दिवाली पर माता लक्ष्मी की पूजा करने से घर में धन और वैभव आता है। लेकिन क्या आपको पता है, जिन लक्ष्मी माता का पूजन कर उन्हें हम प्रसन्न करते हैं, उन्हीं के वाहन उल्लू को अंधविश्वास की बलि चढ़ा दिया जाता है। हर साल दिवाली के दौरान हजारों उल्लू अंधविश्वास का शिकार हो जाते हैं, क्योंकि उन्हें फंसा लिया जाता है और धार्मिक अनुष्ठानों में बलि देने के लिए उनका व्यापार तक किया जाता है। उल्लू के अंग - खोपड़ी, पंख, कान के गुच्छे, पंजे, हृदय, यकृत, गुर्दे, रक्त, आंखें, वसा, चोंच, आंसू, अंडे के छिलके, मांस और हड्डियां- अलग-अलग पूजाओं में इस्तेमाल होता है।
2018 में, वाइल्ड लाइफ़ ट्रेड मॉनिटरिंग नेटवर्क, TRAFFIC ने रात्रिचर पक्षी के अवैध व्यापार पर एक स्टडी की है। डाउन टू अर्थ के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया, "इन पक्षियों का अवैध शिकार उनकी हड्डियों, पंजे, खोपड़ी, पंख, मांस और खून के लिए किया जाता है, जिनका इस्तेमाल तावीज, काले जादू और पारंपरिक चिकित्सा में किया जाता है।"
उन्होंने कहा, "ऐसा माना जाता है कि उल्लू, खासतौर से कान वाले उल्लू के पास सबसे बड़ी जादुई शक्तियां होती हैं और दिवाली को उल्लू की बलि के लिए सबसे शुभ समय माना जाता है।"
TOI के मुताबिक, इला फाउंडेशन के फाउंडर, सतीश पांडे ने बताया कि उल्लू की कोई सटीक जनगणना नहीं की गई है, इसलिए यह सही ढंग से अनुमान लगाना मुश्किल है कि भारत में कितने उल्लुओं की तस्करी की जाती है या उन्हें मार दिया जाता है।
पांडे ने कहा, “कुछ रिपोर्टों के अनुसार, हर साल 70,000-80,000 उल्लू मारे जाते हैं या उनका शोषण किया जाता है। कुछ जगहों पर दिवाली और लक्ष्मी पूजा के दौरान संख्या ज्यादा होती है।
दिवाली पर उल्लू की बलि क्यों दी जाती है?
ऐसा माना जाता है कि दिवाली के दिन जब देवी लक्ष्मी आपके घर आती हैं, तो अगर उनके वाहन उल्लू को मार दिया जाए, तो वह वापस नहीं जा पाएंगी और धन और समृद्धि आपके पास रहेगी।
पांडे ने द प्रिंट के साथ एक घटना शेयर की, जहां उन्होंने महाराष्ट्र के एक दूरदराज के गांव में युवा लड़कों को एक गुलेल के साथ एक बैग में उल्लू ले जाते हुए देखा। उनसे पूछताछ करने पर उन्होंने कहा कि वे उल्लू की आंखें खाने वाले हैं, जिससे वे गड़े हुए खजाने को देख सकेंगे।
पांडे ने कहा, "समाज का वो वर्ग, जो इन मिथकों पर विश्वास करता है, आम तौर पर ग्रामीण इलाकों में ठगों या अंधविश्वासों से आकर्षित होता है।"
रिपोर्टों के अनुसार, भारत लगभग 36 उल्लू प्रजातियों का घर है, जो शिकार, व्यापार या किसी दूसरे तरह के शोषण के खिलाफ भारत के वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत संरक्षित हैं।