार नहीं करते कि समाज की भी इस बात पर राय होगी कि यह बदलाव किस तरह से सामने आएगा।"
AI अर्थव्यवस्था में संभावित नतीजे
राजन ने AI अर्थव्यवस्था में कई संभावित परिणामों की रूपरेखा तैयार की। एक स्थिति यह हो सकती है कि कुछ ही AI प्लेटफॉर्म बाजार पर हावी हो जाएं। ये प्लेटफॉर्म टेक्नोलॉजी के मामले में बहुत आगे निकल जाएंगे और उन व्यवसायों से ऊंची कीमतें वसूलेंगे, जो इन पर निर्भर हैं। इस तरह के दबदबे से AI फर्मों को भारी मुनाफा कमाने का मौका मिल सकता है। साथ ही, अलग-अलग उद्योगों की कंपनियां अपने बौद्धिक कार्यों को ऑटोमेट कर सकेंगी और व्हाइट-कॉलर कर्मचारियों की संख्या में कटौती कर सकेंगी। नौकरी गंवाने वाले कर्मचारी रिटेल या हॉस्पिटैलिटी जैसे सर्विस सेक्टर में जा सकते हैं, जिससे इन क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा बढ़ जाएगी और मजदूरी कम हो जाएगी।
राजन ने एक अलग परिणाम का भी जिक्र किया, जिसमें ChatGPT और Gemini जैसे कई AI सिस्टम एक जैसी क्षमताएं पेश करते हैं। ऐसे बाजार में, प्रतिस्पर्धा के कारण AI की कीमतें कम रह सकती हैं। इससे उत्पादकता में होने वाला लाभ कुछ ही फर्मों तक सीमित रहने के बजाय पूरी अर्थव्यवस्था में फैल जाएगा। सामान और सेवाओं की कम कीमतें नौकरी के नुकसान की कुछ हद तक भरपाई कर सकती हैं, जबकि मजबूत मांग अन्य क्षेत्रों में रोजगार को बढ़ावा दे सकती है।
सरकारें भी अपने नीतिगत फैसलों के जरिए यह तय करने में भूमिका निभा सकती हैं कि कौन सा परिणाम सामने आएगा। इन फैसलों में प्रतिस्पर्धा से जुड़े नियम, AI की कीमतों का रेगुलेशन, या बाजार पर हावी प्लेटफॉर्म्स के अतिरिक्त मुनाफे पर टैक्स लगाना शामिल हो सकता है। राजन ने लिखा, “अगर AI की वजह से होने वाला दर्द सचमुच बड़े पैमाने पर है, तो इसमें दखल देने की राजनीतिक प्रेरणा मजबूत बनी रहेगी।”
राजन ने कहा कि सबसे ज्यादा संभावना इस बात की है कि यह बदलाव धीरे-धीरे होगा। काम करने वालों को तुरंत अपनी नौकरी गंवाने के बजाय, AI टूल का इस्तेमाल करना सीखने और उसके हिसाब से ढलने का समय मिल जाएगा। लेकिन उन्होंने आगाह भी किया कि जैसे-जैसे यह टेक्नोलॉजी आगे बढ़ेगी, सरकारों और कंपनियों को अलग-अलग संभावनाओं के लिए तैयार रहना चाहिए।