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इंदिरा गांधी ने 1971 में सिर्फ अपने राजनीतिक फायदे के लिए मध्यावधि चुनाव कराए

1967 तक देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एकसाथ होते थे लेकिन 1971 के बाद ये चुनाव अलग-अलग होने लगा

Surendra Kishoreअपडेटेड Apr 25, 2022 पर 7:40 AM
इंदिरा गांधी ने 1971 में सिर्फ अपने राजनीतिक फायदे के लिए मध्यावधि चुनाव कराए
1969 में इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा देते हुए आरोप लगाया था कि इस काम में कांग्रेस के नेता ही अड़चन लगा रहे हैं

सुरेंद्र किशोर

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1971 में लोकसभा का मध्यावधि चुनाव देश पर थोप दिया था। उन्होंने अपने राजनीतिक लाभ के लिए ऐसा किया था। इसके बाद लोकसभा और विधानसभा अलग-अलग होने लगे। 1967 तक ये दोनों चुनाव एकसाथ होते थे। अलग-अलग चुनाव होने के कारण सरकार और दलों का खर्च काफी ज्यादा होता था। सन 1969 के कांग्रेस विभाजन के कारण तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के सत्तारूढ़ दल का संसद में बहुमत समाप्त हो चुका था। पर, इंदिरा गांधी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) और कुछ अन्य क्षेत्रीय दलों की मदद से सरकार चला रही थीं।

1969 में इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा देते हुए आरोप लगाया था कि इस काम में कांग्रेस के नेता ही अड़चन लगा रहे हैं। कांग्रेस के विभाजन को यह कह कर औचित्य प्रदान करने की कोशिश की गई। क्या उन्होंने गरीबी हटाओ के अपने नारे को कार्यरूप देने के लिए मध्यावधि चुनाव देश पर थोपा ?

यदि सन 1971 के चुनाव में पूर्ण बहुमत पा लेने के बाद उन्होंने सचमुच गरीबी हटाने की दिशा में कोई ठोस काम किया होता तो यह तर्क माना जा सकता था। पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जिससे इस देश से गरीबी वास्तव में हटती। फिर क्यों मध्यावधि चुनाव थोपा गया? दरअसल केंद्र सरकार के कभी भी गिर जाने के भय से वह चुनाव कराया गया था। सन् 1971 के मध्यावधि चुनाव के ठीक पहले देश में हो रही राजनीतिक घटनाओं पर गौर करें तो पता चलेगा कि तब कई राज्यों के मंत्रिमंडल आए दिन गिर रहे थे।

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