भुवन भास्कर
भुवन भास्कर
महंगाई की बात सुनते ही सबसे पहले ध्यान आता है मध्य वर्ग का, जिसके किचेन का बजट दाल-चावल और सब्जियों की बढ़ती कीमतों के कारण बिगड़ने लगता है। लेकिन यह महंगाई का सबसे सरल स्वरूप है। इसलिए कि किचेन के बजट को खाने-पीने की आदतों को बदलकर नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन महंगाई दर का जटिल स्वरूप भी है। यह स्वरूप कुछ-कुछ डायबिटीज की बीमारी की तरह है, जो अर्थव्यवस्था के अनेक अंगों पर इस तरह असर डालता है कि अर्थव्यवस्था अंदर ही अंदर खोखली और कमजोर होने लगती है। इसीलिए दुनिया का कोई भी केंद्रीय बैंक महंगाई दर को बहुत समय तक ऊपरी स्तरों पर बने रहने देने का जोखिम नहीं ले सकता।
दरअसल देशों में केंद्रीय बैंक की सबसे प्रमुख भूमिका ही महंगाई दर को नियंत्रित रखना है। लेकिन महंगाई दर को नियंत्रित रखने के जो भी टूल्स केंद्रीय बैंक के पास हैं, उनका ग्रोथ से उलटा संबंध है। यानी महंगाई दर को नियंत्रित रखने के लिए सरकार और केंद्रीय बैंक को ग्रोथ की कुर्बानी देनी ही पड़ती है। इसलिए महंगाई दर को एक सीमा तक बर्दाश्त किया जाता है ताकि ग्रोथ पर असर न पड़े। इस सीमा को ही केंद्रीय बैंक का कंफर्ट लेवल कहते हैं।
भारत के संदर्भ में बात करें तो रिजर्व बैंक (RBI) ने खुदरा महंगाई दर की अपनी बर्दाश्त सीमा 6% तय की थी, जो इस पिछले 12 महीनों में 6 बार टूट चुकी है। मार्च 2022 में थोक महंगाई दर 14.5% का स्तर पार कर गई जो कि 2012 के बाद से उच्चतम स्तर है और इसी महीने में खुदरा महंगाई दर भी अक्टूबर 2020 के बाद के उच्चतम स्तर 6.95% पर पहुंच गई।
भारत में महंगाई दर में आए इस तेज उछाल के पीछ ठोस घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कारण थे। घरेलू मोर्चे पर जहां कच्चे तेल के भाव में आई वृद्धि ने खेल बिगाड़ा, वहीं अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर कमोडिटी कीमतों में बढ़ोतरी के रुझान ने भी इस स्थिति में अपनी भूमिका निभाई। कच्चा तेल फरवरी में 55.17% और मार्च में 83.56% महंगा हुआ। वहीं रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण पूरी दुनिया की आपूर्ति शृंखला प्रभावित हुई, जिसने पूरी दुनिया में महंगाई बढ़ाने का काम किया।
इन सबका नतीजा यह हुआ कि RBI ने अगस्त 2018 के बाद पहली बार पहले 4 मई को और फिर 8 जून को क्रमशः रेपो रेट में 40 और 50 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी की। रेपो रेट में वृद्धि अपेक्षित ही थी, लेकिन जिस गति से RBI ने यह वृद्धि की, वह आश्चर्यजनक थी। रेपो रेट वह ब्याज दर होती है, जिस पर रिजर्व बैंक अन्य बैंकों को अल्पकालिक ऋण देता है।
इसका सीधा मतलब यह होता है कि रिजर्व बैंक ने अन्य बैंकों के लिए फंड जुटाना महंगा कर दिया है। जाहिर है कि इसके बाद अन्य बैंक भी अपनी कर्ज दरों में बढ़ोतरी करते हैं और इस तरह चाहे वह उपभोक्ताओं को घर, कार इत्यादि के लिए दिया जाने वाला कर्ज हो या फिर, उद्योगों को उनकी विस्तार योजनाओं और उत्पादन बढ़ाने के लिए मिलने वाला ऋण, सब महंगे हो जाएंगे।
उपभोक्ताओं के लिहाज से बात की जाए तो रेपो रेट में हुई 90 बेसिस प्वाइंट (100 बेसिस प्वाइंट = 1%) की बढ़ोतरी होम लोन की ब्याज दरों में करीब 1% वृद्धि करती है। यदि यह दर 7% से बढ़कर 8% होती है, तो 15 साल की अवधि के लिए 50 लाख रुपये के होम लोन पर मासिक किस्त में 2841 रुपये की बढ़ोतरी हो जाएगी यदि उपभोक्ता अवधि में बढ़ोतरी नहीं चाहता।
अब किसी उपभोक्ता के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि ब्याज दरों में मई से शुरू हुई यह बढ़ोतरी कब तक चलेगी और जब ब्याज दरों में बढ़ोतरी का यह दौर खत्म होगा, उसके बाद उस पर उनके ऋण की मासिक किस्त का अतिरिक्त बोझ कितना बढ़ेगा। यह समझने के लिए कुछ विशेषज्ञों और संस्थाओं के अनुमानों पर गौर करना प्रासंगिक होगा।
RBI के मौद्रिक नीति के प्रभारी डिप्टी गवर्नर माइकल पात्रा के मुताबिक खुदरा महंगाई दर अगली 3 तिमाहियों तक, यानी इस पूरे वित्त वर्ष में 6% से ऊपर रह सकती है। इसके अलावा 26 मई से 1 जून के बीच किए गए रॉयटर्स के एक सर्वेक्षण में अर्थशास्त्रियों ने यह राय जताई कि RBI की मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की अगली चार बैठकों में लगभग 100 बीपीएस की बढ़ोतरी होगी और अगले साल की शुरुआत तक रेपो रेट की बढ़ोतरी का यह दौर खत्म हो सकता है। हालांकि इस सर्वे के अगले ही हफ्ते RBI ने एक झटके में 50 बीपीएस की बढ़ोतरी कर रेपो रेट को 4.9% पर पहुंचा दिया।
MPC की बैठकों का जो विवरण सामने आया है, उससे कई अर्थशास्त्रियों का यह अनुमान है कि अपने चरम पर पहुंचने से पहले बैंक की ब्याज दरों में में अभी 150 बीपीएस यानी 1.5% की बढ़ोतरी और हो सकती है। यानी उपभोक्ताओं के लिए होम लोन की दरें 9.5-10% तक जा सकती हैं। इसका सीधा मतलब है कि एक आम उपभोक्ता के लिए अगले साल तक 50 लाख रुपये के लोन पर हर महीने 5,000 रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।
ये तो हुई उपभोक्ताओं की बात। लकिन यदि यहां से रेपो रेट 110-125 बीपीएस और बढ़कर 6-6.25% पहुंच जाता है, तो उद्योगों और देश के औद्योगिक विकास पर क्या असर होगा? उल्लेखनीय है कि भारतीय अर्थव्यवस्था महामारी के असर से निकल तो गई है, लेकिन अभी पूरी तरह पटरी पर नहीं आ सकी है। ऐसे वक्त में जब अर्थव्यवस्था को रिजर्व बैंक से मदद की उम्मीद थी, दरों में बढ़ोतरी का सिलसिला शुरू हो गया है।
अब RBI के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि दरों में वृद्धि उस सीमा को पार न करे जिससे धीरे-धीरे पटरी पर आती अर्थव्यवस्था एक बार फिर बेपटरी हो जाए। RBI द्वारा रेपो दरों में जो बदलाव की जाती है, जमीन पर उसका असर दिखने में 2-3 तिमाहियों का असर दिखता है। यानी यदि RBI ने दरें ज्यादा बढ़ा दीं, तो महंगाई तो नियंत्रण में आ जाएगी, लेकिन अर्थव्यवस्था को गहरा धक्का लग सकता है और जब तक नीति निर्माताओं को यह बात समझ में आएगी, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।
अगले आम चुनाव अब दूर नहीं हैं। मोदी सरकार अगले डेढ़ सालों में 10 लाख युवाओं को रोजगार देने की महत्वाकांक्षी घोषणा कर चुकी है। ऐसे में सरकार किसी भी कीमत पर ग्रोथ को पटरी से उतारने का जोखिम नहीं ले सकती। इसलिए इतना तो तय है कि RBI दरों की बढ़ोतरी में कदम फूंक-फूंक कर रखेगा। लेकिन इस दोधारी तलवार का दूसरा पहलू यह है कि यदि महंगाई कम न हुई, तो वह भी मई 2024 में मोदी के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है।
कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है सरकार और RBI एक मुश्किल संतुलन साधने की कोशिश कर रहे हैं और उनकी कोशिश यही होगी कि ब्याज दरों में छोटी अवधि के भीतर तेजी से वृद्धि कर जल्दी से जल्दी महंगाई को काबू करने की कोशिश की जाए। ताकि ग्रोथ को एक बार फिर तेज करने के लिए सरकार के पास कम से कम एक साल का समय हो।
(लेखक कृषि मामलों के जानकार हैं)
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