Aditya L1 Mission: अंतरिक्ष में जिस तूफान ने तबाह की मस्क की सैटेलाइट, उसी जियोमैग्नेटिक स्टॉर्म का अध्ययन करेगा आदित्या-एल1
Aditya L1 Mission: सूर्य पर होने वाले ये विशाल विस्फोट भारी मात्रा में एनर्जी पैदा करते हैंस जो साढ़े 10 लाख km दूर पृथ्वी पर रेडियो ट्रांसमिशन और GPS कॉर्डिनेट्स को प्रभावित कर सकते हैं। ये बड़े पैमाने पर इजेक्शन हैं, जिनका अध्ययन भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के नए मिशन आदित्य-एल1 के प्राइमरी पेलोड की तरफ से किया जाना है। विजिबल एमिशन लाइन कोरोनाग्राफ (VELC) नाम के पेलोड को बेंगलुरु में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स (IIA) ने डेवलप किया था
Aditya L1 Mission: जियोमैग्नेटिक स्टॉर्म का अध्ययन करेगा आदित्या-एल1
Aditya L1 Mission: 2022 की शुरुआत में, सूरज से निकलने वाले कोरोनल मास इजेक्शन (Coronal Mass Ejection) के कारण पैदा हुए जियोमैग्नेटिक तूफान (Geomagnetic Storm) ने 49 स्पेसएक्स स्टारलिंक सैटेलाइट (SpaceX Starlink satellites) में से 40 को नष्ट कर दिया था। सूर्य पर होने वाले ये विशाल विस्फोट भारी मात्रा में एनर्जी पैदा करते हैंस जो साढ़े 10 लाख km दूर पृथ्वी पर रेडियो ट्रांसमिशन और GPS कॉर्डिनेट्स को प्रभावित कर सकते हैं। ये बड़े पैमाने पर इजेक्शन हैं, जिनका अध्ययन भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के नए मिशन आदित्य-एल1 के प्राइमरी पेलोड की तरफ से किया जाना है। विजिबल एमिशन लाइन कोरोनाग्राफ (VELC) नाम के पेलोड को बेंगलुरु में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स (IIA) ने डेवलप किया था।
IIA की डायरेक्टर अन्नपूर्णी सुब्रमण्यम ने Moneycontrol को बताया, "CME के दौरान निकलने वाले सोलर मास की तीव्रता के आधार पर, अंतरिक्ष का मौसम प्रभावित होता है।"
उन्होंने कहा, "सवाल ये है कि सूर्य अंतरिक्ष में चीजों को कितना प्रभावित करता है, क्योंकि हम GPS, मोबाइल कनेक्टिविटी इत्यादि जैसी स्पेस टेक्नोलॉजी पर ज्यादा से ज्यादा निर्भर हैं।"
Aditya-L1 को सात पेलोड के साथ भेजा जाएगा, जिसमें IIA का पेलोड भी शामिल है। इसे 2 सितंबर को PSLV-C57 रॉकेट के जरिए श्रीहरिकोटा से लॉन्च किया जाना है। ये मिशन चंद्रमा के पास 24 अगस्त को दक्षिणी ध्रुव पर ISRO की चंद्रयान-3 की ऐतिहासिक लैंडिंग के ठीक बाद आया है।
सोलर मिशन की जरूरत
सुब्रमण्यम ने कहा, "आपने स्टारलिंक सैटेलाइट को बाधित होते हुए देखा होगा... ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि सूरज अब सक्रिय हो रहा है। इसलिए ऐसी चीजें हो सकती हैं और ये कोई भविष्य की संभावना नहीं है।"
सुब्रमण्यम, जिन्होंने 90 के दशक में एक रिसर्च फेलो के रूप में IIA में अपना करियर शुरू किया था। सूर्य के "सक्रिय" होने का मतलब सोलर साइकिल से है। सूरज का 11 साल का साइकिल है, जिसके दौरान ये बहुत ज्यादा सक्रिय होता है और फिर एक निष्क्रिय हो जाता है। अनुमान है कि अब ये 2025 के आसपास चरम पर होगा।
वैश्विक स्तर पर वैज्ञानिक और सरकारें इस पर नजर रख रही हैं, क्योंकि पीक सोलर एक्टिविटी पावर ग्रिड और कम्युनिकेशन सिस्टम को प्रभावित कर सकती है।
दूसरे सोरल मिशनों में नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन का पार्कर सोलर प्रोब शामिल है, जिसने 2021 में सूरज के कोरोना के जरिए उड़ान भरी और पार्टिकल और मैग्नेटिक फील्ड का सैंपल लिया। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी का सोलर ऑर्बिटर भी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगा रहा है।
VELC क्या करेगा?
सूरज के एटमॉस्फेयर के तीन भाग हैं - फोटोस्फेयर, जो सतह की परत है। दूसरा है सोलर एटमॉस्फेयर, जिसमें क्रोमोस्फेयर और कोरोना शामिल हैं। VELC सूरज के एटमॉस्फेयर के सबसे बाहरी हिस्से कोरोना का अध्ययन करेगा।
सुब्रमण्यम ने कहा, "अगर आप किसी भी सामान्य दिन में सूरज को देखते हैं, तो आप कोरोना नहीं देख सकते। आप केवल पूर्ण सूर्य ग्रहण के दौरान ही कोरोना देख सकते हैं।"
यहां वह जगह है, जहां एक कोरोनोग्राफ काम आएगा: एक कोरोनोग्राफ 40 ऑप्टिकल एलिमेंट की मदद से उपकरण के भीतर पूर्ण सूर्य ग्रहण को फिर से बना सकता है।
उन्होंने कहा, "आपको सूरज की डिस्क को ब्लॉक करना होगा। हालांकि, आप ऐसा तब तक नहीं कर सकते जब तक कि चंद्रमा बीच में न आ जाए। इसलिए आपको पूर्ण सूर्य ग्रहण बनाने के लिए उपकरण के अंदर आर्टिफिशियल तरीक से एक ब्लॉक बनाना होगा।"
पेलोड तब उस रफ्तार का पता लगाएगा, जिस पर सूर्य से बड़े पैमाने पर उत्सर्जन होता है। डिवाइस के भीतर एक पूर्ण सूर्य ग्रहण को फिर से बनाने के अलावा, जब ऑप्टिकल डिवाइस सूर्य पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो उससे पैदा होने वाली गर्मी को मैनेज करने की भी एक चुनौती होती है।
सुब्रमण्यम ने कहा, "ये एक बहुत ही जटिल उपकरण है, इसे डिजाइन करना, विकसित करना और इंटिग्रेट करना बहुत मुश्किल है।"
पांच दूसरे पेलोड फोटोस्फेयर और क्रोमोस्फेयर, एक्स-रे फ्लेयर्स, सौर हवाओं और इंटरप्लेनेटरी मैग्नेटिक फील्ड का अध्ययन करेंगे।
उड़ान भरने के बाद, आदित्य-एल1 को लैग्रेंज प्वाइंट 1 (L1) तक पहुंचने में 3-4 महीने लगेंगे, जो पृथ्वी से साढ़े 10 लाख km दूर है। ये अंतरिक्ष में वो प्वाइंट है, जहां अंतरिक्ष यान पृथ्वी और सूर्य के बीच बराबर गुरुत्वाकर्षण के कारण कम से कम ईंधन खपत के साथ एक निश्चित स्थिति में रह सकता है।
सुब्रमण्यम ने कहा, "ये डिवाइस L1 तक पहुंचने और वहां ऑर्बिट में स्थिर होने के बाद ही चालू किया जाएगा। और फिर आपको कम्युनिकेशन लिंक स्थापित करना होगा। उतनी दूरी से डाउनलिंक और अपलिंक स्थापित करने कोई मजाक नहीं है।"
इसके बाद IIA और ISRO यह जांचने के लिए परीक्षण शुरू करेंगे कि सब कुछ ठीक काम कर रहा है या नहीं। उन्होंने कहा, "इसमें चार से छह महीने लगेंगे।" उसके बाद, डेटा क्लेक्शन शुरू हो जाएगा।