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मध्य भारत में मानसून के लड़खड़ाने से पिछड़ी खरीफ की बुवाई

जून के आखिरी हफ्ते में हुई अच्छी बारिश से खरीफ की बुवाई के रकबे में दर्ज की गई भारी कमी की बहुत हद तक भरपाई हुई

Bhuwan Bhaskarअपडेटेड Jul 04, 2022 पर 12:50 PM
मध्य भारत में मानसून के लड़खड़ाने से पिछड़ी खरीफ की बुवाई
मानसून के ताजा आंकड़े बता रहे हैं कि यह औसत से कुछ कम रहा है, लेकिन अच्छी बात यह है कि पिछले 10 दिनों में पूरे देश में इसमें बहुत अच्छी प्रगति दिखी है और इसलिए खरीफ की बुवाई में 10 दिनों पहले तक जो कमी दिख रही थी, वह भी पूरी होने लगी है

भुवन भास्कर 

भारत में मानसून का सबसे सीधा संबंध किसी से है तो वह है कृषि और क्योंकि 2.7 लाख करोड़ रुपये की कृषि अर्थव्यवस्था से पूरी ग्रामीण मांग शृंखला प्रभावित होती है, इसलिए यहां किसानों से लेकर उद्योग तक, सब मौसम विभाग के अनुमानों का बेसब्री से इंतजार करते हैं। हर एक बारिश के साथ कमोडिटी वायदा बाजार में भाव उतरते-चढ़ते हैं और मौसम विभाग के हर अनुमान पर शेयर बाजार कलाबाजियां खाता है।

बहरहाल, अब क्योंकि जुलाई का पहला हफ्ता शुरू हो चुका है, तो अनुमानों की जगह अब मानसून की प्रगति रिपोर्ट ने ले ली है। यह रिपोर्ट बता रही है कि मानसून में जून की शुरुआत में जो सुस्ती दिख रही थी, वह अब धीरे-धीरे दूर होने लगी है और इसके साथ खरीफ की बुवाई में भी गति आने लगी है। पिछले हफ्ते शुक्रवार को मौसम विभाग ने जो ताजा मानसून अपडेट जारी किया है, उसके मुताबिक जुलाई महीने में बारिश लंबी अवधि के औसत (LTA) से 94% से लेकर 106% तक रह सकती है। जुलाई कृषि के लिहाज से सबसे संवेदनशील महीना होता है क्योंकि धान जैसी प्रमुख खरीफ फसल की बुवाई का ज्यादातर हिस्सा इस महीने खत्म हो जाता है।

कई लोकल फसलें भी जुलाई में ही लगाई जाती हैं। जैसे, राजस्थान में यदि बारिश अच्छी हो जाए, तो किसान मोठ और दूसरी खरीफ फसलों का रुख कर लेते हैं, जबकि यदि बारिश न हो तो ग्वार की बुवाई बढ़ जाती है। जून तक की परिस्थिति यह रही है कि मध्य भारत में कमजोर मानसून के कारण कुल मिलाकर अब तक LTA से 8% कम बारिश हुई है। सिर्फ मध्य भारत में LTA से 54% कम बारिश हुई है, जिससे इस क्षेत्र में मुख्य रूप से होने वाली कपास, सोयाबीन और गन्ने की बुवाई प्रभावित हुई है।

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