अमेरिका में बॉन्ड यील्ड 1.96% पर पहुंची, जानिए आपके लिए क्या हैं इसके मायने

बॉन्ड को फिक्स्ड रिटर्न एसेट कहा जाता है। इसका मतलब यह है कि इसमें निवेश पर मिलने वाला रिटर्न पहले से तय होता है। शेयरों की तरह बॉन्ड की खरीद-बिक्री चलती रहती है। डिमांड ज्यादा होने पर बॉन्ड की कीमत घट जाती है, जबकि डिमांड कम होने पर उसकी कीमत गिर जाती है

अपडेटेड Feb 09, 2022 पर 1:40 PM
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अमेरिका में बॉन्ड यील्ड बढ़ने का असर भारत सहित दुनियाभर की इकोनॉमीज पर पड़ता है। इंडिया पर तो पहला असर यह पड़ेगा कि स्टॉक मार्केट में विदेशी फंडों की बिकवाली बढ़ सकती है।

अमेरिका में बॉन्ड यील्ड (Bond Yield) लगातार बढ़ रही है। 10 साल के यूएस ट्रेजरी (US Treasury) की यील्ड 1.96 फीसदी पहुंच गई है। यह करीब 3 साल में सबसे ज्यादा है। अमेरिका में बॉन्ड को यूएस ट्रेजरी कहा जाता है। अमेरिका में इनफ्लेशन के आंकड़े बुधवार को आने वाले हैं। इंडिया में इसके बारे में गुरुवार को पता चलेगा। इनफ्लेशन डेटा आने से पहले वहां बॉन्ड यील्ड में वृद्धि का रुझान है।

अमेरिका में 30 साल के ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड भी करीब 4 बेसिस अंक बढ़कर 2.25 फीसदी पहुंच गई है। दरअसल, अभी दुनियाभर में बॉन्ड यील्ड में तेजी दिख रही है। टीडी सिक्योरिटीज की हेड (ग्लोबल रेट्स स्ट्रेटेजी) प्रिया मिश्रा ने कहा, "दुनियाभर में यील्ड बढ़ रही है। इसकी वजह है कि केंद्रीय बैंक मॉनेटरी पॉलिसी को लेकर अपना स्टैंस बदल रहे हैं। इससे ब्याज दरें ऊपर जा रही हैं।" उन्होंने कहा, "... असल में बाजार अभी दो तरह की सख्ती से निपट रहा है। इसमें बैलेंस शीट और रेट हाइक शामिल हैं।"

अमेरिका में लेबर डिपार्टमेंट जनवरी के इनफ्लेशन के आंकड़े जारी करने वाला है। इस डेटा से 0.4 फीसदी प्राइस राइज का संकेत मिल सकता है। यह साल दर साल आधार पर 7.2 फीसदी का उछाल होगा। यह अमेरिका में इनफ्लेशन का 40 साल का उच्चतम स्तर है। इससे पहले आए जॉब डेटा ने ग्रोथ उम्मीद के मुकाबले मजबूत रहने का संकेत दिया था।


जॉब डेटा से यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ब्याज दरें बढ़ाने में आक्रामक रुख अपना सकता है। बैंक ऑफ अमेरिका ने सोमवार को कहा था कि फेडरल रिजर्व इस साल 7 बार ब्याज दरें बढ़ा सकता है। हर बार वह इंट्रेस्टरेट में एक चौथाई फीसदी की बढ़ोतरी कर सकता है।

भारत के लिए क्या हैं इसके मायने?

अमेरिका में बॉन्ड यील्ड बढ़ने का असर भारत सहित दुनियाभर की इकोनॉमीज पर पड़ता है। इंडिया पर तो पहला असर यह पड़ेगा कि स्टॉक मार्केट में विदेशी फंडों की बिकवाली बढ़ सकती है। हालांकि, यहां के स्टॉक मार्केट्स में पहले से ही विदेशी फंड बिकवाली कर रहे हैं। हाल में आई मार्केट में गिरावट का यह एक बड़ा कारण रहा है। दूसरे उभरते बाजारों में भी विदेशी फंड बिकवाली कर सकते हैं। दरअसल, विदेशी फंडों को अमेरिकी बॉन्ड में इन्वेस्टमेंट से अच्छा रिटर्न कमाने का मौका दिखता है।

बॉन्ड यील्ड का मतलब क्या है?

बॉन्ड को फिक्स्ड रिटर्न एसेट कहा जाता है। इसका मतलब यह है कि इसमें निवेश पर मिलने वाला रिटर्न पहले से तय होता है। शेयरों की तरह बॉन्ड की खरीद-बिक्री चलती रहती है। डिमांड ज्यादा होने पर बॉन्ड की कीमत घट जाती है, जबकि डिमांड कम होने पर उसकी कीमत गिर जाती है। कीमत घटने और बढ़ने से रिटर्न पर पड़ने वाला असर यील्ड के रूप में रिफ्लेक्ट होता है। दूसरी बात, बॉन्ड की कीमत और यील्ड में विपरीत संबंध होता है। बॉन्ड की कीमत घटने पर उसकी यील्ड बढ़ जाती है, जबकि उसकी कीमत बढ़ने पर यील्ड घट जाती है। इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं।

मान लीजिए आपने 10 साल के मैच्योरिटी वाले एक बॉन्ड में निवेश किया है, जिसकी कीमत 100 रुपये है। इस बॉन्ड पर इंट्रेस्ट रेट 10 फीसदी है। अगर बाजार में डिमांड घटने से बॉन्ड की कीमत गिरकर 90 रुपये रह जाती है तो भी आपको इस पर 10 फीसदी (10 रुपये) इंट्रेस्ट मिलेगा। इस तरह इस बॉन्ड से मिलने वाला रिटर्न बढ़ जाएगा। इसे ही यील्ड कहा जाता है। ठीक इसके उलट बॉन्ड की कीमत अगर बढ़कर 110 रुपये हो जाती है तो भी आपको इस पर 10 फीसदी (10 रुपये) इंट्रेस्ट मिलेगा। इस तरह अब आपको 110 रुपये के निवेश पर 10 रुपये का इंट्रेस्ट मिल रहा है। इस तरह आपका रिटर्न (यील्ड) 10 फीसदी से कम हो जाता है।

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