President Rule in Manipur: मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह के इस्तीफे के बाद मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लगाने की घोषणा कर दी गई है। मणिपुर के सीएम एन बीरेन सिंह ने 21 महीने की जातीय अशांति के बाद 9 फरवरी को इस्तीफा दे दिया था। उसके बाद भारतीय जनता पार्टी (BJP) नए सीएम की तलाश कर रही थी। बीजेपी अभी तक नए सीएम के नाम पर सहमत नहीं बना पाई है। इसके बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया है। 1950 से अब तक 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 134 बार राष्ट्रपति शासन लगाया जा चुका है। इसमें मणिपुर और उत्तर प्रदेश में 10-10 बार राष्ट्रपति शासन लगाया गया है।
गृह मंत्रालय (MHA) ने एक आधिकारिक अधिसूचना जारी कर राज्य में राष्ट्रपति शासन की घोषणा की है। मणिपुर में राष्ट्रपति शासन की घोषणा करते हुए गृह मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना में कहा गया है कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का मानना है कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसमें इस राज्य की सरकार संविधान के प्रावधानों के अनुसार नहीं चल सकती।
अधिसूचना में कहा गया है, "अब, संविधान के अनुच्छेद 356 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए, मैं घोषणा करती हूं कि मैं भारत के राष्ट्रपति के रूप में मणिपुर राज्य सरकार के सभी कार्यों और इस राज्य के राज्यपाल द्वारा निहित या प्रयोग की जाने वाली सभी शक्तियों को अपने अधीन करती हूं।" अधिसूचना में कहा गया है कि विधानसभा को निलंबित कर दिया गया है।
बीजेपी के पूर्वोत्तर प्रभारी संबित पात्रा और विधायकों के बीच कई दौर की चर्चा के बावजूद भारतीय जनता पार्टी सीएम पद के लिए नए नेता का नाम तय करने में विफल रही। पात्रा पिछले दो दिनों में राज्यपाल अजय कुमार भल्ला से दो बार मिल चुके हैं। मंगलवार को पात्रा ने प्रदेश पार्टी अध्यक्ष ए शारदा देवी के साथ भल्ला से बातचीत की। फिर बुधवार को उन्होंने फिर राज्यपाल से मुलाकात की। हालांकि, नए सीएम को लेकर बात नहीं बन पाई।
विवादों में रहा बीरेन सिंह का कार्यकाल
मणिपुर के मुख्यमंत्री के रूप में नोंगथोम्बम बीरेन सिंह का कार्यकाल मुख्य रूप से जातीय हिंसा से निपटने और संघर्ष भड़काने के आरोपों समेत कई विवादों से घिरा रहा। फुटबॉल खिलाड़ी रहे सिंह राजनीति में प्रवेश करने से पहले पत्रकार थे। वह पहली बार 2017 में मुख्यमंत्री बने। उनका दूसरा कार्यकाल 2022 में शुरू हुआ। वह इंफाल ईस्ट जिले में हीनगांग विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं।
सिंह ने 2002 में राजनीति में प्रवेश किया, जब वह डेमोक्रेटिक रिवोल्यूशनरी पीपुल्स पार्टी में शामिल हुए। फिर वह विधानसभा चुनाव जीते। वह 2003 में कांग्रेस में शामिल हो गए। उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए 2007 में सीट बरकरार रखी। कुछ ही समय में सिंह तत्कालीन मुख्यमंत्री इबोबी सिंह के भरोसेमंद सहयोगियों में से एक बन गए। उन्हें सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण, युवा मामले एवं खेल, तथा उपभोक्ता मामले एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री बनाया गया।
सिंह ने 2012 में लगातार तीसरी बार अपनी सीट बरकरार रखी। लेकिन उनका इबोबी सिंह के साथ मतभेद हो गया। आखिरकार, पद पर बने रहना मुश्किल होने पर उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया और अक्टूबर 2016 में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। मार्च 2017 के चुनावों में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, लेकिन उसके पास पर्याप्त संख्याबल नहीं था। जिसके कारण बीजेपी ने गठबंधन सरकार बनाई और बीरेन सिंह नए मुख्यमंत्री बने।
वह 2022 में मुख्यमंत्री के रूप में दूसरा कार्यकाल पाने के लिए अपनी पार्टी का भरोसा जीतने में कामयाब रहे। तब से अब तक उनका सफर उतार-चढ़ाव भरा रहा है। सिंह के कार्यकाल का सबसे बड़ा विवाद मई 2023 में शुरू हुआ जब राज्य में जातीय हिंसा भड़क उठी।
जातीय संघर्ष में इंफाल घाटी में बहुसंख्यक मेइती समुदाय और आसपास के पर्वतीय क्षेत्रों में बसे कुकी-जो आदिवासी समूहों के बीच गंभीर झड़पें हुईं। इन झड़पों के परिणामस्वरूप 250 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई और हजारों लोग विस्थापित हो गए। हिंसा को रोकने में सरकार की नाकामी ने सिंह के नेतृत्व को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दीं।
हिंसा को लेकर सिंह ने दिसंबर 2023 में सार्वजनिक रूप से माफी मांगी। उन्होंने राज्य में अशांति के कारण हुई मौतों और विस्थापन के लिए अफसोस जताया। फरवरी में एक नया विवाद तब खड़ा हो गया जब सिंह से संबंधित ऑडियो टेप लीक हो गए, जिसमें उन्हें कथित तौर पर यह चर्चा करते हुए सुना गया कि किस प्रकार कथित रूप से उनकी मंजूरी से जातीय हिंसा भड़काई गई।