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किसी महल के लिए नहीं बल्कि 'झोपड़ी' के लिए दो प्रमुख राजनीतिक दल कभी आमने-सामने थे

कई लोग तो महलों के लिए लड़ते हैं। लेकिन करीब 57 साल पहले इस देश के कुछ बड़े समाजवादी नेता गण अपने लिए ‘झोपड़ी’ हासिल करने के लिए आपस में लड़ पड़े थे

Surendra Kishoreअपडेटेड Sep 14, 2022 पर 7:11 AM
किसी महल के लिए नहीं बल्कि 'झोपड़ी' के लिए दो प्रमुख राजनीतिक दल कभी आमने-सामने थे
साठ के दशक में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का समाजवादी पार्टी में विलय हुआ। विलय से पहले झोपड़ी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का चुनाव चिन्ह थी। विलय के बाद 'झोपड़ी' को ही संयुक्त दल का चुनाव चिन्ह तय किया गया

सुरेंद्र किशोर

कई लोग तो महलों के लिए लड़ते हैं। लेकिन करीब 57 साल पहले इस देश के कुछ बड़े समाजवादी नेता गण अपने लिए ‘झोपड़ी’ हासिल करने के लिए आपस में लड़ पड़े थे। चैंकिंए नहीं। दरअसल प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के नेतागण अपने लिए चुनाव चिन्ह के रूप में ‘झोपड़ी’ हासिल करने के लिए चुनाव आयोग में आमने-सामने थे।

दरअसल, साठ के दशक में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का समाजवादी पार्टी में विलय हुआ। दोनों दलों के मिले जुले संगठन का नाम पड़ा संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी। पर, कुछ ही समय के बाद मूल घटक प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अनेक नेताओं ने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से खुद को अलग कर लिया। उन लोगों ने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को पुनर्जीवित कर दिया।

याद रहे कि विलय से पहले झोपड़ी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का चुनाव चिन्ह थी। विलय के बाद 'झोपड़ी' को ही संयुक्त दल का चुनाव चिन्ह तय किया गया। अलग होने के बाद प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने 'झोपड़ी' पर अपना दावा ठोक दिया। अंततः झोपड़ी प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के पास ही चली गई। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी को बड़गद चुनाव चिन्ह मिला। उससे पहले चुनाव आयोग के सामने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को सांसद नाथ पई और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी की ओर से चर्चित नेता राज नारायण ने जिरह की।

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