Ram Mandir: राम मंदिर का गवाह है इतिहास, विदेशी पर्यटकों ने लिखी है आंखों देखी कहानी, जानिए क्या है राम मंदिर का पूरा सच!
Ram Mandir: विलियम फ्रेंच के कथन से साफ है की जब वह अयोध्या गए थे, उस समय रामकोट में तमाम मंदिरों के बीच खंडहर भी था। यह अलग बात है कि उन्होंने बाबरी मस्जिद का कहीं जिक्र नहीं किया है, लेकिन इस तथ्य को भी समझना होगा, यह खंडहर कौन सा था, जहां पहुंच कर लोग पूजा कर रहे थे। उस खंडहर में लोगों की इतनी आस्था क्यों थी
Ram Mandir: केवल विदेशी पर्यटक या व्यापारी ही नहीं बल्कि तमाम मुस्लिम लेखकों ने भी इसका जिक्र किया है कि कैसे बुत परस्ती के खिलाफ मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाई गई
Ram Mandir: 1608 ईस्वी में अंग्रेज व्यापारी विलियम फेंच अयोध्या (Ayodhya) में रामकोट के उस खंडहर में आते जाते श्रद्धालुओं को देख रहे थे। वह ईस्ट इंडिया कंपनी से जुड़े थे ओर व्यापार के लिए भारत आए थे। रामकोट (Ramkot) वह जगह है, जहां पर भगवान राम की जन्मभूमि है। उस खंडहर में महिलाएं पूजा करती थीं और फिर उस स्थान की परिक्रमा करती थीं। वास्तव में अंग्रेज व्यापारी के लिए यह दृश्य अद्भुत थे और उत्सुकता पैदा करने वाला भी। हिंदुओं के लिए वह बहुत ही पवित्र स्थान था। वहां पहुंचने वाले श्रद्धालु उसे राम जन्मभूमि (Ram Janmbhoomi) पुकारते थे।
अंग्रेज कारोबारी ने अपनी डायरी में लिखा था "अयोध्या के रामकोट में रानीचंद के महल और घरों के खंडहर भी हैं, जिन्हें भारतीयों ने महान भगवान के रूप में स्वीकार किया, यह कहते हुए कि उन्होंने दुनिया का तमाशा देखने के लिए शरीर धारण किया था। इन खंडहरों में निश्चित ब्राह्मण रहते हैं, जो ऐसे सभी भारतीयों के नाम दर्ज करते हैं, जो वहां बहने वाली नदी में नहाते हैं।"
विलियम फ्रेंच के कथन से साफ है की जब वह अयोध्या गए थे, उस समय रामकोट में तमाम मंदिरों के बीच खंडहर भी था। यह अलग बात है कि उन्होंने बाबरी मस्जिद का कहीं जिक्र नहीं किया है, लेकिन इस तथ्य को भी समझना होगा, यह खंडहर कौन सा था, जहां पहुंच कर लोग पूजा कर रहे थे। उस खंडहर में लोगों की इतनी आस्था क्यों थी?
विलियम फिंच ने इसे स्पष्ट भी किया है। विलियम फेंच इस मामले में और भी जानकारी दे सकते थे, लेकिन 1612 ईस्वी में पैदल मार्ग से ही ब्रिटेन लौट रहे थे और बगदाद में उनकी मृत्यु हो गई थी। उनकी मृत्यु के बाद डायरी और उनका दूसरा सामान सुरक्षित रख लिया गया।
विलियम फ्रेंच ने अयोध्या में जो देखा और अपनी डायरी में जो नोट किया, उससे तो साफ है कि जब वह अयोध्या गए थे, उस समय आस्था के उस केंद्र और हिंदुओं के सबसे पवित्रतम स्थान पर कोई मंदिर नही बल्कि खंडहर था। उन्होंने देखा कि उस समय तमाम महलों के बीच एक खंडहर पड़ा हुआ था। लेकिन वह खंडहर ही लोगों की आस्था का मुख्य केंद्र था। इसकी उन्होंने जानकारी की।
बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद मिले दो शिलापट
बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद दो शिलापट मिले। इनमें से एक शिलापट में साफ-साफ लिखा है कि इस मस्जिद का निर्माण मीर बाकी ने करवाया। जहां तक हिंदू जनमानस की बात है, तो वह शुरू से यह दावा करता रहा है कि 1528 में बाबर के सेनापति मीर बाकी ने बाबर के निर्देशानुसार राम जन्मभूमि को मंदिर को तोड़कर बाबरी मस्जिद का निर्माण कराया। विलियम फेंच का छोटा सा विवरण इस मुद्दे पर कई सवालों का जवाब दे देता है।
कई विदेशी पर्यटकों और इतिहासकारों ने इस बात का जिक्र किया है की कैसे हिंदुओं के पवित्र तीनों स्थलों अयोध्या, काशी और मथुरा में मस्जिद में बनाई गई।
Surgeon General Edward Balfour ने अपनी पुस्तक 'Encyclopaedia of India and of Eastern and southern Asia 1858' में लिखा है की तीन धार्मिक स्थलों पर तीन 3 मस्जिद हैं। अयोध्या में भी राम जन्म भूमि पर मस्जिद है।
उन्होंने भारत का भ्रमण किया था और इस पर काफी शोध भी किया था। लेकिन इस बात को लेकर विवाद जरूर है कि राम जन्मभूमि को बाबर के निर्देश पर तुड़वाया गया या औरंगजेब के शासन में तोड़ा गया। लेकिन बाबरी मस्जिद में जो शिला लेख मिला, उससे ये साफ है कि मीर बाकी ने मस्जिद का निर्माण करवाया था। यह शिलालेख में दर्ज है।
यही नहीं मीर बाकी की कब्र भी अयोध्या से सटे गांव सहनवा में बनी हुई है। ये भी ऐतिहासिक सत्य है कि मीर बाकी का संबंध बाबर से था। मीर बाकी का असली नाम बाकी ताशकंदी था और वह उज़्बेकिस्तान का रहने वाला था। बाबर ने उसे अवध का दायित्व सौंपा था।
बुत परस्ती के खिलाफ तोड़े गए मंदिर
केवल विदेशी पर्यटक या व्यापारी ही नहीं बल्कि तमाम मुस्लिम लेखकों ने भी इसका जिक्र किया है कि कैसे बुत परस्ती के खिलाफ मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाई गई। नसैर बहादुर शाही की किताब- 'साहिफा ए चहल' में बहादुर शाह आलमगीर की बेटी व औरंगजेब की पौत्री ने अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर और मथुरा में श्री कृष्ण जन्म स्थान मंदिर को तोड़ने की प्रशंसा की है।
1856 में लखनऊ से प्रकाशित 'हदीका ए शहदा' पुस्तक में प्रकाशित एक लेख में फारसी में लिखी किताब का हवाला दिया गया है। इसमें औरंगजेब की पौत्री ने 17वीं शताब्दी में लिखा था कि इस्लाम की फतेह को ध्यान में रखते हुए मुस्लिम बादशाहों ने मूर्ति पूजा रोकने के लिए हिंदुओं के साथ कोई रियायत नहीं बरती। बुत परस्ती किसी कीमत पर नहीं करने देना चाहिए। उसने लेख में न सिर्फ अयोध्या बल्कि मथुरा के जन्म स्थान को तोड़ने का भी जिक्र किया है।
1735 ईस्वी में फैजाबाद के काजी के हस्ताक्षर का एक दस्तावेज मिलता है। इस दस्तावेज में साफ-साफ लिखा हुआ है की मस्जिद पर कब्जे को लेकर अयोध्या में दंगा हुआ। यही नहीं इस बात का भी जिक्र है कि अयोध्या में और काशी में धर्म स्थलों को तोड़ा गया और दिल्ली के बादशाह के हुक्म से मस्जिदे बनवाई गईं। इसे बड़ी उपलब्धि बताया गया है।
यह अलग बात है कि मुस्लिम पक्ष इन दस्तावेजों को गलत बताता है और यह कहकर मस्जिद के पक्ष में खड़ा होता है कि किसी धार्मिक स्थल को तोड़कर मस्जिद नहीं बनाई गई। बाबरनामा में ऐसा कोई जिक्र नहीं मिलता कि उसके निर्देश पर जन्म स्थान को तोड़ा गया। अकबरनामा में भी इसका जिक्र नहीं है, लेकिन स्वतंत्र इतिहासकारों और पर्यटकों के यात्रा वृत्तांत में इसका जिक्र बार-बार आता है कि कैसे हिंदुओं के सबसे पवित्र स्थल राम जन्मभूमि के मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण कर दिया गया।
मुस्लिम पक्ष यह बात रखता है कि अगर राम जन्मभूमि मंदिर को तोड़कर मस्जिद बना दी जाती, तो समकालीन गोस्वामी तुलसीदास इसको जरूर लिखते, क्योंकि राम ही उनके आराध्य हैं। सुप्रीम कोर्ट में प्रसिद्ध संत रामभद्राचार्य ने गोस्वामी तुलसीदास की 'तुलसी दोहा शतक' नाम से एक पुस्तक पेश की, जिसमें गोस्वामी जी ने मंदिर को तोड़ने और जुल्म ज्यादती का वृतांत दिया है।