Ram Mandir: 'बाबरी के भीतर से भगवान की मूर्ति हटाने के बजाय, मुझे हटा दिया जाए' जब फैजाबाद के DM केके नायर ने नहीं माना था प्रधानमंत्री का आदेश
Ram Mandir Inauguration: फैजाबाद के दो अधिकारियों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के उन आदेशों को दरकिनार कर दिया, जो उन्होंने बाबरी मस्जिद से मूर्ति हटाए जाने के संबंध में दिए थे। वास्तव में ये सिर्फ प्रशासन और केंद्र सरकार के खिलाफ लड़ाई नहीं थी, बल्कि कांग्रेस के अंदर ही विचारधाराओं को लेकर चल रही खींच तान भी थी
Ram Mandir Inauguration: जब फैजाबाद के DM केके नायर ने नहीं माना था प्रधानमंत्री का आदेश
"मुझे जानकारी मिली है कि अयोध्या स्थित बाबरी मस्जिद में मूर्तियां स्थापित कर दी गई हैं। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण बात है। अयोध्या में घटी यह घटना बहुत परेशान करने वाली है। वहां पर आपत्तिजनक उदाहरण प्रस्तुत किया जा रहा है। मस्जिद से मूर्तियों को तत्काल हटाया जाए।"
जवाहरलाल नेहरू, प्रधानमंत्री भारत सरकार
26 दिसंबर 1949
"बाबरी मस्जिद से मूर्ति हटाए जाने के विचार से मैं सहमत नहीं हूं और अपनी पहल पर यह नहीं करना चाहता, क्योंकि इससे ऐसी भयावह स्थिति पैदा हो जाएगी, जो इस विवाद के इतिहास में अभूतपूर्व होगी। मुझे कांग्रेसियों में भी ऐसा कोई हिंदू नहीं मिला, जो मूर्ति हटाए जाने की प्रस्ताव का समर्थन करता हो। मेरा प्रस्ताव है कि मस्जिद में हिंदू और मुसलमान दोनों के प्रवेश को वर्जित कर दिया जाए और केवल पुजारी वहां पर भोग और आरती कर सके। यदि सरकार किसी कीमत पर मूर्ति हटाए जाने की कोशिश करती है, तो फिर मुझे कार्य मुक्त कर दिया जाए।"
के. के. नायर, डी.एम. फैजाबाद
27 दिसंबर 1949
फैजाबाद के दो अधिकारियों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के उन आदेशों को दरकिनार कर दिया, जो उन्होंने बाबरी मस्जिद से मूर्ति हटाए जाने के संबंध में दिए थे। वास्तव में ये सिर्फ प्रशासन और केंद्र सरकार के खिलाफ लड़ाई नहीं थी, बल्कि कांग्रेस के अंदर ही विचारधाराओं को लेकर चल रही खींच तान भी थी। पंडित जवाहरलाल नेहरू बाबरी मस्जिद में मूर्ति रखे जाने को कश्मीर समस्या और पाकिस्तान से जोड़ रहे थे। वह इसे मुसलमानों पर अत्याचार बता रहे थे। दूसरी तरफ पंडित गोविंद बल्लभ पंत, जो उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, जमीनी स्थिति का आकलन कर रहे थे।
जिलाधिकारी केके नायर और सिटी मजिस्ट्रेट गुरुदत्त सिंह किसी पर कीमत पर मूर्ति हटाने को तैयार नहीं थे। यह दोनों अधिकारी अपना पद छोड़ने तक को तैयार बैठे थे और मुख्य सचिव उत्तर प्रदेश को पत्र लिखकर बता भी चुके थे, अगर मूर्ति हटाई गई, तो ऐसा खून खराब हो,गा जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। इससे ज्यादा अच्छा हो कि उन्हें पद से हटा दिया जाए, लेकिन वे मूर्ति नहीं हटाएंगे।
प्रदेश कांग्रेस के सामने लाचार पड़े पंडित नेहरू
पंडित जवाहरलाल नेहरू उत्तर प्रदेश कांग्रेस के सामने लाचार दिख रहे थे। उन्होंने पंडित गोविंद बल्लभ पंत, सरदार वल्लभ भाई पटेल व तत्कालीन गवर्नर जनरल राज गोपालाचारी को लिखे पत्र में कहा- "कभी-कभी लगता है कि वह सिर्फ यही काम निपटाएं, क्योंकि मामला गंभीर है। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि अयोध्या में मुसलमानों के साथ दुर्व्यवहार हो रहा है। उनकी दाढ़ी नोची जा रही है। राह चलती मुस्लिम महिलाओं पर फब्तियां कसी जाती हैं। यह बहुत ही गलत है।"
हलांकि, पंडित गोविंद बल्लभ पंत और जिला प्रशासन ने इन आरोपों को खारिज कर दिया। वास्तव नेहरू अपने पत्रों में वही लिख रहे थे, जो आरोप कुछ मुस्लिम धार्मिक नेता लगा रहे थे। आखिरकार नेहरू ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि वो इस मामले पर रिपोर्ट भेजे।
मुख्यमंत्री पंत ने केके नायर को आदेश दिया कि वह लोगों से बात कर इस मामले पर पूरी रिपोर्ट दें। केके नायर ने इस मामले में जांच कराई और जो रिपोर्ट आई, उसमें जिक्र था कि राम जन्मभूमि पर मुसलमान बेवजह अडंगा डाल रहे हैं। इस रिपोर्ट के आधार पर केके नायर ने बाबरी मस्जिद क्षेत्र के 500 मीटर इर्द गिर्द मुसलमानों के प्रवेश पर रेक लगा दिया।
इससे नाराज तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने केके नायर को बर्खास्त कर दिया। केके नायर ने इस मामले पर हाई कोर्ट में मुकदमा दायर कर दिया और फैसला उनके पक्ष में रहा, लेकिन बाद में उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया। फैजाबाद और आस पास के जिलों में उन पर इस बात का दबाव था कि वह चुनाव मैदान में उतरें।
चुनावी मैदान में उतरे नायर और उनकी पत्नी
आखिरकार 1962 के लोकसभा चुनाव में वह खुद बहराइच से और उनकी पत्नी शकुंतला नायर केसरगंज लोकसभा सीट से मैदान में उतरीं और चुनाव जीत गईं। यही नहीं केके नायर का ड्राइवर भी विधायक बन गया। सिटी मजिस्ट्रेट गुरुदत्त सिंह भी फैजाबाद से जनसंघ से विधायक चुने गए।
राम जन्मभूमि के पूरे आंदोलन में के के नायर और गुरुदत्त सिंह की भूमिका सबसे अहम है और यही नहीं वे इस इलाके में आज भी हिंदू हृदय सम्राट के रूप में जाने जाते हैं।
केरल में जन्मे केके नायर का देहांत 1977 हो गया और इसके साथ ही एक इतिहास का अंत हुआ। लेकिन इस मामले पर विवाद बढ़ता रहा और आखिरकार मूर्तियों को तो नहीं हटाया जा सका, लेकिन प्रशासनिक आदेश से वहां पर ताला जरूर लगा दिया गया।