Aditya-L1: सूरज के कितना नजदीक जाएगा सूर्य यान, क्या है प्वाइंट L1? सीनियर वैज्ञानिक से जानें कई अहम सवालों के आसान जवाब

Aditya-L1 मिशन ISRO के पिछले मिशन से काफी अलग है, अब मिशन अलग है, तो उसमें आने वालीं चुनौतियां भी अलग होंगी और उसके नतीजे और निष्कर्ष भी कुछ हट कर होंगे... ऐसे ही कई सवाल हैं, जो हमारे और आपके मन में इस सूर्य यान और आदित्य-एल1 मिशन को लेकर उठ रहे हैं। इन सभी सवालों के जवाब जानने के लिए Moneycontrol Hindi ने खास बातचीत की विज्ञान प्रसार के वैज्ञानिक डॉ. टीवी वेंकटेश्वरन से, पढ़िए सवाल-जवाब का पूरा सिलसिला...

अपडेटेड Sep 01, 2023 पर 3:38 PM
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Aditya-L1: सीनियर वैज्ञानिक टीवी वेंकटेश्वरन से जानें कई अहम सवालों के आसान जवाब

चांद पर चंद्रयान-3 (Chandrayaan-3) की सॉफ्ट लैंडिंग (Soft Landing) के साथ ही भारत ने एक नया इतिहास रच दिया है और अब अंतरिक्ष में एक और नई इबारत लिखने की तैयारी है। इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (ISRO) अपने एक और नए मिशन Aditya-L1 को लॉन्च करने के लिए पूरी तरह से तैयार है। इसे सूर्य मिशन या सोलर मिशन (Solar Mission) भी कहा जाता है। आदित्य एल-1 को 2 सितंबर को सुबह 11.50 बजे आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्पेस पोर्ट से लॉन्च किया जाना है।

वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि भारत के पहले सोलर मिशन आदित्य-L1 से मिलने वाले डेटा का विश्लेषण करने के बाद सूरज के अतीत, वर्तमान और भविष्य के बारे में नई जानकारी हासिल।

जाहिर ये मिशन ISRO के पिछले मिशन से काफी अलग है, अब मिशन अलग है, तो उसमें आने वालीं चुनौतियां भी अलग होंगी और उसके नतीजे और निष्कर्ष भी कुछ हट कर होंगे... ऐसे ही कई सवाल हैं, जो हमारे और आपके मन में इस सूर्य यान और आदित्य-एल1 मिशन को लेकर उठ रहे हैं। इन सभी सवालों के जवाब जानने के लिए Moneycontrol Hindi ने खास बातचीत की विज्ञान प्रसार के वैज्ञानिक डॉ. टीवी वेंकटेश्वरन से, पढ़िए सवाल-जवाब का पूरा सिलसिला...


सवाल- लोगों के मन में अब भी कई तरह के सवाल हैं कि आदित्य-एल1 एक सूर्य मिशन है, तो क्या ये सूरज पर जाएगा, या कहीं और जाएगा, कैसे काम करेगा?

जवाब- आप एक उदाहर के तौर पर मान लीजिए कि धरती से सूरज की दूरी 15 करोड़ किलोमीटर है, तो आदित्या-एल1 जाएगा सिर्फ साढ़े 10 लाख किलोमीटर की दूरी पर, मतलब कि ये सूरज पर नहीं जाएगा। सबसे अहम सवाल है कि इसे क्यों भेजा जा रहा है, तो सूरज में कुछ ऐसी घटनाएं होती हैं, जिसका हम धरती से अध्ययन नहीं कर सकते हैं। क्यों हमारी धरती के चारों तरफ एटमॉस्फेयर की एक लेयर है, जो सूरज से निकलने वाले UV Ray, X-ray, Gamma ray को फिल्टर कर के आने देती है। इसलिए सूरज का गहराई से अध्ययन करने के लिए ये सैटेलाइट भेजा जा रहा है।

अब मान लीजिए कि हम कोई सैटेलाइट सूरज का अध्ययन करने के लिए अंतरिक्ष में भेजें और वो धरती के चारों तरफ घूमती रहे, तो ऐसे में होगा ये कि कुछ समय के लिए ही वो सैटेलाइट सूरज के सामने होगी। इसलिए हमें एक ऐसी जगह की जरूरत है, जहां से हर समय सूरज दिखता रहे है। इसके लिए हमने वो प्वाइंट चुना-L1, जहां से सूरज हर समय दिखता है और निरंतर उसकी निगरानी की जा सकती है। इस सैटेलाइट को इसी L1 प्वाइंट में स्थापित किया जाएगा।

सवाल- धरती और सूरज के बीच में ये L1 प्वाइंट ही क्यों चुना गया, इसमें ऐसा क्या खास है?

जवाब: देखिए धरती का अपना गुरुत्वाकर्षण बल है और सूरज का अपना गुरुत्वाकर्षण बल है। ऐसे में अगर किसी भी प्वाइंट पर आदित्य स्पेस क्राफ्ट को रखा जाएगा, तो कहीं धरती का गुरुत्वाकर्षण ज्यादा होगा, तो वो स्पेस क्राफ्ट को अपनी तरफ खींचेगा। इसी तरह कहीं सूरज का गुरुत्वाकर्षण बल ज्यादा होगा, तो सैटेलाइट को अपनी तरफ खींचेगा, दोनों ही स्थिति में मिशन फेल हो जाएगा। इसलिए ये L1 प्वाइंट वो है, जहां सूरज और धरती दोनों का ही गुरुत्वाकर्षण बल बराबर है, और वहां इसे एक स्टैटिक पॉजिशन में रखा जा सकता है।

अब जब धरती सूरज की परिक्रमा करेगी या उसके चारों तरफ घूमेगी, तो इसके साथ ये आदित्या स्पेस क्राफ्ट भी अपने L1 प्वाइंट पर घूमेगा, जिससे सूरज लगातार उसकी आंखों के सामने होगा और वो इसका अध्ययन कर पाएगा।

सवाल- अब यहां सबसे अहम रोल हमारे वैज्ञानिकों का है, तो इस स्पेसक्राफ्ट को इस प्वाइंट पहुंचाना या वहां स्थापित करना कितना मुश्किल होगा और क्या-क्या चुनौतियां सामने आएंगी?

जवाब- ये बहुत बड़ी चुनौती होगी। जैसे चांद पर जाने के लिए, उसके ऑर्बिट में आने के लिए एक निरंतर स्पीड में सैटेलाइट को उसके चारों तरफ घुमाया। क्योंकि इसमें स्पीड ज्यादा हो गई, तो स्पेस क्राफ्ट ऑर्बिट से बाहर चला जाएगा, कम हुई, तो वहीं पर गिर जाएगा। ठीक इसी तरह इसे भी एक निरंतर स्पीड पर मैनुवर कर के पृथ्वी की ऑर्बिट से बाहर किया जाएगा और उस खाली प्लाइंट पर लाया जाएगा।

अब इसमें अगर रफ्तार ज्यादा हो जाती है, तो सैटेलाइट सीधा सूरज की तरफ चला जाएगा और नष्ट हो जाएगा और स्पीड कम हुई, तो वापस पृथ्वी की कक्षा में आ जाएगा। लॉन्चिंग के बाद भी इसे वहां तक पहुंचने में 100 से 120 दिन का समय लगेगा।

सवाल- Aditya-L1 मिशन का मकसद क्या होगा और वो खोज कितनी बड़ी होगी?

जवाब- देखिए खोज वो है, जिसके बारे में हमें नहीं पता। अगर पहले से ही मालूम होगा, तो वो खोज कैसी। मैं पहाड़ पर चढ़ रहा हूं, वो मेरी खोज नहीं है, मैं समुद्र की गहराई में जा रहा हूं, वो भी खोज नहीं है। इसलिए हम पहले से ही कुछ भी दावा नहीं कर सकते हैं।

लेकिन इसमें एक बात ऐसे समझी जा सकती है कि मान लीजिए हमें ठंड लग रही है, तो हम आग के करीब रहेंगे, तो ठंड कम लगेगी, जैसे-जैसे दूर होते, जाएंगे वैसे ही आग की गर्माहट भी कम हो जाएगी।

अब अगर सूरज की बात करें, सूरज की सतह पर तापमान 5600 डिग्री है। अब जैसे पृथ्वी की चारों ओर एटमॉस्फेयर या एक लेयर है, ठीक उसी तरह सूरज के चारों ओर भी एक एटमॉस्फेयर लेयर है, जिसका नाम है कोरोना। अब इस कोरोना में तापमान है 10 लाख डिग्री। तो ये कैसे है। सूरज, जो हीट और एनर्जी पैदा कर रहा है, वहां तापमान कम और उसके चारों तरफ जो परत है, वहां तापमान उससे कई गुना ज्यादा। ये खोज का विषय है।

इसके अलावा आज कर अपने पढ़ा होगा कि अंतरिंक्ष में तूफा (Space Storm) आया है। इसे विज्ञान की भाषा में जियोमैग्नेटिक स्टॉर्म भी कहते हैं। ये सब सूरज के ऊपर मैग्नेटिक फील्ड में होने वाले बदलाव का नतीजा है। इसका असर धरती के चारों तरफ जो मैग्नेटिक फील्ड है, उस पर भी पड़ता है।

इस मिशन के जरिए हम ये पता लगाने की कोशिश करेंगे कि ये कैसे हो रहा है और क्या हम इसका पहले से ही पता लगा सकते हैं। इसे ही स्पेस वेदर कहा जाता है। अंतरिक्ष के मौसम में होने वाले बदलाव का भी आदित्य-एल1 की मदद से पता लगाने की कोशिश की जाएगी। स्पेस वेदर आज कल बहुत अहम हो गया, क्योंकि इस तरह के तूफान का अंतरिक्ष में घूम रहीं सैटेलाइट पर भी काफी असर पड़ता है, तो अगर में इसका पहले पता लगा पाएंगे, तो उस स्थिति में हम अपने सैटेलाइट को बंद कर पाएंगे, ताकि उसके डेटा या सिस्टम को कोई नुकसान न पहुंचे।

सवाल- कितने दिन तक ये आदित्या सूर्य यान इस L1 प्वाइंट पर रहेगा?

जवाब- कुछ साल वो काम करेगा। लेकिन कितने साल काम करेगा, ये उसके फ्यूल पर निर्भर करता है। L1 प्वाइंट में स्थापित किए जाने के बाद उसमें कितना फ्यूल होगा, ये देखने के बाद ही कुछ साफ हो पाएगा।

यहां भी एक दिक्कत ये है कि स्पेस क्राफ्ट को सूरज के चारों और एक ही स्पीड और दूर पर घूमना होगा, तो उसके लिए फ्यूल की जरूरत नहीं है, लेकिन सूरज एक परफेक्ट ऑब्जेक्ट नहीं है। सूरज के किसी हिस्से पर गुरुत्वाकर्षण बल ज्यादा होगा, तो कहीं कम होगा, तब सैटेलाइट को अपनी स्पीड और दूरी दोनों उसी हिसाब से बना कर रखनी होगी। तब स्पेसक्राफ्ट का फ्यूल इस काम में लगेगा।

मार्स ऑर्बिटर मिशन जब भेजा गया था, तो हमारा अंदाजा था कि ये एक साल काम करेगा, लेकिन आज 10 साल हो गए हैं और मंगलयान अब भी काम कर रहा है। सूर्य यान के बारे में हम मान कर चल रहे हैं कि 3-4 साल काम तो करेगा ही।

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