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आंध्र प्रदेश के इस मंदिर में आधी रात को भक्त चटकाते हैं लाठियां, बहता है खून, आखिर क्या है यह अजीब रिवाज

Banni Festival in Andhra Pradesh: हमारे देश में बहुत से रीति-रिवाज है। इनमें कुछ अच्छे लगते हैं और कुछ पीड़ादायक भी होते हैं। ऐसे ही आंध्र प्रदेश के देवरागट्टू मंदिर में भक्त कई सालों से एक अनोखी परंपरा का पालन कर रहे हैँ। इसमें भक्त एक दूसरे के ऊपर लाठियों से हमला करते हैं। यह एक तरीके से जानलेवा हमला होता है

MoneyControl Newsअपडेटेड Sep 08, 2024 पर 1:33 PM
आंध्र प्रदेश के इस मंदिर में आधी रात को भक्त चटकाते हैं लाठियां, बहता है खून, आखिर क्या है यह अजीब रिवाज
Banni Festival in Andhra Pradesh: आंध्र प्रदेश में करीब 100 साल से बन्नी (Banni festival fight with stick) नाम का एक उत्सव मनाया जाता है। इस त्योहार का एक मात्र मकसद मरो या मारो है।

मथुरा के बरसाने की 'लट्ठमार होली' के बारे में तो आप जानते ही होंगे। लेकिन दक्षिण भारत में एक ऐसा मंदिर है, जहां दशहरे के मौके पर लोग एक दूसरे को मारने के लिए जाते हैं। यह आंध्र प्रदेश के करनूल जिले के देवरागट्टू मंदिर है। जहां हर साल भक्त लाठियां, पत्थर लेकर पहुंचते हैं। सभी भक्त अधिक से अधिक लोगों को लहुलुहान करने के मकसद से आते हैं। यह अजीब परंपरा पिछले 100 सालों से चल रही है। ये परंपरा भगवान शंकर जी की ओर से राक्षसों का वध करने की घटना के तौर पर याद किया जाता है। इसे बन्नी महोत्सव के नाम से जाना जाता है।

आंध्र प्रदेश में काफी वक्त से बन्नी महोत्सव मनया जा रहा है। इस त्योहार का एक मात्र सिद्धांत है, मरो या मारो! त्योहार में लोग लाठियां लेकर मंदिर जाते हैं। एक दूसरे को सिर पर लाठी से मारते हैं। हर साल दशहरे की रात, सैकड़ों पुरुष कुरनूल के देवरागट्टू मंदिर जाते हैं। वो अपने साथ हाथों में लाठियां लिए रहते हैं। ताकि वो एक दूसरे के सिर पर मार सकें।

बन्नी महोत्सव का क्या है इतिहास

दरअसल, आंध्र प्रदेश के देवरागट्टू मंदिर में कई सालों से ये अनोखी परंपरा चली आ रही है। देवरागट्टू मंदिर में ये परंपरा जिसे स्थानीय लोग "लाठी पूजा" या "लाठी जुलूस" भी कहते हैं। हर साल दशहरे के दिन मनाई जाती है। यह परंपरा रात से शुरू होती है और सुबह तक चलती है। इस दौरान भक्तगण एक दूसरे पर लाठियों से हमला करते हैं। जिससे कई लोगों के सिर से तो खून की धार बहने लगती है। यह सीन देखकर किसी का भी दिल दहल सकता है, लेकिन यहां यह परंपरा श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है। यह मंदिर आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के बॉर्डर पर है।

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