SC-ST में सब-कैटेगरी बना सकती हैं राज्य सरकारें, सुप्रीम कोर्ट का आरक्षण पर ऐतिहासिक फैसला

Quota within quota: सुप्रीम कोर्ट ने माना कि नौकरियों और दाखिलों में रिजर्वेशन देने के लिए राज्यों को सब-कैटेगरी करने का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर गुरुवार 1 अगस्त का अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाना कि क्या राज्यों को नौकरियों और दाखिलों में आरक्षण के लिए एससी, एसटी में सब-कैटेगरी करने का अधिकार है?

अपडेटेड Aug 01, 2024 पर 11:36 AM
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Quota within quota: सुप्रीम कोर्ट ने 6:1 के बहुमत से व्यवस्था दी कि राज्यों के पास आरक्षण के लिए सब-कैटेगरी करने की शक्तियां हैं

Quota within quota: सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजातियों को आरक्षण के मुद्दे पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि राज्य सरकारें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों में सब-केटेगरी बना सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि नौकरियों और दाखिलों में रिजर्वेशन देने के लिए राज्यों को सब-कैटेगरी करने का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर गुरुवार 1 अगस्त का अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाना कि क्या राज्यों को नौकरियों और दाखिलों में आरक्षण के लिए एससी, एसटी में सब-कैटेगरी करने का अधिकार है? सुप्रीम कोर्ट ने 6:1 के बहुमत से व्यवस्था दी कि राज्यों के पास आरक्षण के लिए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति में सब-कैटेगरी करने की शक्तियां हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोटा के लिए एससी, एसटी में सब-कैटेगरी का आधार राज्यों द्वारा मानकों एवं आंकड़ों के आधार पर उचित ठहराया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की 7 सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने 6/1 से ये फैसला सुनाया। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) डी वाई चंद्रचूड़ सहित 6 जजों ने इस पर समर्थन दिखाया, जबकि जस्टिस बेला त्रिवेदी इससे असहमत रहीं हैं।

'कोटे में कोटा' की इजाजत


चीफ जस्टिस ने कहा कि ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि दलित वर्ग समरूप वर्ग नहीं था, और सामाजिक परिस्थितियाँ दर्शाती हैं कि उसके अंतर्गत सभी वर्ग एक समान नहीं हैं। सीजेआई ने आदेश सुनाते हुए कहा, "एक वर्ग के सामने आने वाले संघर्ष निचले ग्रेड में प्राप्त प्रतिनिधित्व के साथ गायब नहीं होते हैं।"

सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि SC ST कोटे में सरकार किसी जाति विशेष के लिए कोटा बना सकती है। पंजाब में सरकारी नौकरी में SC का 50 फीसदी कोटा वाल्मीकि और मजहबी सिखों के लिए रखा था। हाईकोर्ट ने इसे खारिज किया था, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट का 2004 का फैसला था कि कोटे में कोटा नहीं हो सकता है।

हाशिए पर पड़े लोगों के लिए कोटा जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने 6:1 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए कहा कि पिछड़े समुदायों में हाशिए पर पड़े लोगों के लिए अलग से कोटा देने के लिए अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का सब-कैटेगरी जायज है। जस्टिस बेला त्रिवेदी ने इस पर असहमति जताई है।

CJI डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली संविधान पीठ ने शीर्ष अदालत के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि राज्य सरकारों को आरक्षण के उद्देश्य से एससी की सब-कैटेगरियां बनाने का कोई अधिकार नहीं है।

शीर्ष अदालत ने EV चिन्नैया मामले में 2004 के फैसले को पलट दिया जिसमें कहा गया था कि सब-कैटेगरी की अनुमति नहीं है क्योंकि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति सजातीय वर्ग बनाते हैं।

CJI ने अपने फैसले में कहा, "छह राय हैं। हममें से बहुमत ने ईवी चिन्नैया को खारिज कर दिया है और हम मानते हैं कि सब-कैटेगरी की अनुमति है। जस्टिस बेला त्रिवेदी ने असहमति जताई है। एससी/एसटी के सदस्य अक्सर व्यवस्थागत भेदभाव का सामना करने के कारण सीढ़ी पर चढ़ने में सक्षम नहीं होते हैं।"

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वहीं, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बीआर गवई ने अलग दिए अपने फैसले में कहा कि राज्यों को एससी-एसटी में क्रीमी लेयर की पहचान करनी चाहिए और उन्हें आरक्षण के दायरे से बाहर करना चाहिए।

पीठ में सीजेआई चंद्रचूड़, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस बेला त्रिवेदी, जस्टिस पंकज मिथल, जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा शामिल थे।

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