Problems in Agriculture: खेती-किसानी में कई दिक्कतें आती हैं और जरूरी नहीं कि लागत निकल ही आए और मुनाफा मिले भी तो कभी-कभी यह बहुत कम होता है। इसे लेकर एक पूरनलाल ने अपनी खेती की समस्याएं साझा कीं। उन्होंने बताया कि महंगी लागत और कम रेट्स के बावजूद वे गोभी की फसल उगाते हैं। बल्लभगढ़ मंडी में कीमतें बदलती रहती हैं, जबकि महंगाई और मजदूरी की दरें बढ़ने से परिवार का गुजारा कठिन हो गया है। उन्होंने बताया कि वह बरेली के रहने वाले हैं और फिलहाल मलेरणा गांव में रह रहे हैं। उनका खेत पट्टे पर है और वहां उन्होंने ढाई बीघा में गोभी की फसल लगाई है।
किसान पूरनलाल के परिवार में 25 लोग हैं और वे मलेरणा गांव में रहते हैं। उनकी खेती की हालत और महंगाई के कारण पूरे परिवार के लिए जीवन यापन करना कठिन हो गया है, लेकिन फिर भी वे अपनी मेहनत और संघर्ष से खेती जारी रखते हैं।
खेत की जुताई और बीज की लागत
किसान ने बताया कि गोभी की फसल लगाने के लिए सबसे पहले खेत की जुताई की जाती है और फिर बीज डाले जाते हैं। ढाई बीघा में बीज पर लगभग 5000 रुपये की लागत आती है। इसके अलावा खेत में पौध डालने की भी प्रक्रिया होती है, जिससे फसल की गुणवत्ता बढ़ती है। बीज के पैकेट का वजन लगभग 10 ग्राम होता है और इसके बाद ही मेहनत का फल मिलता है। इसके बाद गोभी को मंडी ले जाया जाता है।।
मंडी में रेट और मजदूरी की स्थिति
गोभी की फसल को बल्लभगढ़ मंडी में बेचा जाता है। हालांकि किसान ने बताया कि मंडी में रेट बहुत अलग-अलग होते हैं। कभी 20 रुपये, कभी 25 रुपये, और कभी 40 रुपये तक मिलते हैं लेकिन इससे किसानों को कोई खास फायदा नहीं होता। मजदूरी की दर भी 500 रुपये प्रति दिन है, लेकिन फसल में निवेश की तुलना में बहुत कम बचत होती है। खाद, बीज, दवाइयों और सिंचाई पर भी अतिरिक्त खर्च आता है जिससे कुल मिलाकर कोई अधिक लाभ नहीं होता है।
महंगाई और गोभी की फसल की देखभाल
किसान ने महंगाई का जिक्र करते हुए कहा कि गोभी की फसल में खाद, डीएपी, और कीटनाशक दवाइयों का खर्च बहुत बढ़ गया है। इसके अलावा गोभी में कीड़े लगने की समस्या भी रहती है, जिसके लिए दवाइयां डालनी पड़ती हैं। गोभी की फसल को तीन महीने में तैयार किया जाता है, और इस दौरान दो से तीन बार सिंचाई भी करनी पड़ती है।