घी, नारियल तेल और मक्खन से डैमेज हो सकता है लीवर, विशेषज्ञों ने रिफाइंड को बताया बेहतर विकल्प

Liver Health: सोशल मीडिया पर द लिवरडॉक नाम से मशहूर डॉ. साइरिएक एबी फिलिप्स खाना पकाने के लिए रिफाइंड तेल और सीधे इस्तेमाल के लिए कोल्ड-प्रेस्ड तेल इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं। वो कहते हैं कि घी और नारियल तेल लिवर में फैट के जमा होने में योगदान करते हैं

अपडेटेड May 18, 2025 पर 4:07 PM
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हेपेटोलॉजिस्ट का कहना है कि घी, नारियल तेल, मक्खन लीवर के स्वास्थ्य को खराब कर सकते हैं

Liver Health: सालों से इस बात को लेकर बहस चल रही है कि कौन से तेल या घी स्वास्थ्य के लिए अच्छे हैं। खासकर तब जब बात घर पर प्रयोग होने वाले तेल या घी को लेकर हो। भारतीय किचन में आमतौर पर घी, नारियल तेल और मक्खन का इस्तेमाल किया जाता है। वैसे ये वो चीजें होती है जिनका असर सीधे तौर पर हमारे लिवर पर होता है। इनके लॉयल समर्थक भी हैं, खासकर वे न्यूट्रिशनिस्ट जो उनकी शुद्धता और स्वास्थ्य लाभों का बखान करते हैं। हालांकि हेपेटोलॉजिस्ट डॉ. साइरिएक एबी फिलिप्स, लिवर के स्वास्थ्य पर एक अलग दृष्टिकोण रखते हैं।

पारंपरिक चीजें भी कर सकती है लिवर को डैमेज: डॉ. फिलिप्स

सोशल मीडिया पर द लिवरडॉक नाम से मशहूर फिलिप्स ने एक्स पर लिखा, नारियल तेल, घी, लार्ड और मक्खन जैसे संतृप्त वसा से रिफाइंड (खाना पकाने के लिए), और कोल्ड प्रेस्ड (सीधे उपयोग के लिए) तेलों पर स्विच करें। ये तेल मोनोअनसैचुरेटेड और पॉलीअनसेचुरेटेड से भरपूर होते है, जिससे लिवर के टेस्ट में सुधार होता है और चर्बी भी कम होती है। द लिवरडॉक की ये सलाह इस धारणा का खंडन करती है कि पारंपरिक चीजें स्वस्थ के लिए फायदेमंद होती है।

लेकिन, क्या इसका कोई सबूत है जो ये दर्शाता है कि घी और नारियल तेल जैसे संतृप्त वसा लिवर के फंक्शन को खराब करते हैं या उसमें फैट के जमा होने में योगदान करते हैं?

घी, मक्खन और नारियल तेल से होता है लीवर फैटी

PSRI अस्पताल में लिवर ट्रांसप्लांट और सर्जिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी के प्रमुख डॉ. मनोज गुप्ता ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, 'हां, क्लिनिकल रिसर्च इस दावे की पुष्टि करते हैं। घी, मक्खन, नारियल तेल और लार्ड में पाए जाने वाले संतृप्त वसा, लीवर में फैट के निर्माण में योगदान करने के लिए जाने जाते हैं, खासकर उन लोगों में जो गैर-अल्कोहल फैटी लिवर रोग (NAFLD) के जोखिम में हैं। हेपेटोलॉजी और द जर्नल ऑफ क्लिनिकल एंडोक्रिनोलॉजी एंड मेटाबॉलिज्म जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित अध्ययनों में पाया गया है कि संतृप्त वसा का अधिक सेवन लिवर ट्राइग्लिसराइड के स्तर को बढ़ा सकता है, इंसुलिन प्रतिरोध को खराब कर सकता है और लिवर में सूजन के मार्गों को ट्रिगर कर सकता है।'


सार्वजनिक स्वास्थ्य बौद्धिक डॉ. जगदीश हीरेमथ कहते हैं, 'घी और नारियल तेल जैसे पारंपरिक वसा कल्चरल रूप से महत्वपूर्ण हैं और कई भारतीय घरों में इनका सेवन संयमित रूप से किया जाता है। हालांकि इनका अत्यधिक और नियमित सेवन, विशेष रूप से खराब जीवनशैली और कैलोरी से भरपूर ​​आहार के संदर्भ में पाचन हेल्थ को खराब कर सकता है, जिसमें लिवर का कार्य भी शामिल है।' हालांकि, वे कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए इसका असर अलग-अलग होता है।

तेल के निकालने के तरीके पर डिपेंड करती है उसकी स्वास्थ्यवर्धकता

डॉ. मनोज गुप्ता के अनुसार, तेलों में पोषक तत्व प्रोफाइल और गर्म होने पर उनका व्यवहार इस बात पर निर्भर होता है कि उन्हें किस प्रकार निकाला गया है। 'सूरजमुखी, चावल की भूसी या कैनोला जैसे परिष्कृत बीजों के तेलों को अशुद्धियों को दूर करने और बिना टूटे उच्च खाना पकाने के तापमान को झेलने के लिए प्रोसेस किया जाता है। यह उन्हें डीप फ्राई करने के लिए सुरक्षित बनाता है। दूसरी ओर, कोल्ड-प्रेस्ड या अपरिष्कृत तेल, बिना गर्मी या रसायनों के यांत्रिक दबाव का उपयोग करके निकाले जाते हैं। डॉ. गुप्ता कहते हैं, 'वे एंटीऑक्सिडेंट, फाइटोस्टेरॉल और विटामिन ई को बनाए रखते हैं, जो हृदय और यकृत के स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होते हैं लेकिन वे गर्मी के प्रति संवेदनशील होते हैं और उन्हें कच्चा ही खाना चाहिए।

तेल बदलने से फैटी लीवर में भी होगा बदलाव

डॉ. फिलिप्स कहते है कि 'पकाने के लिए रिफाइंड और कच्चे उपभोग के लिए कोल्ड-प्रेस्ड तेल वैश्विक आहार दिशानिर्देशों के अनुरूप है।' तो क्या मोनोअनसैचुरेटेड और पॉलीअनसेचुरेटेड वसा वाले उच्च बीज तेलों के साथ संतृप्त वसा को बदलने से लीवर टेस्ट के परिणामों में सुधार हो सकता है? इस सवाल के जवाब में डॉ. हिरेमथ कहते हैं, 'हां, संतृप्त वसा को असंतृप्त वसा से जैसे कि सूरजमुखी, कुसुम, कैनोला या अलसी के तेल से बदलने से फैटी लीवर रोग वाले व्यक्तियों में लिपिड प्रोफाइल में सुधार और लीवर फैट को कम करने में अच्छे परिणाम मिले हैं।'

वहीं डॉ. मनोज गुप्ता बताते हैं कि फैटी लिवर रोग वाले रोगियों में, इस आहार परिवर्तन से लिवर एंजाइम के स्तर (ALT, AST) में मापनीय सुधार हुआ है। इमेजिंग से पता चलता है कि हेपेटिक फैट कम हुई है, और इंसुलिन संवेदनशीलता बेहतर हुई है। इसके साथ जब कोई नियमित व्यायाम और कम चीनी का सेवन करता है तो इसका जबरदस्त नतीजे देखने को मिलते है।

डिस्क्लेमर: यह लेख सिर्फ सामान्य जानकारी के लिए है। किसी भी तरह से किसी दवा या इलाज का विकल्प नहीं हो सकता। ज्यादा जानकारी के लिए हमेशा अपने डॉक्टर से संपर्क करें।

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