प्रियंका बंसल (बदला हुआ नाम) एक एडटेक कंपनी की फाउंडर हैं। पिछले साल नवबंर में वह सीरीज-ए राउंड की फडिंग की तहत 1.2 करोड़ डॉलर जुटाने की कोशिश में थी। उन्हें पूरा भरोसा था कि वह जिस वैल्यूशन पर फंडिंग जुटा रही हैं, उसमें उन्हें कोई दिक्कत नहीं आएगी। उनका आकलन सरल था कि स्टार्टअप इंडस्ट्री में फंडिंग की जो दिक्कत आई है, उसका असर अभी शुरुआती चरण के स्टार्टअप्स पर नहीं पड़ा था। साथ ही उनका यह भी मानना था कि उनका स्टार्टअप हायर एजुकेशन और अपस्किलिंग को लक्ष्य में रखकर काम करता है और एडटेड सेक्टर का यह सेगमेंट इस समय काफी फोकस में है।
रूस-यूक्रेन जंग के बीच महंगाई को रोकने के लिए दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों की तरफ से ब्याज दरें बढ़ाने की घटना ने पिछले साल वित्तीय बाजारों को बुरी तरह प्रभावित किया था, जिसके चलते स्टार्टअप इंडस्ट्री में फंडिंग की किल्लत आ गई थी।
साल 2021 में भारतीय स्टार्टअप्स ने करीब 41 अरब डॉलर की इक्विटी फंडिंग जुटाई थी। हालांकि साल 2022 की पहली तिमाही तक आते-आते स्थितियां बदल गईं। ट्रैक्सन टेक्नोलॉजीज के एक आंकड़े के मुताबिक, साल 2022 में प्राइवेट इक्विटी (PF) फर्मों और वेंचर कैपिटल से आने वाली फंडिंग घटकर 25.9 अरब डॉलर पर आ गया। साल 2022 के आखिरी तीन महीने में तो फंडिंग पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले आधा घटकर 18.1 अरब डॉलर रही।
बसंल की कंपनी के एक सलाहकार ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "सीरीज-ए और शुरुआती चरण के फंडिंग राउंड में इस साल भी हलचल रही और निवेशक मजबूत ग्रोथ की संभावना वाले सेक्टर्स की तलाश में थे।"
सलाहकार ने बताया, "उन्हें (बंसल को) फंडिंग पाने का पूरा भरोसा था। उनका TAM (टोटल एड्रेसेबल मार्केट) भी काफी बड़ा था, ऐसे में रेवेन्यू ग्रोथ की संभावना भी अधिक थी और वह इसी कहानी को बेचने की तैयारी में थीं। अगर मैं ईमानदारी से अपनी बात कहूं तो एक तेजी से बढ़ते मार्केट में शुरुआती चरण के स्टार्टअप के लिए यह एक बहुत अच्छी कहानी है।"
कैसे बदल गई फंडिंग से जुड़ी बातचीत
हालांकि बसंल जब नवंबर में निवेशकों से मिलीं, तो उन्हें यह देखकर बहुत हैरानी हुई कि निवेशकों ने उनके स्टार्टअप के अनुमानित रेवेन्यू ग्रोथ और TAM के बारे में बहुत ही कम सवाल पूछे। यहां तक कि जिस सेक्टर में स्टार्टअप काम कर रहे हैं, उसके भी ग्रोथ आउटलुक को उन्होंने बहुत कम सवाल पूछे। इसकी जगह उन्होंने कंपनी के मुनाफे में आने की योजना, उसका यूनिट इकोनॉमिक्स, आगे खर्च में कैसे कटौती की जाएगी और कंपनी की कम IPO लाने की योजना है, इसके बारे में अधिक सवाल पूछे। सीरीज-ए की फंडिंग राउंड के दौरान आमतौर पर निवेशकों की तरफ से ऐसे सवाल नहीं पूछे जाते हैं।
सलाहकार ने बताया, “पिछले साल भी स्टार्टअप फंड जुटाने के लिए बाजार में था। उसे निवेशकों की अच्छी दिलचस्पी भी मिली, लेकिन उसने यह सोचकर पैसे नहीं जुटाए कि अगर वह अपने रेवेन्यू मेट्रिक्स पर काम करता है, तो उसे बेहतर डील पाने का मौका मिल सकता है।"
उन्होंने कहा, "पिछले साल निवेशक रेवेन्यू ग्रोथ और TAM को लेकर सवालों की बौछार कर रहे थे। लेकिन इस साल फंडिंग के स्तर पर कमी आने के बाद स्थितियां बदल गईं। उदाहरण के लिए पिछले साल वे 'रेवेन्यू मल्टीपल' पर खूब चर्चा करते थे, जिसकी जगह इस साल 'EBITDA मल्टीपल' ने ले ली है। जिन स्टार्टअप का यूनिट इकोनॉमिक्स नहीं है, उनमें निवेशक कम दिलचस्पी दिखा रहे हैं। "
कॉकरोच स्टार्टअप की बढ़ी मांग
बंसल अकेली नहीं हैं। कई फाउंडरों ने इस साल फंडिंग जुटाते समय ऐसा ही अनुभव किया। निवेशक शुरुआती चरणों में निवेश के दौरान भी अब रेवेन्यू ग्रोथ के अनुमानों और TAM से आगे बढ़कर चीजें देख रहे हैं।
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम है। इस स्टार्टअप इकोसिस्टम को हिलाने वाली फंडिंग की किल्लत ने इनवेस्टर्स को भी अपने निवेश के फैसलों के बारे में सतर्क कर गिया है। निवेशक अब 'कॉकरोच' स्टार्टअप में निवेश को लेकर अधिक दिलचस्पी दिखा रहे हैं, जिनमें किसी भी परिस्थिति को सफलतापूर्वक झेलने की क्षमता होती है। निवेश के लिहाज से साल 2023 में सभी तरह के स्टार्टअप्स के बीच 'कॉकरोच' स्टार्टअप की मांग यूनिकॉर्स से भी अधिक रह सकती है। कॉकरोच शब्द का इस्तेमाल एक ऐसे स्टार्टअप को बताने के लिए किया जाता है, जिसके अंदर विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी लागत में कटौती करके कारोबार में बने रहने की क्षमता होती है।