हरियाणा विधानसभा चुनाव में टिकट के लिए बीजेपी अपने एक तय फॉर्मूले दरकिनार कर सकती है। वंशवाद और परिवारवाद की राजनीति का मुखरता से विरोध करने के बावजूद, बीजेपी जाटलैंड में अपने 'एक परिवार, एक टिकट' फॉर्मूले से हट सकती है और राज्य में अपने नेताओं के परिवार के लोगों को टिकट देकर एक नए चलन की शुरुआत कर सकती है। आमतौर पर पिछल कई विधानसभा और लोकसभा चुनाव में बीजेपी इसी फॉर्मूले पर टिकी रही है, लेकिन अब ऐसी खबरें हैं कि पार्टी स्थानीय बड़े नेताओं ने हाई कमान पर इस फॉर्मूले को हटाने का दबाव डालना शुरू कर दिया।
The Tribune के मुताबिक, पार्टी के सूत्रों ने कहा कि इसके कुछ वरिष्ठ नेताओं ने 'एक परिवार एक टिकट' फॉर्मूले को इस बार टालने के लिए टॉप लीडरशिप से संपर्क किया है। ये वो नेता हैं, जो अपने परिवार के सदस्यों के लिए विधानसभा चुनाव का टिकट मांग रहे थे। कुछ नेता क्षेत्र में अपनी ताकत दिखा रहे हैं।
BJP के सामने कई चुनौतियां
फिलहाल सत्ता में लगातार 10 साल तक रहने के बाद सत्ता विरोधी लहर बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है, इसलिए पार्टी ने साफ कर दिया था कि कई सीटों पर नए चेहरे उतारे जाएंगे और गतिरोध दूर किया जाएगा।
इससे अपने बच्चों या परिवार के दूसरे लोगों के लिए टिकट पाने की होड़ में लगे "राजनीतिक परिवारों" की उम्मीदें बढ़ गई थीं।
रिपोर्ट में बीजेपी के एक सीनियर नेता के हवाले से कहा गया कि पार्टी राज्य के राजनीतिक परिवारों को खुश रखने के साथ-साथ 'एक परिवार, एक टिकट' की अपनी नीति पर कायम रहने की चुनौती से जूझ रही है।
बेटे, बेटी के लिए टिकट की उम्मीद में ये नेता
एक सूत्र ने कहा, "केंद्रीय राज्य मंत्री राव इंद्रजीत की बेटी आरती राव पहले ही पार्टी के टिकट के साथ या उसके बिना चुनाव लड़ने के अपने फैसले की घोषणा कर चुकी हैं, बड़े नेता भी ऐसी मांग कर रहे हैं।"
इसने आगे बताया, "जहां एक और केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गुज्जर अपने बेटे के लिए टिकट चाहते हैं, तो वहीं सांसद धर्मबीर सिंह भी चाहते हैं कि उनका बेटा विधानसभा चुनाव लड़े। पार्टी की उम्मीदवार किरण चौधरी, जो राज्यसभा के लिए चुनी जाने वाली हैं, अपनी बेटी, पूर्व सांसद श्रुति के लिए भी टिकट चाहती हैं। इसके अलावा सांसद नवीन जिंदल की मां और पूर्व मंत्री सावित्री जिंदल भी टिकट पाने की उम्मीद कर रही हैं।"
सूत्रों ने आगे कहा कि दो और नेताओं ने भी एक-एक भतीजे और एक बेटे के लिए टिकट मांगा है। अभी भी ऐसे वरिष्ठ नेता हैं, जो खुद चुनाव लड़ना चाहते हैं और परिवार के एक और सदस्य के लिए भी टिकट चाहते हैं, भले ही वे वर्तमान में बीजेपी में किसी पद पर नहीं हैं।
'जीतने की क्षमता' भी होगा एक फैक्टर
हालांकि, वरिष्ठ नेताओं ने कहा कि बीजेपी अपनी नीति में ढील देने और "जीतने की क्षमता" को प्राथमिकता देने पर विचार कर रही है।
एक नेता ने कहा, “जब हम चुनावी समर में जा रहे हैं, तो यही एकमात्र मानदंड है और बहुत कुछ टिकट बंटवारे पर निर्भर करेगा। पार्टी हर सीट पर किए गए कई सर्वे की रिपोर्ट को ध्यान में रखेगी और हर सीट पर फैसला लेगी। अगर परिवार का कोई सदस्य सीट जीत सकता है, तो टिकट से इनकार किए जाने की संभावना नहीं है।”