US Supreme Court Decision: अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने 20 फरवरी को दूसरे देशों पर टैरिफ लगाने के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के फैसले को रद्द कर दिया। इससे ट्रंप को बड़ा झटका लगा है। लेकिन, एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। सवाल है कि उस 133 अरब डॉलर के टैरिफ का क्या होगा, जो अमेरिका ने रेसिप्रोकल टैरिफ के रूप में दूसरे देशों के निर्यातकों से वसूला है?
टैरिफ के रिफंड को लेकर तस्वीर साफ नहीं
निर्यातक कंपनियों ने रिफंड के लिए क्लेम फाइल करना शुरू कर दिए हैं। लेकिन, इसका प्रोसेस क्या होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। ट्रेड से जुड़े मामलों की जानकारी रखने वाले वकीलों का कहना है कि रिफंड्स मिलने की संभावना है, लेकिन इससे जुड़ा सिस्टम चैलेंजिंग हो सकता है। भारत उन देशों में से एक था, जिन पर ट्रंप ने सबसे ज्यादा टैरिफ लगाया था। हालांकि, फरवरी की शुरुआत में ट्रंप ने भारत पर टैरिफ 50 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी करने का ऐलान किया था।
कोर्ट्स में रिफंड के क्लेम की बाढ़ आ सकती है
Vinson & Elkins लॉ फर्म में पार्टनर Joyce Adetutu ने एसोशिएटेड प्रेस को बताया, "यह फिलहाल मुश्किलभरा रास्ता लग रहा है। अदालतों को मुश्किल वक्त का सामना करना पड़ेगा। इंपोर्ट्स के लिए भी यह मुश्किल वक्त होगा। सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह से ट्रंप के टैरिफ को खत्म करने का फैसला सुनाया है, उसमें रिफंड का किसी तरह का ऑप्शन नहीं होना काफी मुश्किल पैदा करेगा।" 20 फरवरी को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रंप ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर दूसरे देशों पर रेसिप्रोकल टैरिफ लगाया है।
रेसिप्रोकल टैरिफ से अमेरिका ने कमाए 133 अरब डॉलर
मशहूर अंग्रेजी अखबार Wall Street Journal के मुताबिक, रेसिप्रोकल टैरिफ से अमेरिका ने करीब 133 अरब डॉलर का रेवेन्यू कमाया है। यह डेटा दिसंबर के मध्य तक का है। यह फाइनेंशियल ईयर 2025 में कलेक्टेड कुल टैरिफ का करीब 67 फीसदी और सितंबर अंत से 14 दिसंबर तक कुल टैरिफ कलेक्शन का 57 फीसदी है। ट्रेड से जुड़े ट्रंप के दूसरे उपायों से इस दौरान कुल ड्यूटी करीब 202 अरब डॉलर रही। यह एक साल पहले के मुकाबले दोगुना से ज्यादा है।
ट्रंप ने कहा था कि देश के हित में लिया टैरिफ लगाने का फैसला
अमेरिका ने जिन देशों पर ज्यादा रेसिप्रोकल टैरिफ लगाया था उनमें चीन, मैक्सिको, कनाडा, इंडिया और जापान शामिल थे। ट्रंप की दलील थी कि उन्होंने अमेरिकी व्यापार घाटा को कम करने के लिए दूसरे देशों पर रेसिप्रोकल टैरिफ लगाया। उनका यह भी कहना था कि रेसिप्रोकल टैरिफ से हुई कमाई से अमेरिकी सरकार के कर्ज में कमी आएगी। साथ ही सरकार अमेरिकी नागरिकों पर ज्यादा खर्च कर सकेगी, जरूरतमंद सेक्टर्स की मदद कर सकेगी और किसानों को राहत दे सकेगी।
रिफंड का तरीका नहीं बताने के लिए सुप्रीम कोर्ट की आलोचना
ट्रंप के टैरिफ पर फैसला सुनाने वाले जजों में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस ब्रेट कावेनाग भी शामिल थे। उन्होंने रिफंड के मसले को अनसुलझा छोड़ने के लिए कोर्ट की आलोचना की है। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इस बारे में कुछ नहीं कहा कि सरकार फॉरेन गुड्स पर वसूले गए अरबों डॉलर के टैरिफ को किस तरह से वापस करेगी। उन्होंन यह भी कहा कि रिफंड के प्रोसेस को लेकर काफी समस्याएं हो सकती हैं।
अमेरिकी सरकार के अधिकारियों को लगाने होंगे कोर्ट्स के चक्कर
खुद ट्रंप ने भी रिफंड में देरी की बात मानी है। मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि मेरा मानना है कि इस मसले को लेकर अगले दो साल में काफी विवाद हो सकते हैं...हमें अगले पांच सालों तक अदालतों का चक्कर लगाना पड़ सकता है। इस बीच इलिनोइस के गवर्नर जेबी प्रिजकर ने ट्रंप के टैरिफ के बारे में कहा है कि इसने किसानों की कमर तोड़ दी है, सहयोगी देशों को नाराज किया है और इससे ग्रॉसरी की कीमतें आसमान में पहुंच गई हैं।