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संविधान में सम्मान देने की इजाजत नहीं थी फिर भारत सरकार ने कैसे शुरू की थी 'भारत रत्न' देने की परंपरा

संविधान में किसी तरह के सम्मान या उपाधि देने की मनाही है लेकिन फिर भी भारत सरकार ने यह किया, जानिए इसकी क्या है वजह

MoneyControl Newsअपडेटेड Feb 07, 2022 पर 9:36 AM
संविधान में सम्मान देने की इजाजत नहीं थी फिर भारत सरकार ने कैसे शुरू की थी 'भारत रत्न' देने की परंपरा
जानिए किसके कहने पर भारत सरकार ने भारत रत्न देने की शुरुआत की थी

सुरेंद्र किशोर

आजादी के बाद सम्मान, पदक और उपाधि देने की शुरुआत करने की इच्छा पहली बार लॉर्ड माउंटबेटन ने जाहिर की थी दिसे भारत सरकार ने लागू किया। संविधान में उपाधि देने की मनाही है लेकिन लॉर्ड माउंटबेटन की चाह के कारण इसे शुरू किया गया था। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निजी सचिव एम.ओ.मथाई की संस्मरणात्मक पुस्तक में दर्ज विवरण के अनुसार माउंटबेटन ने सोवियत संघ का उदाहरण दिया जहां पदक और उपाधियां देने का चलन है।

सोवियत संघ ने सन 1974 में भारतीय कम्युनिस्ट नेता एस. ए. डांगे को ‘ऑर्डर ऑफ लेनिन’ प्रदान किया था। मथाई लिखते हैं कि "किंतु माउंटबेटन ने अमरीका और फ्रांस जैसे देशों के उदाहरण नहीं दिए जहां ऐसे सम्मान नहीं दिए जाते।" याद रहे कि भारत में सन 1954 में शुरू किए गए इन सम्मानों के लिए नामों के चयन पर हमेशा विवाद रहे हैं। नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में पद्म सम्मानों को लेकर विवाद नहीं हैं। पर यह निर्विवाद कब तक रह पाएगा,यह नहीं कहा जा सकता।

याद रहे कि इस देश में जिन हस्तियों को भारत रत्न देने के साथ इसकी शुरूआत की गई, उस प्रथम सूची में डा.राजेंद्र प्रसाद का नाम नहीं था। हां, उपराष्ट्रपति डॉक्टर राधाकृष्णन को पहले ही भारत रत्न दे दिया गया गया। डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को बाद में। इन पुरस्कारों व सम्मानों को संविधान विरोधी मानते

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