अयोध्या के बाबरी ढांचे को गिराने की बड़ी कीमत तत्कालीन मुख्य मंत्री कल्याण सिंह ने चुकाई थी
अयोध्या के बाबरी ढांचे को गिराने की बड़ी कीमत तत्कालीन मुख्य मंत्री कल्याण सिंह ने चुकाई थी। न सिर्फ उनकी मुख्यमंत्री की कुर्सी गई बल्कि एक दिन तिहाड़ जेल में भी बिताना पड़ा। अदालत की अवमानना के आरोप में कल्याण सिंह को जेल की सजा हुई थी। दरअसल बाबरी ढांचे को गिराने वालों पर गोली ने चलाने का सख्त आदेश तत्कालीन मुख्य मंत्री कल्याण सिंह ने अपनी पुलिस को दे रखा था।
6 दिसंबर, 1992 को भीड़ लगातार ढाई घंटे तक ढांचे को ढाहती रही,किंतु उत्तर प्रदेश पुलिस मूक दर्शक बनी रही। इसकी कीमत तो कल्याण सिंह को चुकानी ही थी। उससे पहले सन 1990 में रथयात्री एल.के. आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद भाजपा ने प्रधान मंत्री वी.पी.सिंह की सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया।उससे सरकार अल्पमत में आ गई। इस तरह मंदिर आंदोलन के कारण ही केंद्र की वी.पी.सरकार गिरा दी गई।
बाद में घटनाओं के कई दौर से गुजरते हुए अंततः 9 नवंबर, 2019 को सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायाधीशों के पीठ ने सर्वसम्मत फैसला देते हुए मुख्य स्थल पर ही राम मंदिर बनाने का आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट के उस निर्णय पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कल्याण सिंह ने कहा कि ‘‘मेरे दिल में आकांक्षा थी कि भव्य राम मंदिर बन जाए।
अब अंतिम इच्छा यही है कि मेरे जीवनकाल में मंदिर बनकर तैयार हो जाए तो शांति से मृत्यु को वरण कर सकूं।मैं चाहता हूं कि वहां दुनिया का सबसे बड़ा और भव्य मंदिर बने।’’ हालांकि यह नहीं हो सका। कल्याण सिंह इस बीच दुनिया में नहीं रहे। अयोध्या में राम मंदिर बने,ऐसी इच्छा कल्याण सिंह की ही नहीं,बल्कि करोड़ों लोगों की रही है। इसीलिए संविधान के अनुच्छेद-142 में प्रदत्त अपने विशेषाधिकार के प्रावधान का प्रयोग करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सर्वसम्मत फैसला दिया। उससे भी बेहतर बात यह हुई कि अल्पसंख्यक वर्ग के अधिकतर लोगों ने उस फैसले को स्वीकार कर भी लिया। इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर निर्माण के लिए राह बना दी।
पांच सदी का एक संताप इस तरह दूर हुआ। इस अवसर पर बाबरी मस्जिद -राम जन्म भूमि के सदियों पुराने विवाद पर एक नजर डालना समीचीन होगा। उससे सुप्रीम कोर्ट के 2019 के जजमेंट की महिमा व महत्व का भी अनुमान चलेगा। राम लला मंदिर को ध्वस्त कर सन 1528 में बाबर ने वहां मस्जिद बनवाई थी।
सन 1853 में मंदिर-मस्जिद विवाद पर दोनों समुदायों के बीच पहला संघर्ष हुआ जो रिकॉर्ड में है।
उससे पहले के संघर्षों का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं मिलता। यानी मुगल काल में तो विरोध की गंुजाइश काफी कम थी।ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के राज में विरोध तेज हुआ। जब ब्रिटिश सरकार ने ईस्ट इंडिया कंपनी से लेकर भारत का शासन खुद संभाल लिया तो उसने सन 1859 में विवादित भूमि को बांट दिया। उसने आंतरिक और बाहरी परिसर बना दिया।
सन 1885 में मंहत रघुवर दास ने फैजाबाद की अदालत में मुकदमा दर्ज कर विवादित ढांचे में पूजा की अनुमति मांगी। सन 1886 में फैजाबाद की अदालत ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मस्जिद हिंदुओं के पवित्र स्थल पर बनी है,लेकिन इस केस के यहां आने में देर हुई। 22 और 23 दिसंबर, 1949 के बीच की रात में विवादित ढांचे के केंद्र में रामलला की मूर्ति स्थापित कर दी गई।
हनुमान गढ़ी के महंत स्वामी अभिराम दास और उनके करीब 50 साथियों ने यह काम किया। वह मूर्ति चंदा करके 45 रुपए में खरीदी गई थी।अभिराम दास मूल रूप से बिहार के मधुबनी के मूल निवासी थे। यह संयोग ही है कि बिहार के ही भाजपा नेता कामेश्वर चैपाल ने 9 नवंबर, 1989 को मंदिर निर्माण के शिलान्यास की पहली ईंट विवादित ढांचे के नजदीक रखी थी। सरकार ने शिलान्यास की अनुमति दे दी थी।चैपाल अनुसूचित जाति से आते हैं।
याद रहे कि भाजपा ने विश्व हिन्दू परिषद के मंदिर आंदोलन का औपचारिक रूप से समर्थन किया। 1984 में विश्व हिन्दू परिषद ने विवादित स्थल मुक्त कराने और ताला खोलने के लिए अभियान शुरू किया। मंदिर के समर्थन में भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने 25 सितंबर, 1990 को द्वारका से अयोध्या तक के लिए रथ यात्रा शुरू की। पहले तो बिहार में प्रवेश करते ही उन्हें गिरफ्तार करने की योजना थी।
किंतु तब धनबाद के डी.सी.अफजल अमानुल्लाह थे। वह सैयद शहाबुद्दीन के दामाद हैं। शहाबुद्दीन बाबरी मस्जिद एक्सन कमेटी के नेता थे। इसलिए तय हुआ कि आडवाणी की गिरफ्तारी धनबाद में न हो अन्यथा सांप्रदायिक तनाव फैल सकता है। उनका रथ बिहार में जब आगे बढ़ा तो समस्तीपुर में एल.के. आडवाणी की गिरफ्तारी हुई।
गिरफ्तारी की जिम्मेदारी तत्कालीन मुख्य मंत्री लालू प्रसाद ने कड़क आई.ए.एस.अफसर आर.के.सिंह को दी थी।श्री सिंह अब केंद्र में मंत्री हैं। इस गिरफ्तारी के बाद भाजपा ने प्रधान मंत्री वी.पी.सिंह की सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। इस तरह मंदिर आंदोलन ने केंद्र की वी.पी.सरकार को गिरा दिया।
तब कुछ हलकों में यह बात भी कही जा रही थी कि यदि सन 1990 में मंडल आरक्षण की घोषणा नहीं होती तो आडवाणी की रथयात्रा भी नहीं होती। आरोप था कि मंडल आरक्षण ने जातियों के बीच दरार बढ़ाई। दूसरी ओर राम रथयात्रा ने हिन्दू एकता मजबूत की। खैर, वी.पी.सरकार के पतन के बाद कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर की सरकार बनी। उस सरकार के भी गिर जाने के बाद चुनाव हुआ और कांग्रेस के पी.वी.नरसिंह राव प्रधान मंत्री बने। बाकी इतिहास तो ताजा है।
(लेखक राजनीतिक मामलों के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार हैं)