Same-Sex Marriage Supreme Court Hearing Live Updates: समलैंगिक विवाह (Same-Sex Marriage) को मान्यता देने की मांग वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की संविधान पीठ सुनवाई कर रही है। सुप्रीम कोर्ट की पांच-जजों की संविधान पीठ ने मंगलवार को देश में समलैंगिक विवाहों को कानूनी मान्यता की मांग करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की। इन याचिकाओं का केंद्र सरकार ने विरोध किया है। केंद्र ने याचिकाओं की योग्यता पर सवाल उठाते हुए इसे खारिज करने की मांग की। केंद्र सरकार ने आपत्ति जताते हुए कहा है कि इस मामले में निर्णय करने का एकमात्र अधिकार संसद को है। सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में सुनवाई नहीं करनी चाहिए।
समलैंगिक समूहों की ओर से पेश वकील मुकुल रोहतगी ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कहा कि हमें सम्मान से जीने का अधिकार है और यह अधिकार संविधान ने दिया है। उन्होंने हमें राज्य सरकार से विवाह को मान्यता मिले और अधिकार मिले। रोहतगी ने कहा कि समानता के अधिकार के तहत हमें विवाह की मान्यता मिलनी चाहिए। क्योंकि सेक्स ओरिएंटेशन सिर्फ महिला-पुरूष के बीच नहीं, बल्कि समान जेंडर के बीच भी होता है।
सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ देश में समलैंगिक विवाह को कानूनी रूप से वैध ठहराए जाने का अनुरोध करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) डी. वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस एस. के कौल, जस्टिस एस. रवींद्र भट, जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस हिमा कोहली की पीठ इन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं को 13 मार्च को पांच जजों की इस संविधान पीठ के पास भेज दिया था और कहा था कि यह मुद्दा बुनियादी महत्व का है।
इस मामले की सुनवाई और फैसला देश पर व्यापक प्रभाव डालेगा, क्योंकि आम नागरिक और राजनीतिक दल इस विषय पर अलग-अलग विचार रखते हैं। दो समलैंगिक जोड़ों ने विवाह करने के उनके अधिकार के क्रियान्वयन और विशेष विवाह कानून के तहत उनके विवाह के रजिस्ट्रेशन के लिए संबंधित प्राधिकारियों को निर्देश देने का अनुरोध करते हुए अलग-अलग याचिकाएं दायर की हैं।
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि समलैंगिक विवाह को मान्यता देने का अनुरोध करने वाली याचिकाएं शहरी संभ्रांतवादी विचारों को प्रतिबिंबित करती हैं। समलैंगिक विवाह को मान्यता देना अनिवार्य रूप से एक विधायी कार्य है, जिस पर अदालतों को फैसला करने से बचना चाहिए।केंद्र ने याचिकाओं के विचारणीय होने पर सवाल करते हुए कहा कि इस अदालत के सामने जो (याचिकाएं) पेश किया गया है, वह सामाजिक स्वीकृति के उद्देश्य से मात्र शहरी संभ्रांतवादी विचार है।
केंद्र ने कहा कि सक्षम विधायिका को सभी ग्रामीण, अर्द्ध-ग्रामीण और शहरी आबादी के व्यापक विचारों और धार्मिक संप्रदायों के विचारों को ध्यान में रखना होगा। इस दौरान पर्सनल लॉ के साथ-साथ विवाह के क्षेत्र को नियंत्रित करने वाले रीति-रिवाजों और इसके अन्य कानूनों पर पड़ने वाले अपरिहार्य व्यापक प्रभावों को भी ध्यान में रखना होगा। केंद्र सरकार ने समलैंगिक विवाह की कानूनी वैधता का अनुरोध करने वाली याचिकाओं के एक समूह के जवाब में दायर शपथपत्र में यह दलील दी।