Adani vs Vedanta: वेदांता ने अदाणी ग्रुप के प्रस्ताव को सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती, जेपी ग्रुप की संपत्तियों को लेकर छिड़ी जंग

दिवालिया हो चुके जेपी ग्रुप की संपत्तियों के अधिग्रहण का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। वेदांता ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की है, जिसमें जेपी ग्रुप के एसेट्स के लिए अदाणी ग्रुप की ओर से पेश किए रिजॉल्यूशन प्लान पर रोक लगाने की मांग की गई है। इस मामले की सीधी जानकारी रखने वाले लोगों ने मनीकंट्रोल को यह जानकारी दी

अपडेटेड Mar 30, 2026 पर 1:23 PM
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दिवालिया हो चुके जेपी ग्रुप पर करीब ₹57,000 करोड़ का कर्ज बकाया है

दिवालिया हो चुके जेपी ग्रुप की संपत्तियों के अधिग्रहण का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। वेदांता ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की है, जिसमें जेपी ग्रुप के एसेट्स के लिए अदाणी ग्रुप की ओर से पेश किए रिजॉल्यूशन प्लान पर रोक लगाने की मांग की गई है। इस मामले की सीधी जानकारी रखने वाले लोगों ने मनीकंट्रोल को यह जानकारी दी।

माना जा रहा है वेदांता सुप्रीम कोर्ट में यह दलील देने की तैयारी कर रही है कि उसका प्रस्ताव अदाणी ग्रुप के मुकाबले अधिक मूल्यवान था और कर्जदाताओं की समिति (CoC) ने उसके प्लान को खारिज करने में गलती की। सूत्रों ने बताया कि अगले कुछ हफ्तों में इस मामले की सुनवाई होने की उम्मीद है।

यह मामला इसलिए भी अहम है, क्योंकि वेदांता ग्रुप के चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने एक दिन पहले 29 मार्च को एक सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया था कि जेपी ग्रुप की संपत्तियों के लिए पहले उनकी कंपनी को सफल बोलीदाता घोषित किया गया था, लेकिन बाद में फैसला बदल दिया गया।


अग्रवाल ने कहा, “हाल ही में IBC प्रक्रिया के तहत CoC ने इन संपत्तियों को सार्वजनिक नीलामी के लिए रखा। इसमें कई मजबूत बोलीदाता शामिल हुए। अचानक जयप्रकाश गौर जी की भावना और इच्छाएं मेरे मन में आ गईं। एक-एक करके सभी बोलीदाता बाहर हो गए। आखिर में हमें सार्वजनिक रूप से सबसे ऊंची बोली लगाने वाला घोषित किया गया। यह एक पारदर्शी प्रक्रिया थी। हमें लिखित में बताया गया कि हम जीत गए हैं। लेकिन जिंदगी इतनी आसान नहीं होती। कुछ दिनों बाद फैसला बदल दिया गया। मैं इसके डिटेल्स में नहीं जाना चाहता।”

बोलियों की जंग

NCLAT ने पिछले हफ्ते जेपी ग्रुप की संपत्तियों के लिए अदाणी ग्रुप के रिजॉल्यूशन प्लान पर रोक लगाने की वेदांता की याचिका खारिज कर दी थी। हालांकि, ट्रिब्यूनल ने मुख्य याचिका पर सभी पक्षों से जवाब मांगा है और मामले की अगली सुनवाई 14 अप्रैल को होने की संभावना है।

वहीं, वेदांता ने इस मामले पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया, जबकि मनीकंट्रोल की ओर से अदाणी ग्रुप को भेजे गए ईमेल सवालों का कोई जवाब नहीं मिला।

₹57,000 करोड़ का मामला और IBC प्रक्रिया

यह पूरा विवाद दिवालिया हो चुके जेपी ग्रुप की उन संपत्तियों को लेकर है, जिन पर करीब ₹57,000 करोड़ का कर्ज बकाया है। कंपनी इंनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्टसी कोड (IBC) के तहत समाधान प्रक्रिया में है। इस प्रक्रिया के तहत संभावित खरीदारों को 24 जून 2025 तक अपनी बोली जमा करनी थी। इस दौड़ में अदाणी ग्रुप और वेदांता दोनों प्रमुख दावेदार के रूप में सामने आए।

बोली की टक्कर: कौन आगे?

अदाणी ग्रुप और वेदांता, दोनों ने इन संपत्तियों के लिए बोली लगाई थी और दोनों को प्रमुख दावेदार माना जा रहा था। आखिरकार, अडानी ग्रुप ने बोली जीत ली, क्योंकि करीब 90% कर्जदाताओं ने उसके रिजॉल्यूशन प्लान के पक्ष में वोट किया।

अदाणी ग्रुप ने 14,535 करोड़ रुपये देने की पेशकश की थी। इसमें 6,000 करोड़ रुपये का एडवांस भुगतान शामिल था और बाकी रकम 2-3 साल में चुकाई जानी थी। दूसरी ओर, वेदांता ने 17,000 करोड़ रुपये की शुरुआती बोली लगाई थी, जिसमें लगभग 4,000 करोड़ रुपये एडवांस भुगतान के तौर पर थे और बाकी रकम 6 साल में देने का प्रस्ताव था।

कर्जदाताओं का मानना था कि अदानी ग्रुप का प्रस्ताव ज्यादा बेहतर है, क्योंकि उसमें तुरंत मिलने वाली रकम ज्यादा थी और बाकी पैसा भी 2-3 साल में मिल जाता, जबकि वेदांता के मामले में यह अवधि 6 साल की थी।

वेदांता का संशोधित प्रस्ताव भी खारिज

वेदांता ने नवंबर में अपनी बोली में बदलाव किया और उसे और ज्यादा प्रतिस्पर्धी बना दिया। संशोधित बोली के तहत, वेदांता ने कुल 16,726 करोड़ रुपये देने का प्रस्ताव रखा, जिसमें 6,563 करोड़ रुपये एडवांस भुगतान के तौर पर देने थे और बाकी रकम 5 साल में चुकानी थी।

जनवरी में वेदांता ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT), इलाहाबाद का रुख किया और कर्जदाताओं की ओर से अदाणी ग्रुप के प्लान को मंजूरी देने के फैसले को चुनौती दी। कंपनी ने ट्रिब्यूनल से कहा कि वह जेपी ग्रुप की संपत्तियों के लिए सबसे ऊंची बोली लगाने वाली थी और उसका नेट प्रेजेंट वैल्यू (NPV) भी बेहतर था, इसके बावजूद कर्जदाताओं ने कम वैल्यू वाले प्लान को मंजूरी दे दी।

वेदांता ने यह भी कहा कि IBC का उद्देश्य दिवालिया संपत्तियों से अधिकतम वैल्यू हासिल करना है। इसलिए कर्जदाताओं की जिम्मेदारी है कि वे सबसे ज्यादा रिकवरी सुनिश्चित करें।

कंपनी ने आरोप लगाया कि कर्जदाताओं ने अपनी फिड्यूशियरी ड्यूटी निभाने में विफल रहे और अधिकतम रिकवरी सुनिश्चित नहीं की। वेदांता ने ट्रिब्यूनल से अडानी ग्रुप द्वारा प्रस्तुत रिज़ोल्यूशन प्लान को रद्द करने की याचिका की।

NCLT से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक का सफर

17 मार्च को NCLT ने वेदांता का मामला खारिज कर दिया और अडानी ग्रुप के रिजॉल्यूशन प्लान को मंजूरी दे दी, जिसके बाद कंपनी ने NCLAT का रुख किया। वहां से भी राहत नहीं मिलने पर अब उसने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

इस मामले से परिचित एक वकील ने बताया, “वेदांता ने जेपी ग्रुप के कर्जदाताओं के फैसले की योग्यता पर सवाल उठाया है। IBC के तहत, कर्जदाताओं की समिति की व्यावसायिक समझ को पवित्र माना जाता है और यह तय करने के कोई नियम नहीं हैं कि कौन सी बोली मंजूर की जानी चाहिए। अब तक NCLT और NCLAT ने यही मान्यता दी है। अब यह देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर क्या रुख अपनाता है।”

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