Pension Loan: Easy tips to secure loans for pensioners
बैंक लोन जहां सस्ती ब्याज दर और सख्त अप्रूवल क्राइटेरिया वाले होते हैं, वहीं प्राइवेट लोन जल्दी अप्रूव होते हैं और फ्लेक्सिबल शर्तों के साथ मिलते हैं. सही ऑप्शन आपकी जरूरत और फंड की इमरजेंसी पर निर्भर करता है.
किसी भी व्यक्ति के पास बैंक और प्राइवेट लेंडर दोनों से लोन लेने का ऑप्शन होता है. बैंक जहां सस्ती ब्याज दर पर लोन देते हैं, वहीं प्राइवेट लेंडर जल्दी और बिना झंझट के लोन देते हैं. तो अब सवाल ये उठता है कि इन दोनों में से किसे चुना जाए. इसका सही जवाब तभी मिलेगा जब आप बैंक और प्राइवेट लोन की ब्याज दरों, अप्रूवल टाइम और फ्लेक्सिबिलिटी की तुलना करेंगे.
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बैंक लोन कैसे काम करता है?
बैंक लोन एक फाइनेंशियल प्रोडक्ट है और इसके तहत लोगों को उनकी जरूरत के लिए पैसे दिए जाते हैं. इसे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) बैंकिंग रेग्युलेशन एक्ट, 1949 के तहत रेग्युलेट करता है.
अगर आपका क्रेडिट स्कोर अच्छा है और आप लोन प्रोसेस पूरा होने तक इंतजार कर सकते हैं, तो बैंक लोन एक बेहतरीन ऑप्शन हो सकता है. हालांकि, इस लोन के लिए एलिजिबिलिटी तय करने के लिए बैंकों के नियम काफी सख्त होते हैं. आपको बैंक स्टेटमेंट, एम्प्लॉयमेंट हिस्ट्री और बाकी कई डॉक्युमेंट देने पड़ते हैं.
प्राइवेट लेंडर लोन कैसे काम करता है?
प्राइवेट लेंडर की सबसे बड़ी खासियत 'फ्लेक्सिबिलिटी' है. भारत में प्राइवेट लेंडर के सामान्य उदाहरणों में NBFCs, इंडिविजुअल मनीलेंडर, पीयर-टू-पीयर लेंडिंग प्लेटफॉर्म और प्राइवेट फाइनेंस कंपनियां शामिल हैं.
बैंक लोन के मुकाबले प्राइवेट लोन में डॉक्युमेंटेशन काफी कम होता है. प्राइवेट लेंडर का फोकस ये जानने पर ज्यादा होता है कि एप्लिकेंट अपनी मौजूदा फाइनेंशियल स्थिति के आधार पर लोन चुका पाएगा या नहीं.
अगर किसी को तुरंत लोन चाहिए और ज्यादा डॉक्युमेंटेशन से बचना हो, तो प्राइवेट लेंडर लोन एक अच्छा ऑप्शन हो सकता है.
यहां देखें कि किन मामलों में बैंक लोन और प्राइवेट लेंडर लोन अलग-अलग हैं:
रिस्क असेसमेंट और लोन अप्रूवल
बैंक लोन एप्लिकेशन को जांचने के लिए सख्त नियम अपनाते हैं. इसमें एप्लिकेंट का क्रेडिट स्कोर, फाइनेंशियल हिस्ट्री और पूरी प्रोफाइल चेक की जाती है. इसका फायदा ये है कि सिर्फ वे लोग ही लोन ले पाते हैं, जिनमें रिपेमेंट की क्षमता होती है. लेकिन इस प्रोसेस में काफी समय भी लग जाता है.
दूसरी ओर, प्राइवेट लेंडर इतनी सख्ती नहीं बरतते. इसी वजह से प्राइवेट लोन अप्रूवल तेजी से हो जाता है.
ब्याज दरें और फीस
बैंकों की ब्याज दरें प्राइवेट लोन के मुकाबले काफी सस्ती होती हैं. हालांकि, बैंक लोन में प्रोसेसिंग फीस, सर्विस चार्ज और प्री-पेमेंट पेनल्टी भी लगती है.
प्राइवेट लेंडर ज्यादा जोखिम उठाते हैं, इसलिए वे आमतौर पर ब्याज दरें ऊंची रखते हैं. लेकिन खास बात ये है कि प्राइवेट लेंडर अक्सर कोई एक्स्ट्रा चार्ज नहीं लगाते.
लोन फ्लेक्सिबिलिटी और कस्टमाइजेशन
बैंक पहले से तय लोन ऑप्शन देते हैं, जिनमें से आपको अपनी जरूरत के मुताबिक चुनना होता है. इसमें कस्टमाइजेशन की गुंजाइश नहीं होती.
वहीं प्राइवेट लेंडर के मामले में आप शर्तों को काफी हद तक अपनी जरूरत के अनुसार कस्टमाइज कर सकते हैं. यही उनकी सबसे बड़ी खासियत है.
इस्तेमाल में आसानी
ऑनलाइन लेंडिंग प्लेटफॉर्म और इंस्टेंट लोन ऐप्स ने पर्सनल लोन लेना बेहद आसान कर दिया है. अब सिर्फ कुछ टैप्स में स्मार्टफोन से लोन के लिए अप्लाई किया जा सकता है. डॉक्युमेंट की फिजिकल कॉपी देने की भी जरूरत नहीं होती और लोन अप्रूवल प्रोसेस भी बहुत तेज होता है. कुछ ही मिनटों या घंटों में लोन अमाउंट आपके अकाउंट में ट्रांसफर हो सकता है.
आजकल ज्यादातर लेंडर अपने लोन ऐप को यूजर-फ्रेंडली और फीचर्स से भरपूर बना रहे हैं, ताकि ग्राहक आसानी से लोन मैनेज कर सकें और जरूरत के हिसाब से लोन ले सकें.
निष्कर्ष
बैंक लोन और प्राइवेट लोन में से किसी एक को चुनने के लिए आपको अपनी प्राथमिकताएं तय करनी होंगी. हमेशा अपनी फाइनेंशियल स्थिति के आधार पर लोन की शर्तों और कुल खर्च की तुलना करके शुरुआत करें. इससे आपको पता चलेगा कि कौन सा ऑप्शन आपकी जरूरत के मुताबिक है.
अगर आप सस्ती ब्याज दर और पारदर्शिता चाहते हैं, तो बैंक लोन आपके लिए बेहतर रहेगा. लेकिन अगर आपको लोन जल्दी चाहिए और शर्तों में फ्लेक्सिबिलिटी चाहिए, तो प्राइवेट लोन बेहतर हो सकता है.
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