Maharashtra Crisis: राज्यपाल की मांग पर टीम उद्धव के लिए लिटमस टेस्ट कल, जानें फ्लोर टेस्ट का पूरा प्रोसेस

Maharashtra Crisis Floor Test: मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) को अब अपना बहुमत साबित करना होगा। शिवसेना (Shiv Sena) के बागी नेता एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) का दावा है कि उनके पास 39 विद्रोहियों का समर्थन है

अपडेटेड Jun 29, 2022 पर 1:19 PM
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अपने ही विधायकों के विद्रोह का सामना कर रहे मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे बहुमत साबित करेंगे

Maharashtra Crisis: महाराष्ट्र में जारी सियासी घमासान (Maharashtra Political Crisis) क्या खत्म हो जाएगा? इसका कोई सटीक जवाब देना तो मुश्किल है, लेकिन राज्यपाल बीएस कोश्यारी (Bhagat Sing Koshyari) ने राज्य विधानमंडल के सचिव को एक फ्लोर टेस्ट (Floor Test) कराने के लिए एक पत्र भेजा है। अपने ही विधायकों के विद्रोह का सामना कर रहे, मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) को अब अपना बहुमत साबित करना होगा। शिवसेना (Shiv Sena) के बागी नेता एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) का दावा है कि उनके पास 39 विद्रोहियों का समर्थन है।

राज्यपाल ने एक पत्र में लिखा, "महाराष्ट्र राज्य में वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम एक बहुत ही परेशान करने वाली तस्वीर पेश करता है।" इससे एक दिन पहले मंगलवार रात को पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कोश्यारी से मुलाकात की और कहा कि उद्धव ठाकरे को अपना बहुमत साबित करना चाहिए।

फडणवीस ने दावा किया कि शिवसेना-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP)-कांग्रेस गठबंधन सरकार अल्पमत में लग रही है, क्योंकि शिवसेना के 39 विधायक एकनाथ शिंदे गुट में शामिल हो गए हैं। शिंदे अपने विधायकों के साथ गुवाहाटी में डेरा डाले हुए थे, जहां से अब वह गोवा शिफ्ट हो रहे हैं।


एक पत्र में, फडणवीस ने लिखा है कि संसदीय लोकतंत्र में सदन में बहुमत "सर्वोच्च" है। सरकार के अस्तित्व के लिए जरूरी है। इसलिए वह राज्यपाल से मुख्यमंत्री से जल्द से जल्द बहुमत साबित करने के लिए कहने का अनुरोध करते हैं।

महाराष्ट्र में सत्ता के लिए रस्साकशी के बीच, आइए आपको विस्तार से बताते हैं कि फ्लोर टेस्ट क्या और कैसे होते है। साथ ऐसे मामलों में राज्यपाल की क्या भूमिका होती है।

फ्लोर टेस्ट क्या है?

फ्लोर टेस्ट का सीधा सा मतलब है कि मुख्यमंत्री को विधानसभा में अपना बहुमत साबित करना होगा। यह एक ऐसा प्रोसेस है, जिसके जरिए सरकार ये देखती है कि क्या उसे अभी भी विधायिका का विश्वास हासिल है।

जब सरकार का बहुमत संदेह के घेरे में होता है, तो बहुमत का दावा करने वाले पार्टी के नेता को विश्वास मत लाना होता है। इसके साथ ही मौजूदगी और मतदान करने वालों के बीच बहुमत साबित करना होता है। अगर मुख्यमंत्री यह साबित नहीं कर पाते हैं कि उनके पास जरूरी संख्याबल है, तो उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए।

उद्धव ठाकरे के मामले में, 287 सदस्यों वाली राज्य विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 144 है। शिंदे के दलबदल करने से पहले, शिवसेना के पास 55, NCP के 53 और कांग्रेस के 44 विधायक थे।

इसमें से, शिंदे अब 39 विधायकों के समर्थन का दावा करते हैं, जिससे शिवसेना की संख्या 16 हो गई है। इसका मतलब है कि MVA गठबंधन अब बहुमत खो चुका है।

कैसे होती है वोटिंग?

विधायक या सांसद (अगर संसद में फ्लोर टेस्ट होता है) अलग-अलग तरीके से बहुमत साबित करने के लिए अपना वोट डाल सकते हैं। इसमें एक ध्वनि मत प्रक्रिया है, जिसमें विधायक मौखिक रूप से यानि बोल कर अपना समर्थन देते हैं।

वहीं दूसरा विभाजन मत भी होता है। इसमें मतदान के लिए इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स, स्लिप या बैलेट बॉक्स का इस्तेमाल किया जाता है। मतदान का तीसरा तरीका बैलेट वोट है, जो आमतौर पर सीक्रेट वोट होता है।

क्या है राज्यपाल की भूमिका?

कानून के अनुसार, राज्यपाल अनुच्छेद 175 (2) के तहत सदन को बुला सकता है और सरकार को बहुमत साबित करने के लिए फ्लोर टेस्ट की मांग कर सकता है। अगर विधानसभा का सत्र नहीं चल रहा है, तो राज्यपाल अनुच्छेद 163 के तहत अपनी स्पेशल पावर के तहत अध्यक्ष को फ्लोर टेस्ट के लिए सत्र बुलाने की अनुमति दे सकता है।

महाराष्ट्र के मामले में चूंकि विधानसभा में अध्यक्ष नहीं है। इसलिए ये जिम्मेदारी NCP नेता और डिप्टी स्पीकर नरहरि जिरवाल को सौंपी जाएगी।

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अगर MVA फ्लोर टेस्ट में बहुमत खो देता है और एकनाथ शिंदे गुट BJP के साथ सरकार बनाने का दावा करता है, तो राज्यपाल उन्हें सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं। फिर उन्हें बहुमत साबित करने के लिए फ्लोर टेस्ट के लिए कह सकते हैं।

कांग्रेस नेता पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा कि राज्यपाल के पास 12 जुलाई तक यथास्थिति बनाए रखने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के खिलाफ जाने का अधिकार नहीं है।

महाराष्ट्र के सियासी संकट में अब क्या?

टीम ठाकरे ने इस तर्क के साथ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है कि राज्यपाल का आदेश अवैध है, क्योंकि 16 बागी विधायकों ने अभी तक अपनी संभावित अयोग्यता पर जवाब नहीं दिया है।

शिवसेना सांसद संजय राउत ने आरोप लगाया कि राज्यपाल ने "जेट की रफ्तार" से काम किया। उन्होंने आरोप लगाया कि जब सुप्रीम कोर्ट ने बागी विधायकों की अयोग्यता पर फैसला नहीं दिया, तो ऐसे में विधानसभा में फ्लोर टेस्ट के लिए कहना अवैध है।

विद्रोहियों के खेमे के वकील एनके कौल ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि संभावित अयोग्यता के लिए टाली गई सुनवाई का बहुमत साबित करने से कोई लेना-देना नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने तब कहा कि वह बुधवार शाम 5 बजे मामले की सुनवाई करेगा।

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