मिडिल-ईस्ट में छिड़ी जंग से भारत की GDP पर भी पड़ सकता है असर, BMI रिपोर्ट ने दी चेतावनी
मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव का असर भारत की आर्थिक ग्रोथ पर पड़ सकता है। फिच ग्रुप की इकाई BMI ने अपनी नई रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि यह भू-राजनीतिक संकट निवेशकों का भरोसा कमजोर कर सकता है। साथ ही अमेरिका और यूरोपीय यूनियन के साथ संभावित व्यापार समझौतों से मिलने वाले लाभ को भी आंशिक रूप से संतुलित कर सकता है
Iran-US-Israel War: भारत अपनी कच्चे तेल की कुल जरूरतों का लगभग 88 प्रतिशत आयात करता है
मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव का असर भारत की आर्थिक ग्रोथ पर पड़ सकता है। फिच ग्रुप की इकाई BMI ने मंगलवार 3 मार्च को जारी अपनी ताजा इंडिया आउटलुक रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि यह भू-राजनीतिक संकट निवेशकों का भरोसा कमजोर कर सकता है। साथ ही अमेरिका और यूरोपीय यूनियन के साथ संभावित व्यापार समझौतों से मिलने वाले लाभ को भी आंशिक रूप से संतुलित कर सकता है।
रिपोर्ट में BMI ने वित्त वर्ष 2026/27 के लिए भारत की GDP ग्रोथ दर का अनुमान 7 प्रतिशत पर बरकरार रखा है। एजेंसी का कहना है कि 2026 में अब तक नीतिगत अनिश्चितता तुलनात्मक रूप से कंट्रोल में रही है, लेकिन मार्च से हालात तेजी से बदल सकते हैं।
BMI के अनुसार, “मार्च के बाद अनिश्चितता में तेज बढ़ोतरी की आशंका है, क्योंकि मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष गहरा रहा है। हमारा मानना है कि इससे भारत में निवेश हतोत्साहित होगा और यूरोपीय यूनियन व अमेरिका के साथ होने वाले व्यापार समझौतों से मिलने वाले लाभ का कुछ हिस्सा कम हो जाएगा।”
अमेरिका-इजरायल की कार्रवाई के बाद बढ़ा तनाव
यह आकलन ऐसे समय आया है जब 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर सैन्य हमले किए। इसके जवाब में ईरान ने ड्रोन और मिसाइल हमलों के जरिए इजरायल, खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों और दुबई जैसे ग्लोबल बिजनेस हब को निशाना बनाया।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरान ने 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' से गुजरने वाले जहाजों को चेतावनी दी है। यह जलडमरूमध्य पूरी दुनिया की एनर्जी सप्लाई के लिए अहम मार्ग है। अगर यह समुद्री मार्ग पूरी तरह बंद हो जाता है तो, एनर्जी की बढ़ती कीमतों के कारण भारत की GDP में सीधे 0.5 प्रतिशत अंक तक की कमी आ सकती है।
करीब 33 किलोमीटर चौड़ा यह समुद्री मार्ग पर्शियन गल्फ को अरब सागर से जोड़ता है और दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल इसी रास्ते से गुजरता है। अमेरिकी और इजरायली हमलों के बाद ईरान ने जहाजों को इस मार्ग से दूर रहने की चेतावनी दी, वहीं बीमा कंपनियों की ओर से इंश्योरेंस कवरेज वापस लेने की खबरों से टैंकरों की आवाजाही भी प्रभावित हुई है।
भारत अपनी कच्चे तेल की कुल जरूरतों का लगभग 88 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में क्रूड की सप्लाई या उसके दाम में उछाल का इसकी इकोनॉमी पर सीधा असर पड़ता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो इससे देश का आयात बिल बढ़ेगा और ईंधन महंगाई पर दबाव बढ़ेगा।
ट्रेड डील से मिल सकता है सहारा
हालांकि, BMI ने यह भी कहा कि भारत ने हाल में कुछ व्यापारिक समझौते किए है, जो इसके ग्रोथ के लिए पॉजिटिव हैं। एजेंसी ने पिछले महीने सहमत हुए नए भारत-अमेरिका व्यापार ढांचे का जिक्र किया, जिसके तहत अंतरिम समझौते के हिस्से के रूप में अमेरिका टैरिफ को घटाकर 18 प्रतिशत करने पर सहमत हुआ है। अब इस ढांचे को कानूनी रूप देकर पहले चरण के द्विपक्षीय समझौते को लागू किया जाना है।
इसी बीच, फरवरी में अमेरिकी की सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन के लगाए रेसिप्रोकल टैरिफ को रद्द कर दिया। कोर्ट ने राष्ट्रपति ट्रंप ने 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट के तहत अपने अधिकारों का अतिक्रमण किया था। फैसले के बाद अमेरिका ने 24 फरवरी से 150 दिनों के लिए सभी देशों पर 10 प्रतिशत का नया टैरिफ लागू किया। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे 15 प्रतिशत तक बढ़ाने की योजना की घोषणा भी की है, हालांकि इस पर अभी औपचारिक आदेश जारी नहीं हुआ है।
इस बीच यूरोप के साथ डील के मोर्चे पर भी प्रगति हुई है। जनवरी में भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर सहमति बनी, जिसे कानूनी मंजूरी के बाद एक साल के भीतर लागू किए जाने की उम्मीद है।
कुल प्रभाव पर नजर
BMI का मानना है कि अगर ये व्यापार समझौते सफलतापूर्वक लागू होते हैं, तो वे भारत की GDP ग्रोथ संभावनाओं को मौजूदा अनुमान से ऊपर ले जा सकते हैं। हालांकि, अंतिम प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि मिडिल ईस्ट का संघर्ष किस दिशा में जाता है और क्या एनर्जी सप्लाई से जुड़ा संकट गहराता है।
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