वरिष्ठ वैज्ञानकि को चांद्रयान-3 के सफल होने का पूरा विश्वास, लेकन लैंडिंग से पहले आखिरी 30Km को बताया चुनौतीपूर्ण
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने चंद्रयान-3 चंद्रमा मिशन के लिए दूसरा और फाइनल डी-बूस्टिंग ऑपरेशन भी सफलतापूर्वक पूरा कर लिया। लैंडर, विक्रम, अब खुद को सावधानीपूर्वक नियोजित चांद की कक्षा में स्थापित कर चुका है, जिसका चंद्रमा से नजदीकी प्वाइंट 25 Km और सबसे दूर 134 Km है। लैंडर मॉड्यूल, जिसमें विक्रम लैंडर और प्रज्ञान रोवर शामिल हैं, दोनों ने डिबॉस्टिंग मनूवर को सफलतापूर्वक पूरा किया
वरिष्ठ वैज्ञानकि को चांद्रयान-3 के सफल होने का पूरा विश्वास
चंद्रमा पर भारत के तीसरे मिशन ने अंतरिक्ष के रहस्यों को जानने के लिए खगोलविदों की लंबी खोज को फिर से सुर्खियों में ला दिया है। चंद्रमा पर सफल लैंडिंग (Soft Landing) करने के अलावा, चंद्रयान-3 (Chandrayaan-3) कुछ दिलचस्प सवालों के जवाब भी देगा। ये मिशन ऐसे समय में आया है, जब प्रमुख अंतरिक्ष-यात्रा वाले देश चंद्रमा के लूनर एग्सोस्पेयर और सतह में बंद पानी और महत्वपूर्ण मिनरल की खोज में 50 सालों के बाद चंद्रमा पर लौट रहे हैं। चंद्रयान-3 के लैंडर (Lander) और प्रोपल्शन मॉड्यूल (propulsion modules) पर भी सात पेलोड हैं।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने चंद्रयान-3 चंद्रमा मिशन के लिए दूसरा और फाइनल डी-बूस्टिंग ऑपरेशन भी सफलतापूर्वक पूरा कर लिया। लैंडर, विक्रम, अब खुद को सावधानीपूर्वक नियोजित चांद की कक्षा में स्थापित कर चुका है, जिसका चंद्रमा से नजदीकी प्वाइंट 25 Km और सबसे दूर 134 Km है।
लैंडर मॉड्यूल, जिसमें विक्रम लैंडर और प्रज्ञान रोवर शामिल हैं, दोनों ने डिबॉस्टिंग मनूवर को सफलतापूर्वक पूरा किया। अब सभी इंतजार है, तो बस उस दिन का जब चंद्रयान-3 चांद की साउथ पोल पर अपने कदम रखेगा।
News18 के साथ खास बातचीत में, वरिष्ठ खगोलशास्त्री और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स (IIA), बेंगलुरु की डायरेक्टर प्रोफेसर अन्नपूर्णी सुब्रमण्यम ने कहा कि मून मिशन भारत की अंतरिक्ष यात्रा में एक महत्वपूर्ण क्षण है।
सवाल: एक ऐतिहासिक उपलब्धि होने के अलावा, चंद्रयान-3 खगोलविदों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
जवाब: चंद्रमा की सतह पर पानी के मॉलिक्यूल के सबूत मिलने के कारण चंद्रमा में नए सिरे से दिलचस्पी बढ़ी है। लेकिन हाल की खोजों से यह भी पता चला है कि वहां ऐसे मिनरल भी हैं, जिनका इस्तेमाल किया जा सकता है। तो ये जानना हमारे लिए बेहद जरूरी है। हम दशकों से पृथ्वी से चंद्रमा और सौर मंडल को देख रहे हैं।
अब तक हम सौर मंडल को समझने के लिए अलग-अलग अभियानों के आंकड़ों पर ही निर्भर रहे हैं। हम अपनी लैब में इस डेटा को सक्रिय रूप से इकट्ठा, सैंपलिंग और विश्लेषण नहीं कर रहे थे। लेकिन एक सफल लैंडिंग हमें वहां जाकर ये समझने का मौका दे सकती है कि ये सब वास्तव में कितनी मात्रा में मौजूद है।
सवाल: इस बार मिशन की सफलता को लेकर आप कितने आश्वस्त हैं?
जवाब: लॉन्च से लेकर चांद्र की कक्षा में पहुंचने तक ISRO ने कई मनूवर किए हैं। चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण की पकड़ में आना महत्वपूर्ण था और हमने वो हासिल भी किया।
मिशन ने कई महत्वपूर्ण चरण पार कर लिए हैं। अब, लैंडर को थोड़ी निचली कक्षा में डी-बूस्ट करना होगा। ये एक और छोटा लेकिन महत्वपूर्ण कदम है और हम इसे निश्चित रूप से कर सकते हैं। हम बिना किसी परेशानी के वहां पहुंच जाएंगे। लेकिन ये आखिरी 30 Km है, जो काफी महत्वपूर्ण होगा।
अंतरिक्ष के पैरामीटर विशाल हैं और इसमें जटिलताएं शामिल हैं। इसकी हमेशा एक छोटी सी नॉन-जीरो संभावना रहेगी कि ये गलत हो सकता है और हम इससे इनकार नहीं कर सकते। लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि हम इस बार ऐसा करेंगे। इसमें भारी मात्रा में तैयारी की गई है और चंद्रयान-3 के सफल होने की संभावना सबसे ज्यादा है।
सवाल: 50 सालों में केवल तीन देश ही चंद्रमा पर सफलतापूर्वक लैंडिंग कर पाए हैं। चन्द्रमा पर उतरना इतना कठिन क्यों है?
जवाब: जब हम पृथ्वी पर होते हैं, तो हम कई चीजों को हल्के में लेते हैं। जब हम अंतरिक्ष में प्रवेश करते हैं, तो वातावरण और गुरुत्वाकर्षण दोनों बदल जाते हैं। एक बार जब लैंडर चंद्रमा की कक्षा में पहुंच जाता है, तो हम ये नहीं मान सकते कि वह टेबल टॉप पर उतरेगा।
ये भारी है और बेतरतीब, ऊबड़ खाबड़ सतह पर भी उतर सकता है। भले ही कुछ चीजें गलत हो जाएं, फिर भी हमें ये सुनिश्चित करना होगा कि ये काम करे और गिरे नहीं। इसका कई बार परीक्षण किया जा चुका है, लेकिन चंद्रमा पर पहुंचने के बाद ये प्रक्रिया पूरी तरह से ऑटोमेटिक हो जाएगी।
लैंडर मॉड्यूल को खुद ही तय करना होगा, संभावना का आकलन करना होगा और देखना होगा कि उतरना ठीक है या नहीं। इसे ऐसे जटिल कामों को अपने तरीके से करना होता है। इसलिए, सॉफ्टवेयर को सटीक जानकारी देनी होगी, ताकि वो एक सही फैसला ले सके और सुरक्षित रूप से उतर सके।
चंद्रयान-3 लैंडर का सॉफ्टवेयर कहीं अधिक मजबूत है। साथ ही, ज्यादा सेंसर भी हैं, जो डेटा दे सकते हैं, इसलिए ये बेहतर निर्णय ले सकता है। हमारे पास पिछले मिशन की तुलना में बेहतर मैप हैं। इसलिए, एक बार जब लैंडर अपनी अंतिम कक्षा में पहुंच जाता है, तो उसे जमीन से सही दूरी का पता लगाना होता है, सटीक रफ्तार तय करनी होती है और लैंडिंग करनी होती है।
सवाल: स्पेस एक्सप्लोरेशन और रिसर्च के मामले में भारत कहां खड़ा है?
जवाब: ISRO ने अपनी क्षमता वास्तव में अच्छी तरह से बढ़ाई है और चंद्रमा पर लैंडिंग के साथ अपने कौशल और तकनीक को बढ़ा सकता है। हर देश का चांद तक पहुंचने का अपना-अपना तरीका होता है।
भारत इसे किफायती तरीके से करता है, हालांकि इसमें समय ज्यादा लगता है। लेकिन अब कोई दौड़ नहीं है, बात वहां तक पूरी तरह पहुंचने की है। ये तीसरी बार है, जब हम चंद्रमा पर जा रहे हैं और ISRO ने पहले ही इस प्रक्रिया में महारत हासिल कर ली है। चंद्रयान-2 ऑर्बिटर अत्यधिक हाई रिजॉल्यूशन पर चांद सतह की निगरानी कर रहा है और चंद्रयान-3 लैंडर के साथ संचार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।