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तमिलनाडु में जारी रहेगा जल्लीकट्टू, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- हम विधायिका से अलग नजरिया नहीं रख सकते

जस्टिस के एम जोसेफ की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से यह फैसला सुनाया। पीठ ने इसी के साथ बैलगाड़ी दौड़ की अनुमति देने वाले महाराष्ट्र के कानून की वैधता भी बरकरार रखी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जल्लीकट्टू, बैलगाड़ी दौड़ कानून वैध हैं। राज्यों को कानून के तहत पशुओं की सुरक्षा और सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं

Akhileshअपडेटेड May 18, 2023 पर 1:58 PM
तमिलनाडु में जारी रहेगा जल्लीकट्टू, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- हम विधायिका से अलग नजरिया नहीं रख सकते
सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक और महाराष्ट्र में होने वाली बैलों की परंपरागत दौड़ पर भी रोक नहीं लगाई है

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने जल्लीकट्टू (Jallikattu), कंबाला (Kambala) और बैलगाड़ी दौड़ की इजाजत देने वाले कानूनों की संवैधानिकता पर तमिलनाडु, कर्नाटक और महाराष्ट्र सरकार को बड़ी राहत दी है। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को तमिलनाडु के उस कानून की वैधता बरकरार रखी, जिसके तहत सांडों से जुड़े खेल ‘जल्लीकट्टू’ को मंजूरी दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय पशु क्रूरता अधिनियम में तमिलनाडु सरकार की ओर से किए गए संशोधन की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक और महाराष्ट्र में होने वाली बैलों की परंपरागत दौड़ पर भी रोक नहीं लगाई है।

जस्टिस के एम जोसेफ की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से यह फैसला सुनाया। पीठ ने इसी के साथ बैलगाड़ी दौड़ की अनुमति देने वाले महाराष्ट्र के कानून की वैधता भी बरकरार रखी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जल्लीकट्टू, बैलगाड़ी दौड़ कानून वैध हैं। राज्यों को कानून के तहत पशुओं की सुरक्षा और सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।

यानी इस फैसले के बाद महाराष्ट्र में बैलगाड़ी दौड़, कर्नाटक में कंबाला और तमिलनाडु में जल्लीकट्टू का परंपरागत खेल जारी रहेगा। सुप्रीम कोर्ट में पशु क्रूरता अधिनियम में बदलावों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी। शीर्ष अदालत ने सभी याचिकाएं खारिज कर दीं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये तमिलनाडु की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है या नहीं, यह तय करना कोर्ट का काम नहीं है। अदालत ने कहा कि जब विधायिका ने घोषणा की है कि जल्लीकट्टू तमिलनाडु राज्य की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है, तो न्यायपालिका इस पर अलग दृष्टिकोण नहीं रख सकती है।

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