सरकार को चीजों को देखने का अपना नजरियां होता है। कई बार वह आदमी के चश्मे से चीजों को नहीं देखती है। महंगाई पर वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) के बयान से तो ऐसा ही लगता है। इधर, फ्यूल, खाने के तेल, फल-सब्जियों की कीमतें आसमान छू रही हैं। लेकिन फाइनेंस मिनिस्टर का कहना है कि इंडिया में इनफ्लेशन (Inflation) ज्यादा नहीं है।
निर्मला सीतारमण ने वाशिंगटन डीसी के एक प्रोग्राम में कहा, " हमारे सामाने ग्लोबल चैलेंजेज हैं। इस वजह से क्रूड के प्राइसेज हों या कमोडिटीज के प्राइसेज, ये आसमान छू रहे हैं। इसका असर सभी इकोनॉमीज पर पड़ेगा। हालांकि, इसके बावजूद इंडिया में इनफ्लेशन 6.9 फीसदी है। हमारा टारगेट 4 फीसदी है। इसमें 2 फीसदी प्लस या माइनस की गुंजाइश है। इस तरह हम 6 फीसदी तक जा सकते हैं। हमने 6 फीसदी का लेवल पार कर लिया है, लेकिन हम इससे बहुत आगे नहीं गए हैं।"
नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस (NSO) के डेटा के मुतबिक, रिटेल इनफ्लेशन मार्च में 6.95 फीसदी पर पहुंच गया। यह 17 महीने में सबसे ज्यादा रिटेल इनफ्लेशन है। फरवरी में यह 6.07 फीसदी था। पिछले तीन महीने से रिटेल इनफ्लेशन RBI के 6 फीसदी के टारगेट से ज्यादा बना हुआ है। हालांकि, फाइनेंशियल ईयर 2021-22 में एवरेज रिटेल इनफ्लेशन 5.5 फीसदी रहा है।
गांवों में महंगाई लोगों को ज्यादा परेशान कर रही है। ग्रामीण इलाकों में फूड इनफ्लेशन मार्च में एक साल पहले के मुकाबले दोगुना हो गया है। पिछले साल मार्च में यह 3.94 फीसदी था, जो इस साल मार्च में 8.04 फीसदी पर पहुंच गया। कमोडिटी के प्राइसेज कई साल के हाई पर पहुंच गए हैं। इसकी वजह यूक्रेन क्राइसिस है। रूस और यूक्रेन की लड़ाई की वजह से कमोडिटीज की सप्लाई बाधित हुई है। इससे कमोडिटी की कीमतें बढ़ गई हैं।
इंडिया में होलसेल प्राइस इफ्लेशन भी बढ़कर मार्च में 14.55 फीसदी की चार महीने की ऊंचाई पर पहुंच गया। ज्यादा होलसेल इनफ्लेशन को रिटेल इनफ्लेशन बढ़ने का संकेत माना जाता है। इसकी वजह यह है कि प्रोड्यूसर्स कॉस्ट में वृद्धि का बोझ ग्राहकों पर डाल देते हैं। इसलिए आने वाले समय में भी हमें महंगाई से राहत मिलने वाली नहीं है। उधर, क्रूड प्राइस ज्यादा होने से पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भी कमी की उम्मीद नहीं की जा सकती।