दुनिया में शुरू हुआ नए तरीके का शीत युद्ध, ग्लोबल GDP को इस साल पहुंचा 1.6 लाख करोड़ डॉलर का नुकसान

यूक्रेन पर रूस के आक्रमण और चीन के कोविड लॉकडाउन ने पूरी दुनिया में सप्लाई चेन को बिगाड़ दिया है, जिससे ग्लोबल इकोनॉमी की ग्रोथ प्रभावित हो रही है

अपडेटेड May 19, 2022 पर 8:57 PM
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दुनिया भू-राजनीतिक कारणों से गुटों में बंटती हुई दिख रही है

जो रिश्ते अभी तक ग्लोबल अर्थव्यवस्था को एक साथ जोड़कर रखते थे और दुनिया भर में पर्याप्त मात्रा में माल पहुंचाते थे, वे अब बहुत तेजी से बिखर रहे है। यूक्रेन पर रूस के आक्रमण और चीन के कोविड लॉकडाउन ने पूरी दुनिया में सप्लाई चेन को बिगाड़ दिया है, जिससे ग्रोथ प्रभावित हो रही है और कई देशों में महंगाई 40 साल तक के उच्च स्तर पर पहुंच गई है। ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स ने अपनी हालिया रिपोर्ट में, इन्ही वजहों से साल 2022 में ग्लोबल जीडीपी के अनुमान में 1.6 लाख डॉलर की कटौती कर दी है।

साथ ही उन्होंने आगे चलकर इसमें और इजाफा होने की आशंका जताई है। लड़ाई या कोई भी महामारी हमेशा नहीं जारी रहती। एक समय बाद इनका अंत जरूर होता है। हालांकि एक्सपर्ट का कहना है कि इस बार एक नई तीसरी समस्या पैदा होती दिख रही है, जो लंबे समय तक जारी रह सकती है। यह समस्या है पूरी दुनिया के कई गुटो में बंटने की।

ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स का कहना है कि दुनिया भू-राजनीतिक कारणों से गुटों में बंटती हुई दिख रही है और यह आने वाले समय में और बढ़ता हुआ दिख रहा है। ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि अगर यह ऐसे ही जारी रहा, तो दुनिया कम उत्पादन और पहले से गरीब हो सकती है, जैसा चीन के वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन (WTO) के शामिल होने से पहले था।


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इसका अलावा एक अतिरिक्त झटका यह होगा कि दुनिया में महंगाई पहले की अपेक्षा अधिक रहेगा। अगर दुनिया को महंगाई और ग्रोथ के मोर्चे पर झटके मिलेंगे, तो यह शेयर या बॉन्ड मार्केट के लिए भी अच्छी खबर नहीं होगी। साल 2022 में अभी तक कमोडिटी की कीमतें काफी बढ़ी हैं, साथ ही उन कंपनियों के शेयर भी बढ़े हैं जो इनका उत्पादन या व्यपार करती हैं। इसके अलावा भू-राजनीतिक तनावों की वजह से डिफेंस कंपनियों के शेयर भी चढ़े हैं।

WTO के मुख्य अर्थशास्त्री रॉबर्ट कोपमैन कहते हैं, "गुटों में बंटना आगे भी जारी रहेगा।" वह एक "ग्लोबलाइजेशन के नए सिरे से संगठिन होने का अनुमान जता रहे हैं, जिसकी दुनिया को एक कीमत भी चुकाने पड़ सकती है। उन्होंने कहा, "हम पहले कम या मामूली लागत के उत्पादन का जितने बड़े स्तर पर इस्तेमाल कर पाते थे, अब नहीं कर पाएंगे।"

पिछले तीन दशकों से ग्लोबल इकोनॉमी की खासियत रही है, वह कहीं से कम कीमतों पर अधिक से अधिक वस्तुओं को पूरी दुनिया में सप्लाई करने की क्षमता रखता है। चीन के WTO में जुड़ने और सोवियत संघ के कई पूर्व देशों के आने से ग्लोबल लेवर मार्केट में 1 लाख से अधिक वर्कर जुड़े, जिन्होंने बड़े पैमाने पर उत्पादन में अपना योगदान दिया और दुनिया में एक तरह से उत्पादों की प्रचुरता का युग शुरू हुआ।

तीन दशकों से, विश्व अर्थव्यवस्था की एक परिभाषित विशेषता यह रही है कि वह कभी भी कम कीमतों पर अधिक से अधिक वस्तुओं का मंथन करने की क्षमता रखता है। वैश्विक श्रम बाजार में चीन और पूर्व सोवियत ब्लॉक के एक अरब से अधिक श्रमिकों के प्रवेश, व्यापार बाधाओं और अति-कुशल रसद के साथ मिलकर, कई लोगों के लिए प्रचुरता का युग उत्पन्न हुआ।

हालांकि पिछले चार सालों में यह स्थिति लगातार बदल रही है। पहले अमेरिका और चीन में ट्रेड वार शुरू हुआ, जिसके चलते दोनों देशों ने एक दूसरे के माल को अपने देश में बिकने से रोकने के लिए उन पर टैरिफ कई गुना बढ़ाना शुरू किया। इसमें बाद लॉकडाउन ने पूरी दुनिया को ग्रोथ अचानक से रोक दिया। फिर अब रूस और यूक्रेन के बीच जंग ने दुनिया के कई देशों को फिर से एक गुट चुनने और दूसरे गुट से व्यापार रोकने के लिए मजबूर किया है।

इन सबकी वजह से विकसित देशों को एक ऐसी समस्या का सामना करना पड़ रहा है, जिसके बारे में उन्होंने कई सालों से सोचा नहीं था और वो है उत्पादों की कमी की। विकसित देशों तो फिर अपने आप को कुछ समय तक संभाल सकते हैं, लेकिन यह विकासशील और गरीब देशों में फ्यूल और फूड सिक्योरिटी के बड़े गंभीर खतरे पैदा कर सकता है। हाल ही में इसके चलते श्रीलंका और पेरू में बारी उथल-पुथल देखी गई है। इकोनॉमिस्ट्स ने कहा कि यह एक नई तरह का शीत-युद्ध है, जिससे दुनिया को बचने का तरीका खोजना होगा।

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