Trump Tariffs: किसानों के लिए अमेरिका से क्यों भिड़ गया भारत? इन 3 बड़े मुद्दों पर अटकी US से ट्रेड डील
Trump Tariffs: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ धमकियों का भारत ने दोटूक जबाव दिया है। ट्रंप ने भारत पर पहले 25% का टैरिफ बढ़ाया, लेकिन फिर उसे बढ़ाकर 50% कर दिया है। ट्रंप को लगा कि इस टैरिफ ट्रिक से भारत उनकी सभी मनमानी शर्तों को मान लेगा। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अब साफ शब्दों में कह दिया है कि भारत किसानों के हितों की रक्षा के लिए हर कीमत चुकाने को तैयार हैं
Trump Tariffs: डेयरी प्रोडक्ट्स भी भारत-अमेरिका ट्रेड डील में एक बड़ा टकराव का मुद्दा बना हुआ है
Trump Tariffs: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ धमकियों का भारत ने दोटूक जबाव दिया है। ट्रंप ने भारत पर पहले 25% का टैरिफ लगाया, लेकिन फिर उसे बढ़ाकर 50% कर दिया है। ट्रंप को लगा कि इस टैरिफ ट्रिक से भारत उनकी सभी मनमानी शर्तों को मान लेगा। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अब साफ शब्दों में कह दिया है कि भारत किसानों के हितों की रक्षा के लिए हर कीमत चुकाने को तैयार हैं। मोदी ने MS स्वामीनाथन सेंटेनरी इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए कहा, "भारत अपने किसानों, पशुपालकों और मछुआरों के हितों से कभी समझौता नहीं करेगा। मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूं कि इसके लिए मुझे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी, लेकिन मैं इसके लिए तैयार हूं। भारत अपने किसानों के साथ मजबूती से खड़ा है, और मैं उनके कल्याण के लिए सभी तरह की चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हूं।"
पीएम मोदी के इस बयान के बाद भारत-अमेरिका के बीच ट्रेड डील पर जारी बातचीत एक अहम मोड़ पर आ गई है। अमेरिका का एक ट्रेड डेलीगेशन अब 24 अगस्त को छठे दौर की बातचीत के लिए भारत आ रहा है। इस बातचीत से पहले यह समझना जरूरी है कि आखिर भारत किसानों के मुद्दे पर अमेरिका से क्यों टकरा रहा है? भारत के इतने सख्त रुख की वजह क्या है? दोनों देशों के बीच ट्रेड डील किन-किन मुद्दों पर अटक रही है?
भारत क्यों टकरा रहा है अमेरिका से?
अमेरिका लगातार भारत पर दबाव बना रहा है कि वह अपने एग्रीकल्चर मार्केट को अमेरिकी उत्पादों के लिए खोले। अमेरिकी चाहता है कि उसके डेयरी, पोल्ट्री, मक्का, सोयाबीन, चावल, गेहूं, एथेनॉल, फल और बादाम-पिस्ते जैसे मेवों को बिना किसी शुल्क के भारतीय मार्केट में एंट्री मिले। लेकिन भारत ने अब तक सिर्फ ड्राई फ्रूट्स और सेब जैसे कुछ उत्पादों के लिए ही बाजार खोलने पर सहमति दी है। जबकि मक्का, सोयाबीन, गेहूं और डेयरी जैसे सेक्टर्स के लिए भारत सख्ती से मना कर रहा है।
इसके पीछे असली वजह यह है कि अमेरिका के अधिकतर मक्का और सोयाबीन जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) होते हैं, जबकि भारत में अभी तक GM फसलों के आयात की इजाजत नहीं है। भारत में जीएम फसलों को स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए खतरनाक माना जाता है, और खुद बीजेपी से जुड़े कई संगठन GM फसलों के विरोध में हैं।
डेयरी उत्पादों पर क्यों है टकराव?
GM फसलों के अलावा डेयरी प्रोडक्ट्स भी भारत-अमेरिका ट्रेड डील में एक बड़ा टकराव का मुद्दा बने हुए हैं। भारत में डेयरी केवल भोजन का साधन नहीं है, बल्कि करोड़ों छोटे और भूमिहीन किसानों की आय का साधन है। खासकर जब मानसून सीजन कमजोर हो या फिर किसी बीमारी या प्राकृतिक आपदा के चलते फसलों की पैदावार घट जाए, तब दूध-दही का उत्पादन ही किसानों की आय का आखिरी सहारा होता है। इसके अलावा, भारत एक ऐसा देश है जिसकी एक बहुत बड़ी आबादी शाकाहारी है। जबकि अमेरिकी पशुपालन में जानवरों को मांस आधारित चारा खिलाना काफी आम बात है, जो भारतीय के सांस्कृतिक मूल्यों से मेल नहीं खाता है।
राजानितिक रुप से संवेदनशील मुद्दा
इसके अलावा एग्रीकल्चर इंपोर्ट का मामला राजनीतिक रूप से भी काफी पेंचीदा है। भारत आज लगभग सभी कृषि उत्पादों के मामले में आत्मनिर्भर है। यानी हम अपनी जरूरत भर का उत्पादन खुद ही कर लेते हैं। सिर्फ एडिबल ऑयल ही इकलौता ऐसा प्रोडक्ट है, जिसका बड़े पैमाने पर इंपोर्ट होता है। हम अपनी जरूरत का लगभग दो-तिहाई एडिबल ऑयल विदेशों से इंपोर्ट करते हैं। ऐसे में सरकार नहीं चाहती कि जैसे तीन दशक पहले हमने एडिबल ऑयल के मामले में आत्मनिर्भरता गंवाई थी, वैसा ही हाल अब गेहूं, मक्का या दूध जैसे बुनियादी फूड आइटम्स पर हो।
खेती यानी एग्रीकल्चर हमारी GDP का सिर्फ 16% हिस्सा है, लेकिन यह भारत की लगभग आधी आबादी का पेट भरती है। यही वजह है कि यह आज भी देश का सबसे बड़ा वोट बैंक भी है। चार साल पहले जब सरकार ने तीन कृषि सुधार कानून लाए थे, तो उसे भी किसानों के जबर्दस्त विरोध के चलते उन्हें वापस लेना पड़ा था। अगर सरकार अब अमेरिकी कृषि उत्पादों को देश में आने देती है, तो इससे स्थानीय बाजार में कीमतें गिरेंगी। इससे किसानों में असंतोष फैलेगा और विपक्ष को सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने का मौका मिल सकता है।
एथेनॉल के इंपोर्ट पर भारत नहीं है राजी
GM फूड और डेयरी के अलावा भारत-अमेरिका के बीच तीसरा टकराव का मुद्दा एथेनॉल भी है। ट्रंप चाहते हैं कि भारत पेट्रोल और डीजल में मिलाने के लिए एथेनॉल भी उससे ही खरीदे। भारत इसका उतना ही विरोध कर रहा है, जितना कि वह GM फूड्स का कर रहा है। भारत ने अपने क्रूड ऑयल के इंपोर्ट को घटाने के लिए हाल ही में इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (EBP) नाम से एक प्रोग्राम शुरू किया था। इसके तहत पेट्रोल में 20% इथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य हाल ही में हासिल किया गया है।
यह एथेनॉल गन्ने और मक्के से बनता है, जिससे किसानों को भी सपोर्ट मिला है। भारतीय कंपनियों ने नई डिस्टिलरी में भारी निवेश किया है, और किसानों ने मक्का की खेती को बढ़ाया है। अब अगर भारत अमेरिका से एथेनॉल के आयात की इजाजत देता है, तो इससे देश में मक्का की कीमतें घट सकती है, जो किसानों का काफी नुकसान पहुंचाएगी। इसका असर बिहार चुनाव में भी देखने को मिल सकता है, जो मक्का उत्पादन के मामले में एक प्रमुख राज्य है।
भारत और अमेरिका के किसानों में काफी अंतर
इसके अलावा भारत और अमेरिका के किसानों और उनकी खेती में काफी अंतर भी है। अमेरिकी खेती तकनीकी रूप से बेहद आधुनिक और बड़े पैमाने पर होती है। जबकि भारत की खेती आज भी पारंपरिक और छोटे स्तर पर केंद्रित है। भारत में औसत खेत का साइज सिर्फ 1.08 हेक्टेयर है, जबकि अमेरिका में यह 187 हेक्टेयर है। अगर हम डेयरी सेक्टर की बात करें तो वां यह अंतर और भी बड़ा है। जहां भारत में एक किसान के पास 2-3 पशु होते हैं, वहीं अमेरिका में एक फार्म पर सैकड़ों गायें होती हैं। इससे स्पष्ट है कि भारतीय किसान बिना किसी सरकारी सुरक्षा उपाय के बाजार में अमेरिकी किसानों से मुकाबला नहीं कर सकते।
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