सुरेंद्र किशोर

सुरेंद्र किशोर
कई लोग तो महलों के लिए लड़ते हैं। लेकिन करीब 57 साल पहले इस देश के कुछ बड़े समाजवादी नेता गण अपने लिए ‘झोपड़ी’ हासिल करने के लिए आपस में लड़ पड़े थे। चैंकिंए नहीं। दरअसल प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के नेतागण अपने लिए चुनाव चिन्ह के रूप में ‘झोपड़ी’ हासिल करने के लिए चुनाव आयोग में आमने-सामने थे।
दरअसल, साठ के दशक में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का समाजवादी पार्टी में विलय हुआ। दोनों दलों के मिले जुले संगठन का नाम पड़ा संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी। पर, कुछ ही समय के बाद मूल घटक प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अनेक नेताओं ने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से खुद को अलग कर लिया। उन लोगों ने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को पुनर्जीवित कर दिया।
याद रहे कि विलय से पहले झोपड़ी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का चुनाव चिन्ह थी। विलय के बाद 'झोपड़ी' को ही संयुक्त दल का चुनाव चिन्ह तय किया गया। अलग होने के बाद प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने 'झोपड़ी' पर अपना दावा ठोक दिया। अंततः झोपड़ी प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के पास ही चली गई। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी को बड़गद चुनाव चिन्ह मिला। उससे पहले चुनाव आयोग के सामने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को सांसद नाथ पई और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी की ओर से चर्चित नेता राज नारायण ने जिरह की।
अलग-अलग दोनों नेताओं ने कहा कि हमें 'झोपड़ी' ही चाहिए। नाथ पई महाराष्ट्र के राजापुर से तीन बार लोक सभा के सदस्य बने थे। उनके निधन के बाद मधु दंडवते राजा पुर से विजयी होते रहे। राजनारायण को कौन नहीं जानता? वह कभी उत्तर प्रदेश विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता रहे। बाद में वे राज्य सभा और लोक सभा के सदस्य बने। उन्होंने सन 1977 में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी को लोक सभा चुनाव में हराया था। मोरारजी देसाई सरकार में राजनारायण स्वास्थ्य मंत्री बने। पर, चुनाव आयोग के सामने चुनाव चिन्ह मामले में जीत नाथ पई यानी प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की हुई।
संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के राजनारायण ने ‘झोपड़ी’ चुनाव चिन्ह का दावा पेश करते हुए कहा था कि जिस दिन प्रजा समाजवादी पार्टी, संयुक्त समाजवादी पार्टी में शामिल हुई थी, उसी दिन वैधानिक दृष्टि से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी खत्म हो चुकी थी। उसका समस्त उत्तराधिकार संयुक्त समाजवादी पार्टी को मिल गया था। बाद में पार्टी के बनारस सम्मेलन में झगड़ा हो गया। उसके बाद एक बार फिर प्रजा समाजवादी पार्टी बनी। यह प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, पुरानी नहीं बल्कि एक नयी पार्टी है। क्योंकि उसके महत्वपूर्ण नेता और कार्यकर्ता अब भी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी में हैं।
राज नारायण ने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी की ओर से यह दलील भी चुनाव आयोग के समक्ष रखी कि चुनाव चिन्ह उसे ही मिल सकता है जिसे गत आम चुनाव में पांच प्रतिशत से अधिक मत मिले हों। चूंकि प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अनेक विधायक इस समय संसोपा में हैं,इसलिए यह नहीं माना जा सकता कि प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के पास 5% लोकमत है। इससे उलट प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के नाथ पई का तर्क था कि इस समय प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के नाम से जो पार्टी काम कर रही है,वह दरअसल पुरानी प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ही है। उस दल ने अपना उत्तराधिकार किसी अन्य दल को नहीं सौंपा है।
चूंकि चुनाव चिन्ह झोपड़ी तब की प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को ही मिला था, इसलिए उस पर हक आज भी प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का ही है। नाथ पई ने यह भी कहा कि यह कहना गलत है कि आज की प्रजा सोशलिस्ट पार्टी नयी प्रजा सोशलिस्ट पार्टी है। हमारी पार्टी वही प्रजा सोशलिस्ट पार्टी है।उसके कार्यकर्ता और नेता भी वही हैं। उनके विचार और कार्यक्रम भी वही हैं।इसलिए झोपड़ी ही प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का चुनाव चिन्ह होना चाहिए।
अब जरा इन दलों की पृष्ठभूमि पर नजर डालें
सन 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी बनी थी। यानी समाजवादी नेतागण कांग्रेस के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे। 1947 में कांग्रेस ने सोशलिस्टों से कहा कि या तो आप कांग्रेस में शामिल हो जाइए या कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी बना लीजिए। इस तरह सोशलिस्ट पार्टी बन गई। उसके प्रमुख नेता थे आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण और डॉक्टर राम मनोहर लोहिया। 1952 के आम चुनाव में सोशलिस्ट पार्टी ने अलग से चुनाव लड़ा।किंतु उसे कोई खास सफलता नहीं मिली।
चुनाव के बाद सोशलिस्ट पार्टी और कृषक मजदूर प्रजा पार्टी ने मिलकर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी बनाई थी। बाद के दिनों डा.राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व में कुछ नेतागण प्रसोपा से निकल गए। उन लोगों ने सोशलिस्ट पार्टी बनाई। दरअसल त्रावणकोर कोचिन की प्रसोपा सरकार ने आंदोलनकारियों पर गांलियां चला दी थीं। प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के महा सचिव डॉक्टर लोहिया ने अपने दल के मुख्य मंत्री पट्टम थानु पिल्लई से इस्तीफे की मांग कर दी। प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का नेतृत्व इस मांग से सहमत नहीं था। इसलिए डॉक्टर लोहिया प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से अलग हो गए।
लेकिन कुछ साल के बाद लोहिया फिर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से मिल गए। किंतु वह मिलन भी स्थायी नहीं रह सकी। सत्तर के दशक में एक बार फिर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने मिलकर सोशलिस्ट पार्टी बनाई। लेकिन सोशलिस्ट पार्टी 1977 में जनता पार्टी में शामिल हो गई। जनता पार्टी भी लंबे समय तक एक नहीं रह सकी। जनता दल से निकल कर कुछ नेताओं ने जनता दल (एस) बनाया।फिर जनता पार्टी से निकलकर जनसंघ घटक के नेताओं ने सन 1980 में भारतीय जनता पार्टी बना ली।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक मामलों के जानकार हैं)
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