USSR के विभाजन के 30 साल से ज्यादा हो चुके हैं। तब व्लादिमीर पुतिन 39 साल के थे। वह रूस के विघटन से खुश नहीं थे। एक बार उन्होंने मीडिया को बताया था कि रूस के बंटने से 1,000 साल पुरानी विरासत का ज्यादातर हिस्सा खत्म हो गया है। गुरुवार को यूक्रेन पर हमले के बाद एक बार फिर से पुतिन के शख्सियत की चर्चा शुरू हो गई है। क्या वह साम्राज्यवादी हैं, क्या वह रूस को फिर से दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बनाना चाहते हैं, या यूक्रेन पर हमला सिर्फ रूस में सत्ता में बने रहने की उनकी तिकड़म का हिस्सा है? आइए इन सवालों के जवाब जानने की कोशिश करते हैं।
1997 में रूस के राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन ने पुतिन में छिपी संभावनाओं को पहचान लिया था। उन्होंने भांप लिया था कि यह व्यक्ति 21वीं सदी में रूस का नेतृत्व करने के लिए सही व्यक्ति है। फिर पुतिन को येल्तसिन का डिप्टी चीफ ऑफ स्टॉफ नियुक्त किया गया। अगले साल उन्हें FSB का चीफ बना दिया गया। इसके तुरंत बाद येल्तसिन ने पुतिन को अपना प्राइम मिनिस्टर नियुक्त कर दिया। खराब स्वास्थ्य की वजह से 1999 में येल्तसिन के अचानक इस्तीफ दे देने के बाद पुतिन रूस के कार्यवाहक राष्ट्रपति बन गए।
इसके बाद पुतिन ने सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत करनी शुरू की। उन्होंने चुनाव के रास्ते सत्ता की शीर्ष पर पहुंचने का फैसला किया। मार्च 2000 में हुए चुनाव में उन्हें 53 फीसदी वोट मिले। तब से वह लगातार रूस में सत्ता पर काबिज हैं। वह रूस के तानाशाह जोसेफ स्टालिन के बाद रूस की सत्ता में सबसे लंबे समय तक रहने वाले व्यक्ति हैं। 2018 में दोबारा छह साल के लिए निर्वाचित होने के बाद उन्होंने संविधान में संशोधन के जरिए खुद को 2036 तक सत्ता में बनाए रखने का रास्ता साफ कर दिया। हालांकि, इस संशोधन को लेकर काफी विवादित हुआ।
पुतिन का जन्म लेनिनग्राद के एक कामकाजी परिवार में 1952 में हुआ था। अब लेनिनग्राड को सेंट पीट्सबर्ग कहा जाता है। बचपन से ही उनका व्यहवहार आक्रामक था। अक्सर पड़ोस के बच्चों से उनकी लड़ाई हो जाती है। इसी आक्रामक व्यवहार ने उन्हें जूडो की तरफ आकर्षित किया। इस खेल ने उनकी आक्रामकता बनाए रखने में काफी भूमिका निभाई। वह जूडो के एक के बाद कई प्रतियोगिता जीतते चले गए। फिर, उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
बताया जाता है कि स्कूली पढ़ाई पूरी करने से पहले ही उन्होंने सेवियत इंटेलिजेंस के लिए काम किया था। 1975 में लॉ की डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने सोवियत सीक्रेट पुलिस फोर्स KGB में काम करना शुरू किया। उनकी नियुक्ति बतौर ट्रांसलेटर पूर्वी जर्मनी में हुई। बताया जाता है कि वहां उनका काम सिर्फ प्रेस क्लिपिंग्स इकट्ठा करने तक सीमित था। बर्लिन वॉल गिरने के बाद वह रूस लौट आए। उसके बाद से वह सरकारी तंत्र में लगातार अपनी स्थिति मजबूत करते गए। एक के बाद एक वह सत्ता की सीढी पर चढ़ते गए। आज रूस में उन्हें चैलेंज करने वाला कोई नहीं है। जिन लोगों ने उनके खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश की, उन्हें रास्ते से हटा दिया गया।
एक्सपर्ट्स बताते हैं कि अगर 2000 से अब तक सत्ता में पुतिन के सफर को देखें तो साफ हो जाता है कि उनका रूख विस्तारवादी रहा है। मार्च 2016 में उन्होंने सैन्य हस्तक्षेप से यूक्रेन को क्रीमिया से अपने कब्जे में कर लिया। मार्च 2014 में सीरिया में सरकार के विद्रोहियों पर बम बरसाए। अब यूक्रेन पर हमला कर उन्होंने बता दिया है कि उन्हें रोकना नामुमकिन है। इसलिए वह खुद को 'मैन ऑफ मिशन' बताते हैं। अमेरिका सहित पश्चिमी देशों से उनके रिश्ते कभी अच्छे नहीं रहे। उन्होंने कभी इसकी परवाह भी नहीं की। शायद वह जानते हैं कि मौजूदा भू-राजनीतिक माहौल में अपनी ताकत का इजहार करने के लिए यह सही मौका है।