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जलियांवाला बाग हत्याकांड: 105 साल पुराना वह दर्द, जो आज भी ताजा है...जिसने बदल दिया आजादी की जंग का रुख

13 अप्रैल 1919 को भारतीयों की मंशा जलियांवाला बाग में एक सभा शांतिपूर्ण तरीके से करने की थी। लेकिन ब्रिटिश सरकार के कई अधिकारियों को यह 1857 के गदर के दोहराव जैसी परिस्थिति लग रही थी और इसे न होने देने के लिए वे कुछ भी करने को तैयार थे। ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर की अगुवाई वाली टुकड़ी 11 अप्रैल की रात को अमृतसर पहुंची और अगले दिन शहर में फ्लैगमार्च भी निकाला

Ritika Singhअपडेटेड Apr 13, 2024 पर 4:10 PM
जलियांवाला बाग हत्याकांड: 105 साल पुराना वह दर्द, जो आज भी ताजा है...जिसने बदल दिया आजादी की जंग का रुख
बैसाखी के दिन 13 अप्रैल, 1919 को जलियांवाला बाग में आयोजित सभा में कुछ नेता भाषण देने वाले थे।

Jallianwala Bagh Massacre: 13 अप्रैल...वह तारीख जब एक ओर उत्तर भारत के कई राज्यों में फसल पकने की खुशी में बैसाखी का त्यौहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। वहीं दूसरी ओर यह दिन एक बेहद दुखद घटना की याद दिलाता है। एक ऐसा वाकया, जो 105 साल के बाद भी दर्द को ताजा कर जाता है। हम बात कर रहे हैं जलियांवाला बाग हत्याकांड की। वह वर्ष 1919 का 13 अप्रैल का ही दिन था, जब जलियांवाला बाग में एक शांतिपूर्ण सभा के लिए जमा हुए हजारों निहत्थे भारतीयों पर अंग्रेज हुक्मरान ने अंधाधुंध गोलियां चलवाई थीं।

पंजाब के अमृतसर जिले में ऐतिहासिक स्वर्ण मंदिर के नजदीक जलियांवाला बाग में अंग्रेजों की गोलीबारी से बचने के लिए कई लोग कुएं में कूद गए थे। बाहर जाने का केवल एक ही रास्ता था, जो संकरा तो था ही, साथ ही अंग्रेज सैनिकों ने उसे रोक रखा था। बहुत से लोग भगदड़ में कुचले गए और हजारों लोग गोलियों की चपेट में आए। देखते ही देखते उस बाग में लाशों का ढेर लग गया और हजारों लोग घायल हो गए। जवान, बूढ़े,  बच्चे, औरतें...हर कोई तो शामिल था उनमें। इस घटना ने देश के स्वतंत्रता संग्राम का रुख मोड़ दिया था। इस हत्याकांड के सबसे बड़े गुनहगार थे ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर और उस वक्त पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ डायर।

क्यों हो रही थी सभा

प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) के दौरान पंजाब के क्षेत्र में ब्रिटिशर्स का विरोध कुछ अधिक बढ़ गया था, जिसे डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट, 1915 लागू कर के कुचल दिया गया। उसके बाद 1918 में एक ब्रिटिश जज सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता में एक सेडीशन समिति नियुक्त की गई। समिति के सुझावों के अनुसार डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट, 1915 का विस्तार कर के भारत में रॉलेट एक्ट लागू किया गया, जो आजादी के लिए चल रहे आंदोलन पर रोक लगाने के लिए था। इस एक्ट में ब्रिटिश सरकार को और अधिक अधिकार दिए गए थे जिससे वह प्रेस पर सेंसरशिप लगा सकती थी, नेताओं को बिना मुकदमे के जेल में रख सकती थी, लोगों को बिना वॉरंट के गिरफ्तार कर सकती थी, उन पर विशेष ट्राइब्यूनल्स और बंद कमरों में बिना जवाबदेही मुकदमा चला सकती थी।

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